May 24, 2010

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

प्रगति पर कभी पूर्ण-विराम नहीं लगता

उदन्ती का नया अंक मिला। उदंती उन्नत कलेवर में प्रकाशित हो रही है यह प्रसन्नता और परितोष की बात है। विकास और प्रगति पर कभी पूर्ण- विराम नहीं लगता। समय देवता बहुत कुछ सुझाता रहता है। अगले अंक और अधिक आकर्षक होंगे मुझे विश्वास है। यह अंक भी पठनीय व गुणवत्ता से भरपूर है।
- बालकवि बैरागी, मनासा (जिला-नीमच) मध्यप्रदेश मोबाइल- 07423221819
क्या हम 21 वीं सदी में हैं
विडम्बना तो यह है कि खाप पंचायत के कर्ताधर्ताओं पर अभी भी कोई असर नहीं पड़ा है। उन्होंने पंचायत करके यह फैसला किया है कि वे कोर्ट के फैसले को नहीं मानेंगे। यह विचारणीय है कि क्या हम सचमुच 21 वीं सदी में हैं। हरदर्शन जी की आश्वस्त लघुकथा सही मायने में लघुकथा है, जो अंत में ले जाकर पाठक को चौंकाती है बधाई। पहली और तीसरी लघुकथाएं कमजोर हैं। मार्च अंक की कहानी आईटीओ पुल एक क्लाइमेक्स पर पहुंचकर अचानक खत्म क्यों कर दी गई मुक्ता जी यह समझ नहीं आया। और न ही यह कि सोमा अखबारों के दफ्तर की ओर क्यों गई। फिर भी कहानी में एक प्रवाह और बांधने की क्षमता है इसमें कोई शंका नहीं। ...और मैं कुरार गांव का कवि बन गया सचमुच सुंदर कविता हैं। यह कुरार गांव कहीं भी हो सकता है। बीस पचीस साल पहले लिखी गई यह कविता कई मायनों में आज भी उतनी ही मौजू है। मैं यहां बंगलौर में ऐसे कई कुरार गांव देखता हूं। बधाई देवमणि जी।
- राजेश उत्साही, बैंगलोर utsahi@gmail.com
अच्छी शुरुआत
उम्मे सलमा की पेंटिंग बहुत सुंदर है। उनके बनाए फूल कैनवास पर सजीव हो उठे हैं। उन्होंने बहुत अच्छी शुरुआत की है। भविष्य निश्चित ही उज्जवल है। उम्मे की सफलता के लिए शुभकामनाएं।
- राज, नेहा
समस्या से रू-ब-रू
उदन्ती का नया अंक देखा। अनुपम मिश्र जी के सभी लेख किसी न किसी गंभीर समस्या से रू-ब-रू कराते हैं। इस अंक में प्रकाशित समस्या बड़ी गंभीर है लेख तो आने वाली और भयंकर स्थिति की दस्तक देता है। हाथी चिडिय़ा की जानकारी भी मिली। आपका प्रयास सराहनीय है।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com
विज्ञान का लाभ समाज को
'विज्ञान का यह वरदान मेरे शहर में क्यों नहीं?' उम्दा लेख है। यादों के बहाने राहुल जी ने बहुत बड़ा सवाल उठाया है। विलासिता के अविष्कार तो बहुत जल्दी हमारी पहुंच में आ जाते हैं, लेकिन समाजोपयोगी तकनीक के आने में बड़ी देर और कभी- कभी तो अंधेर भी हो जाती है। साइंस अगर वरदान भी है, तो उसका लाभ समाज को मिलना ही चाहिए। निजी सुविधाओं के लिए तो धड़ाधड़ अविष्कार हो रहे हैं, पर समाज की चिंता भी कोई करेगा?
- विवेक गुप्ता, भोपाल
सुंदर और मनमोहक चॉकलेट कथा
'चॉकलेट दर्द की दवा !' लेख पढऩे पर यही लगता है कि अब दवाई नहीं सिर्फ चॉकलेट खाकर ही दर्द भगायेंगे पर उन बच्चों का क्या और बड़ों का भी क्या, जो चाकलेट के लालच में झूठे ही दर्द बतलायेंगे और खूब चॉकलेट खायेंगे। निश्चित ही इससे चॉकलेट कंपनियों के वारे- न्यारे हो जायेंगे और दर्द निवारक दवाईयों वालों के सिर में दर्द होगा और वे भी दर्द भगाने के लिए चॉकलेट ही खायेंगे। सुंदर और मनमोहक चॉकलेट कथा।
- अविनाश वाचस्पति, avinashvachaspati@gmail.com

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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