May 24, 2010

कहां गई आंगन में फुदकने वाली गौरैया?

- कृष्ण कुमार मिश्र
घरेलू गौरैया अब एक दुर्लभ पक्षी बन गई है और पूरे विश्व से तेजी से विलुप्त होती जा रही है। हमारे घर- आंगन में फुदकते हुए चहलकदमी करने वाली घरेलू गौरैया जो हम सबके जीवन का एक हिस्सा थी अब दिखाई नहीं देती। कई बड़े शहरों से तो गायब ही हो गई हैं, हां छोटे शहरों और गांवों में अभी भी इन्हें देखा जा सकता है। देर से ही सही इसके विलुप्त होने के खतरे की ओर ध्यान तो गया।
कभी सामान्यत: दिखाई देने वाली गौरैया अब शहरों गांवों से नदारत हो रही है, इस प्रजाति के साथ भी कहीं ऐसा हो जैसा गिद्धों के साथ हुआ, एक दशक पूर्व गिद्ध सामान्यत: दिखाई देते थे आज वह विलुप्ति के कगार पर हैं।
घर, आंगन, दालान में गौरैया का चहचहाना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन घरों में उनके लिए कोई जगह नहीं होने, के कारण आधुनिकीकरण की इस अंधी दौड़ ने इस प्यारे से पक्षी के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। मनुष्य की बदलती जीवन- शैली ने गौरैया के आवास, भोजन घोंसलें, बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया है। यदि जल्दी ही मानव- समाज ने अपने अनियोजित विकास को गति देना बन्द नहीं किया तो यह कालान्तर में एक भयानक विभीषिका होगी मानव समाज के लिये, जिसे वह स्वयं तैयार कर रहा है।
शहरीकरण में और भीषण बदलाव आया है, लॉन, बगीचों और गमलों से हमारी देशी प्रजातियों के पेड़- पौधे गायब हो गये और उनकी जगह ले ली विदेशी प्रजातियों ने। नतीजा ये है, कि वे पौधे तो ऐसे पुष्प देते हैं जिनमें मीठा रसीला मकरन्द हो और ही खाने योग्य फल। ऐसी कटीली झाडिय़ों बिना घनी पत्तियों डालों वाले पेड़ों से जिनमें तो छाया है और ही सुन्दरता, और ही ऐसी टहनियां हैं जिन पर ये आसमान के बंजारे अपना घोंसला बना सके, या यूं कह लें कि कुछ पल ठहर कर सुस्ता सकें। हालांकि आधुनिकता के इस बदलाव में बेचारे इन जीवों ने भी अपने आप को ढालने की कोशिश तो की जैसे हरी टहनियों के बजाय तारों पर बैठना सीख लिया, घास के छप्पर नहीं मिले तो छतों में टंगे पंखों के ऊपरी हिस्से में घोंसला बना लिया, पर इन्हें वहां भी सुरक्षा नहीं मिली। आखिर अब ये क्या करें। ये एक सवाल है जिसका जबाव हम- आप ही दे सकते हैं और उसी जवाब में छुपा है, इन पक्षियों की बेहतरी का राज।
कभी नहीं हुई गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
कभी नहीं हु गिनती
घर, दरवाजे, चौखठ और खेत खलिहानों को अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की कभी गिनती तो नहीं हुई लेकिन सत्य तो यही है कि अब यह बिल्कुल दिखाई नहीं देती।
गिनती नहीं होने का कारण यह कि इसका घोंसला अक्सर घरों में बना करता है। पेड़ों पर इसके घोंसले कम ही बनते हैं इसलिए इस छोटी- सी चिडिय़ा की कभी गिनती नहीं की गई। पूर्व में यह सोचा भी नहीं गया था कि घर, आंगन में चहचहाने वाले इस छोटे से सुंदर पक्षी के अस्तित्व पर भी कभी संकट आएगा। एक अनुमान के अनुसार गौरैया की संख्या में करीब 90 प्रतिशत की कमी गई है, क्योंकि यह घरों में तो दिखाई नहीं देती है। इसके अलावा खेतों में भी दाना चुगते इसे अब नहीं देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व वन्यजीव संरक्षक राम लखन सिंह कहते हैं कि अब घर ऐसे बनने लगे हैं कि गौरैया के घोसले के लिए कोई जगह ही नहीं बचती है। बहुमंजिली इमारतों में बननेवाले फ्लैटों में एक-एक इंच का उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में बेचारी गौरैया जाए तो जाए कहां।
शहरों से गायब होने का कारण
शहरों से इसके गायब होने का एक कारण मोबाइल फोन के बने टॉवर भी हैं। इन टॉवरों से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो गौरैया के लिए घातक हैं। टॉवरों के पास से गुजरते ही निकलने वाली तरंग इसे अपनी चपेट में ले लेती है और इसकी जीवन लीला खत्म हो जाती है। खेतों में इस्तेमाल होन वाला कीटनाशक भी इनके लिए जानलेवा साबित हुआ है। खेतों में कटाई के बाद दाना चुगने के दौरान यह छिड़काव किए गए कीटनाशकों की चपेट में भी जाती हंै।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या करें ताकि ये खूबसूरत परिन्दे आपके आस- पास रहें चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हें पसन्द करता है।
-शहरों में पत्थरों के ही मकान बनें, लेकिन उसमें एक कोना ऐसा छोड़ा जाना चाहिए, जिसमें गौरैया अपना घोंसला बना सके। घर के बाहर रोशनदान के लिहाज से इसके लिए कुछ जगह छोड़ी जा सकती है। लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोंसला बना सके।
-उसके बचे रहने का साधन घर- आंगन में धोने के बाद सुखाए जाने वाले अनाज भी नहीं रहे हैं। पहले घरों की छत पर दाल और गेहूं को धोने के बाद सुखाया जाता था, लेकिन अब सब कुछ डिब्बा बंद आता है। दाल प्लास्टिक में पैक बाजार में बिकती है। उसके आहार का यह साधन भी खत्म हो गया।
गौरैया बहुत ही नाजुक चिडिय़ा होती है तथा इसकी जन्म और मृत्यु दर दोनों ज्यादा होती है, लेकिन इसके अंडे को अगर छू लिया जाए तो वह उसकी देख-भाल बंद कर देती है। ऐसे में अंडे में पल रहा उसका बच्चा जन्म नहीं ले पाता और अंदर ही मर जाता है। यदि घरों का बचा अन्न कूड़ेदान में डालने के बजाय उसे खुली जगह पर रखा जाए तो यह गौरैया के खाने के काम सकता है। लॉन, बगीचे और गमलों में देशी पौधे लगाए जाने चाहिए, ताकि वह इनमें अपना घोंसला बना सके।
तराई की अनुकरणीय पहल
दुनिया बदली तो प्रकृति के स्वरूप को भी बदल डाला या यूं कहें की गंदा कर डाला, फलस्वरूप सरंक्षण वादियों की एक खेप उत्पन्न हो गयी, किन्तु नतीजा सिफर ही है अब तक, यदि सामुदायिक सरंक्षण के सफल उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गये तमाम भागीरथी प्रयास विफल ही रहे हैं, वसुन्धरा के अंग-प्रत्यंगों की रक्षा में। जब 20 मार्च 2010 को विश्व गौरैया दिवस के रूप में मनाया गया तब निबन्ध प्रतियोगितायें, भाषण-बाजी, पोस्टर-लोगो और तस्वीरों का प्रदर्शन आदि कई आयोजन हु किन्तु अब शायद ये दिवस मात्र एक औपचारिकता नहीं रहेगा, क्योंकि खीरी जनपद के लोगों ने इसे एक आंदोलन का रूप देने की तैयारी कर ली है, ताकि सदियों से हमारे साथ रहती आई यह प्रजाति (गौरैया) का सरंक्षण संवर्धन हो सके। इसी प्रयास में पूरे जनपद में जगह- जगह गौरैया के महत्व और गौरैया से हमारे सदियों पुराने रिश्तों का जिक्र किया जाएगा, और इसे एक बार फिर साहित्य, धर्म और विज्ञान के पटल पर सुसज्जित करने की कोशिश।
दुधवा लाइव पर प्रकाशित गौरैया दिवस के संबध में हिन्दुस्तान अखबार में रवीश कुमार नें जब इस सुन्दर पक्षी की उन यादों कों उकेरा जो वक्त की भागम- भाग में कही धूमिल हो चुकी थी, और यही कारण बना उन तमाम लोगों के अन्तर्मन की सोई हुई उन यादों का, जिन्हें उन्होंने अपने बचपन में जिया था, गौरैया के साथ। कभी इसे दाना चुगा कर तो कभी रंगों में रंग कर। आज वे सब इस पक्षी को अपने घरों में फिर से वापस देखना चाहते हैं, अपने बचपन की तरह और शायद अपने बच्चों को वह विरासत भी देना चाहते है, जो कहीं खो गयी थी या खोती जा रही हैं, यानी इस चिडिय़ा का हमारे घरों में आना-जाना, बसना, घोंसला बनाना और हमारी दीवारों पर टंगें आईने में अपनी ही शक्ल देखकर चोंचे लड़ाना।
दुधवा लाइव की इस पहल में खीरी जनपद के सामाजिक कार्यकर्ता रामेन्द्र जनवार ने गौरैया सरंक्षण के लिए एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली है, प्रसिद्ध कथाकार डा. देवेन्द्र जिन्होंने जाने कितनी बार गौरैया का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है, अब इस खूबसूरत चिडिय़ा के वजूद की लड़ाई लडऩे की तैयारी में हैं, तो महिला संगठन सौजन्या की प्रमुख डा. उमा कटियार अपनी लिखी हुई रचनाओं का जिक्र करती हैं, और गौरैया को दोबारा अपने घरों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनश्चित कर ली है।
मां और गौरैया का रिश्ता
ये चिडिय़ा भी मेरी बेटी से कितनी मिलती- जुलती है, कहीं भी शाख़े- गुल देखे तो झूला डाल देती है।
जब गौरैया दिवस मनाने की बात चली तो लोगों के दिलों से वह सारे जज्बात निकल कर बाहर गये, जो इस खूबसूरत चिडिय़ा को लेकर उनके बचपन की यादों में पैबस्त थे! उन्हीं यादों के झरोंखो से कु विगत स्मृतियों को आप सब के लिए लाया हूं, क्या पता आप को भी कुछ याद जाए।
जब हम परंपराओं की बात करते हैं, तो मां उस परिदृश्य में प्रमुख होती है, क्योंकि परंपराओं का पोषण और उसका अगली पीढ़ी में संस्कार के तौर पर भेजना, मां से बेहतर कोई नहीं कर सकता, गौरैया भी हमारी परंपरा का हिस्सा रही, और हम सब जब भी इस परिन्दें का जिक्र करते हैं तो मां बरबस सामने होती है।
डा. धीरज जयपुर में रहती हैं, इनकी स्मृतियों में गौरैया की बात करते ही, पूरे परिदृश्य में मां की मौजूदगी होती है। इनकी मां ने इन्हें बचपन से ये बताया कि इनकी नानी को गौरैया बहुत पसन्द थी और वह कहती रहती थी कि मैं मरने के बाद गौरैया बनना चाहूंगी, और यही वजह थी की धीरज के घर में गौरैया को हमेशा दुलार मिलता रहा, खासतौर से एक टूटी टांग वाली गौरैया को, जिसको इनकी मां कहती थी कि बेटा ये तुम्हारी नानी ही हैं। भारत की संस्कृति में जीवों के प्रति प्रेम- अनुराग का यह बेहतरीन उदाहरण है, और उन मान्यताओं का भी जो पुनर्जन्म को परिभाषित करती हैं।
सीतापुर जिले की रहने वाली गिरजेश नन्दिनी ने जब दुधवा लाइव पर रामेन्द्र जनवार की कविताएं पढ़ीं जो गौरैया और मां के संबधों को जाहिर करती हैं, तो उन्हें लगा कि जैसे ये कविता मानों उन पर ही लिखी गयी है। क्योंकि सीतापुर शहर में वो किराये के मकान में जहां- जहां रही गौरैया का एक कुनबा उनके साथ रहा। वह जब भी मकान छोड़ कर नये मकान में जाती यह चिडिय़ां उन्हें खोज लेती हैं। इनकी मां आजकल इस बात से परेशान हैं कि चिडिय़ों के उस कुनबे में एक गौरैया कहीं खो गयी है। और उसकी फिक्र इन्हें हमेशा रहती है।
मेरे बचपन में मेरी मां मुझे जब खाना खिलाती और मैं नहीं खाता तो वो गौरैया से कहती कि चिर्रा ये खाना तू खा ले... मां ने अपनी विगत स्मृतियों के पुलिन्दे से गौरैया की यादों को निकालते हुए बताया कि बचपन में वे भाइयों के साथ अपने घर में गौरैयों को पकड़ती और उन्हें रंगों से रंग देती, और जब ये गौरैया इन्हें दिख जाती तो अपने रंग से रंगी हुई गौरैया को देखते ही सब खुश होकर शोर मचाते कि ये मेरी गौरैया है.....मेरी......
मां और गौरैया का रिश्ता सदियों से मानव समाज में पोषित होता आया, इसने हमारे बचपन में रंग भरे। आकाश में उडऩे की तमन्ना की किन्तु अब ये आकाश के बन्जारे हमारी करतूतों से ही हमारे घरों से गायब और ारों से ओझल हो रहे हैं। नतीजतन अब कोई मां अपने बच्चे की यादों में गौरैया के रंग नहीं भर पायेगी।
( कृष्ण कुमार मिश्र के वन्य जीवन से संबंधित अन्य लेख के लिए आप देख सकते हैं www.dudhwalive.com )

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3 Comments:

At 02 July , Anonymous Anonymous said...

it is very good artical and very close in my life.

 
At 20 March , Blogger नंदकिशोर नीलम said...

दोस्तों
गौरैया के संरक्षण और संवर्धन के लिए बहुत सार्थक काम करना होगा, ब्लॉग लिखने या महानगरीकरण और टावरों को ही जिम्मेदार ठहराने से कुछ नहीं होगा. और न ही खाली गौरैया दिवस मनाने से बात बनेगी. महानगरीकरण, टावरों के रेडियेशन, कीटनाशक आदि को चुनौती मान कर गौरैया को बचाने-बढ़ाने के विकल्प खोजने होंगे.
दोस्तों मैंने कुछ छोटे-छोटे प्रयास किये हैं जिन्हें साझा करना चाहता हूँ.
आप मेरे इन प्रयासों को मेरे फेसबुक drnkneelam@facebook.com (nandkishore neelam)
और ब्लॉग http://nandneel.blogspot.in/2013/04/blog-post_9.html
आरोहण: जरूर लौटेगी गौरैया....
NANDNEEL.BLOGSPOT.COM
पर देख सकते हैं.

 
At 12 April , Blogger Unknown said...

कृष्ण कुमार जी का आर्टिकल अच्छा लगा ।बड़े वुजुर्ग तो इन गौरैयों की खेल कूद से मौसम की जानकारी भी बता देते थे ।ये टीवी रेडियो जब कम मात्रा में थे ।कुदरत के यह नन्हें परिंदे ही तो अपनी मधुर चहचहाहट से वातावरण को गुंजायमान रखते थे ।अफसोस आज की नई पीढी इसके आनंद से बंचित है ।आगे बढ़ने का यह अर्थ नहीं कि सृष्टि की सुन्दरता का हरण करलें ।

 

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