May 25, 2010

चल उड़ जा रे पंछी अब ये देस हुआ बेगाना ...

बचपन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक है आंगन में गौरैया को चहचहाते फुदकते देखकर अपने मन का फुदकना। अधिकांश घरों की तरह हमारे शहर वाले घर के आंगन में भी गमलों और गौरैया के रूप में प्रकृति अपनी उपस्थिति दर्ज कराती थी।

गौरैया को दाना डालकर हम रिझाते थे। जब गौरैया चहचहाते हुए फुदक- फुदक कर दाना चुगती थी तो हम भाई- बहन उन्हें पकडऩे दौड़ते थे। गौरैया फुर्र से उड़कर छत की मुंढेर पर बैठकर चिचियाते हुए हमें चिढ़ाती थी। हम पीछे हटते थे वे फिर नीचे आकर दाना चुगने लगती। कभी- कभी गौरैया गमले में भरे पानी से नहाती। वास्तव में इस तरह नित्य ही प्रकृति हमसे लुका- छिपी खेलती थी। लेकिन ये खूबसूरत यथार्थ शहरी बच्चों के जीवन का अनिवार्य अंग पांच- सात दशक पहले था। जब शहरों में भी अधिकांश मकानों में छज्जे होते थे और छतें, खपरैल या लकड़ी की शहतीरों से बनी होती थी। ऐसे मकानों में घोंसले बनाने के लिए छतों और छज्जों में अनेक स्थान होते थे।
आज के शहरी बच्चों के जीवन से गौरैया लुप्त है। आज गौरैया सिर्फ उनके दादा- दादी, नाना- नानी के बचपन की मधुर स्मृतियों के रूप में शेष हैं। बचपन के इस खूबसूरत यथार्थ के शहरों से लुप्त हो जाने का मुख्य कारण है, मकानों का लोहे, क्रांकीट के बंद डिब्बों में परिवर्तित हो जाना, जिनमें न आंगन है न घोंसले बनाने की कोई जगह।
गौरैया जैसे सर्वप्रिय प्राकृतिक यथार्थ का शहरों से लुप्त हो जाने की कसक दशकों से सालती रही है। यही कारण है कि प्रकृति प्रेमियों की पहल पर 20 मार्च 2010 की तारीख को विश्व गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में हर वर्ष मनाने की घोषणा हुई है। इस दिवस को मनाने के लिए गुजरात के प्रकृति प्रेमियों ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। अहमदाबाद व गुजरात के अन्य शहरों में गौरैया के संरक्षण के उद्देश्य सेे लकड़ी के घोंसले बनवाकर अपने घरों की बाहरी दीवार पर लगवाएं हैं। प्रसन्नता की बात ये है कि गौरैयों ने इन घोंसलों को आबाद करना शुरु भी कर दिया है। इस संदर्भ में याद आता है कि गौरैया जैसे निरीह और आनंददायी प्राणी को अपने आंगन से निर्वासित करने के काफी पहले ही हम बाघ के आंगन में अतिक्रमण करके उसे उसी के आंगन से इतनी तेजी से लुप्त करने में जुटे थे कि बाघ दुनिया से ही सदैव के लिए लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका था।
आज से चार दशक पहले प्रकृति प्रेमियों की चीख पुकार पर जब भारत सरकार ने बाघों के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर बड़ी धूमधाम से प्रारंभ किया तब बताया गया था कि उस समय भारत के जंगलों में करीब 1800 बाघ थे। चार दशकों से चले टाइगर प्रोजेक्ट नाम के सरकारी तमाशे के बाद पिछले कुछ महीनों से मीडिया में रोज बताया जा रहा है कि अब भारत में सिर्फ 1411 बाघ ही बचे हंै। बाघों के इस सरकारी अभियान के चलते अनेक अभयारण्य घोषित किए गए और इनमें से कम से कम दो अभयारण्यों सरिस्का और पन्ना में से बाघ पूर्णतया लुप्त हो गए। अब सुनने में आ रहा है कि अन्य अभयारण्यों से बाघ लाकर वहां फिर से बसाए जा रहे हंै। ऐसे में ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि जब लोग कह रहे हंै कि वास्तव में प्रोजेक्ट टाइगर बाघों के शिकारियों का संरक्षण कार्यक्रम रहा है!
क्या है ऐसा सरकारी कार्यक्रमों में कि जनता से कर के रूप में वसूली रकम के खर्च में तो अनुमान से कहीं अधिक वृद्धि होती है परंतु लक्ष्य की उपलब्धि अनुमान से काफी पीछे रह जाती है?
ऐसा नहीं है कि वन्य जीवों से संबंधित सरकारी कार्यक्रमों में ही वांछितके विपरीत होता है। समाज में नर नारी का संतुलन बनाए रखने के लिए चलाए जा रहे कन्या भू्रण हत्या की कुप्रथा के उन्मूलन कार्यक्रम का भी परिणाम अत्यंत निराशाजनक है। जन्म लेते ही कन्या शिशुओं की हत्या की प्राचीन परंपरा रही है और इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के राज्य में ही गैरकानूनी अपराध घोषित कर दिया गया था। दो-तीन दशक पहले वैज्ञानिक प्रगति के फलस्वरूप ऐसे उपकरण आ गए कि गर्भस्थ शिशु का लिंग भी पता लग जाता है। फिर क्या था। कन्या भ्रूणों का ही गर्भपात धड़ल्ले से किया जाने लगा। इसको रोकने के लिए बनाए गए कानून के बावजूद इस जघन्य अपराध में कोई कमी नहीं आई है। इतना ही नहीं शर्मनाक दुर्भाग्य है कि मानवता के मूल स्रोत को ही आहत करने वाली इस कुप्रथा का सबसे अधिक प्रचलन पंजाब, हरियाणा, दिल्ली जैसे देश के समृद्ध क्षेत्रों में है। इसका समाज के लिए घातक दुष्परिणाम है स्त्री- पुरुष अनुपात में असंतुलन जो अनेक सामाजिक अपराध को जन्म देता है।
गौरैया, बाघ और कन्या शिशुओं के बारे में एक साथ चर्चा करने का कारण है कि ये तीनों जीव पर्यावरण के महत्वपूर्ण अंग हैं। पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखना हमारा धर्म है। अतएव पर्यावरण को समग्र रूप में देखने, जानने और संवारने के लिए प्रयत्न करना अनिवार्य है। हमें आशा ही नहीं विश्वास भी है कि हमारे सुधी पाठक पर्यावरण के संरक्षण के प्रति अपने धर्म का निष्ठा एवं लगन से पालन करेंगे।

- रत्ना वर्मा

3 Comments:

सहज साहित्य said...

आपकी चिन्ता वाजिब है । उदन्ती के माध्यम से आप पानी और पर्यायवरण के लिए जो अलग जगा रही हैं , यहकार्य आपको अन्य सम्पादकों से अलग करता है । आपका कार्य पूरी तरह रचनात्मक है ।

प्रो० डा. जयजयराम आनंद said...

aapne naye naye aayamon ki or pathkon kaa dhyaan khichaa haiiske liye jitnaa apkodhanyvaad diyaajaaye km hai.
aapne jin teen vishyon ki sahejaa hai ve aaj ke parvesh ke sanrakshan ke liye bahut jaroori hain.
badhee!
Dr Jaijairam Anandaaaaaaaanandjaijairam

Rahul Singh said...

kabhi mahant ghasidas sangrahalaya me gauraiya ki adhikta dastavejo me darj hui hai. ab mai rahulsinghcg@gmail.com par hu. dhanyavad aur shubhkamnae.

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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