May 25, 2010

वनों की रक्षक भील महिलाएं

- सुभद्रा खापर्डे

अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर, अट्टा की महिलाओं ने एक और संरक्षण गतिविधि शुरू की। छोटी टामों ने समूहों में अपने सदस्यों के खेतों में काम करना शुरू किया। खेतों के बीच की गलियों को पत्थरों से भरा ताकि बारिश के पानी के साथ बहने वाली मिट्टी और कुछ पानी को रोका जा सके।

किस बात ने उन्हें अपने वनों की रक्षक बनने और इतना हरा बनाने के लिए प्रेरित किया- इस एक प्रश्न के जवाब में मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के अट्टा गांव की एक भील महिला, दहेली बाई ने कहा, 'मुझे बहुत गुस्सा आया कि शहरों में लकड़ी की पूर्ति के लिए हमारे सारे जंगलों के काटने के बाद, वन विभाग जगंल के विनाश के लिए हमें दोषी ठहरा रहा है। तो मैंनें अपने गांव की महिलाओं को इकट्ठा किया और इन पहाडि़यों की सुरक्षा करना शुरु किया। अब कोई हम पर आरोप नहीं लगा सकता'।
गुजरात में भड़ौच के मैदानों में प्रवेश करने से पहले विंध्याचल की वृहद आखिरी श्रृंखला को बनाता हुआ अलीराजपुर का सौंदवा ब्लॉक नर्मदा नदी के एक किनारे पर्वतीय इलाका है। ढलानों में पलती लाल मिट्टी के साथ घाटी की संकरी पट्टियों में मध्यम गहराई वाली कुछ काली मिट्टी होती है। खराब भूमिगत जलदायी गुणों के साथ इसके नीचे हैं असिताश्मिी (बसॉल्टिक) सख्त पत्थर। औसत वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर है, जो बारिश के मौसम (मध्य जून से मध्य अक्तूबर) में होती है। भील आदिवासियों ने इस अर्धशुष्क पर्यावरण तंत्र को घाटी में जैविक कृषि द्वारा अपना लिया है और इसकी पूर्ति वे जंगलों से एकत्रित उत्पादों से करते हैं जिसमें पतझड़ी पेड़ जैसे टीक, शीशम, अंजान तथा सलाई और प्रचुर मात्रा में घास, जड़ी और बूटियां शामिल हैं। नीचे सख्त पत्थर होने के बावजूद, जंगल की हरियाली सुनिश्चित करती है कि पत्थरों की दरारों के माध्यम से बारिश के पानी से पर्याप्त प्राकृतिक पुन: पूर्ति होती रहे। फलस्वरुप, झरनों में पूरे साल पानी रहता था।
1956 में राज्यों के पुनर्गठन और मध्यप्रदेश के गठन से चीजों मेंबहुत अधिक परिवर्तन आया। अलीराजपुर पर पहले एक सामंती युवराज का शासन था, जिसका आदिवासियों पर बहुत अधिक नियंत्रण नहीं था और वे अधिकतर मिलकर श्रम करने की परम्पराओं से काफी नजदीकी से जुड़े समुदाय के रूप में रहते थे। जब यह क्षेत्र वन विभाग को सौंपा गया तब से लकड़ी उत्पादन के लिए इसका वाणिज्यिक शोषण आरंभ हुआ।
इससे नाजुक पर्वतीय पर्यावरण-तंत्र बिगड़ गया और जंगलों के खत्म होने से जल्दी ही मिट्टी की पतली परतें बह गईं और बारिश की प्राकृतिक पुनपूर्ति भी काफी हद तक घट गई, जिसके परिणामस्वरुप झरने सूख गए। हां, सबसे अधिक प्रभाव भीलों की आजीविका पर हुआ चूंकि उनकी जमीनों की उर्वरता के साथ- साथ वन उत्पादों की आपूर्ति भी गंभीर रूप से घट गई। इसके साथ, भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों ने सुनिश्चित किया कि उन्हें उनके ही घर में अपराधी माना जाए और उन्हें जंगल में पहुंच के लिए वन अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ा।
फिर 1983 में, आदिवासियों ने अपने अधिकारों, विशेषकर जंगलों की सुरक्षा के अधिकार की मांग करने के लिए स्वयं को संगठित करना आरंभ किया, जो उनका जीवन है। उन्होंने मजदूर चेतना संगठन का गठन किया और जंगलों की सुरक्षा आरंभ की दी, जोकि सौंदवा ब्लॉक के करीब 50 गांवों में निरावृत हो चुके थे। दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा गांव की महिलाओं ने संघर्ष शुरू किया और जल्द ही पास के गांवों में फैल गया। वेस्ती बाई के साथ दहेली बाई, नदिका के साथ ऊपर की ओर गईं जो उनके गांव से होते हुए गेंद्रा और फदतला गांव को जाती है और वहां महिलाओं को समझाया कि चूंकि यह धारा फदतला से शुरू होती है, मिट्टी, पानी और वन उत्पादों की उपलब्धता के रूप में वन सुरक्षा का पूर्ण लाभ तभी मिलेगा जब वे भी अपने जंगलों की सुरक्षा करना आरंभ करेंगीं। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण अट्टा की नदी गर्मियों में सूखने लगी। इस प्रयास का शुक्र है, 10 वर्षों में- 1990 के आरंभ से- नदी फिर से बाहरमासी हो गई।
इस संरक्षण का अनोखापन है, इसकी भीलों की पारम्परिक मिलकर श्रम करने की प्रथा पर निर्भरता- जो पैसों की अर्थव्यवस्था के अंदर आने और प्राकृतिक संसाधनों के आधार के विनाश से फीकी पड़ती जा रही थी। हालांकि, दहेली बाई के नेतृत्व में, अट्टा की महिलाओं ने पांच या छह का समूह बनाया और जंगल की रखवाली शुरू की ताकि यह सुनिश्चित हो कि जंगलों को चरा नहीं गया और जड़ों का पुनर्जीवित होने दिया जाए। इसके बाद, उन्होंंने सुनिश्चित किया कि कुछ पेड़ों को न काटा जाए। घास केवन मानसून के बाद ही काटी जाए और सुरक्षा करने वाले परिवारों में बराबर बांटी जाए जिसे जानवरों के चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
अपनी सफलता से प्रोत्साहित होकर, अट्टा की महिलाओं ने एक और संरक्षण गतिविधि शुरू की। छोटी टामों ने समूहों में अपने सदस्यों के खेतों में काम करना शुरू किया। खेतों के बीच की गलियों को पत्थरों से भरा ताकि बारिश के पानी के साथ बहने वाली मिट्टी और कुछ पानी को रोका जा सके। डेढ़ दशक की अवधि में, 1990 के मध्य से, सैंकड़ों ऐसी गलियों को भरा गया जिसके परिणाम स्वरूप गहरी मिट्टी के साथ कई सारे छोटे भूमि के टुकड़ों का निर्माण हुआ जिससे गांव की पैदावार में वृद्घि हुई। यह अभ्यास भी अलीराजपुर के कई अन्य गांवों में दोहराया गया।
नर्मदा नदी के किनारे पर बसे ककराना गांव की महिलाओं ने अपने जंगलों की सुरक्षा करते हुए अनुकरणीय हिम्मत दिखाई। चूंकि वे अलीराजपुर की सीमा पर हैं उन्हें गैर कानूनी रूप से उनकी लकड़ी चुराने वालों का लगातार सामना करना पड़ता है। अंतत: उन्हें निर्णय लेना पड़ा किकिसी को स्थायी रूप से जंगल के अंदर ही रहना पड़ेगा ताकि वह लकड़ी चुराने वालों के आते ही सावधान कर सकें। रैजा बाई, और उनके पति डीलू, ने इस चुनौती को उठाने का फैसला किया और उन्होंने जंगल में अपनी झोपड़ी बनाई। वे वहां अकेले अपने बच्चों के साथ रहते हैं।
जब रैजा बाई से जंगल में अकेले रहने के खतरों के बारे में पूछा गया, उन्होंने कहा, 'मैंने जंगल में इस झोपड़ें में एक दशक गुजारा है और जब से मैं यहां आई हूं मेरी जिंदगी गांव से बेहतर रही है'। झनदना, सुगत, ककराना और चमेली गांव के लोगों को भी शुरुआत में अपने गांव की सीमा पर एक अन्य जंगल की सुरक्षा में परेशानी हुई जो कि पहाड़ी पर था। हालांकि, काफी जद्दोजहद के बाद, केएमसीएस के सदस्यों की मदद से वे अपने अंतरों को सुलझाने में सफल रहे। आज, यह जंगल भी देदीप्यमान और दूर से नजर आता है।
राहुल बैनर्जी, जिन्होंने ढाई दशक इस क्षेत्र में रिसर्च और प्राकृतिक संसाधन प्रबंध प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में बिताया है, उनका मत है कि, 'जंगल, जमीन और पानी के संरक्षण के लिए समुदाय द्वारा सामूहिक कार्यवाही ही एकमात्र दीर्घोपयोगी तरीका है जिसमें देश के पर्वतीय, अर्धशुष्क और सख्त पथरीले क्षेत्रों के नाजुक पर्यावरण-तंत्रों की उत्पादकता को सुनिश्चित किया जा सकता है'।
बैनर्जी, जो भारतीय तकनीकि संस्था, खडग़पुर से सिविल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट हैं, आगे कहते हैं, कि 'इस वर्ष नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वालों में से एक, एलिनोर आस्ट्रॉम, को बिल्कुल इसीलिए, दीर्घोपयोगी प्राकृतिक संसाधन प्रबंध के लिए सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही की व्यवहार्यता स्थापित करने के सैद्घांतिक और प्रयोगाश्रित कार्य के लिए सम्मान दिया गया है। इस प्रकार यह अलीराजपुर में केएमसीएस की महिलाओं द्वारा किए गए अनुकरणीय कार्य पर मुद्रण- अनुमति के समान है। बढ़ते जंगल, बहते पानी की अधिक उपलब्धता के परिणामस्वरूप कृत्रिम ऊर्जा की मांग में कमी और जैविक तरीकों से प्राप्त बेहतर कृषि उत्पादकता, ये सभी जलवायु परिवर्तन के समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं'।
और जब यह सब सामुदायिक सामूहिक कार्यवाही के माध्यम से किया जाता है, विशेषकर महिलाओं द्वारा, तो सामाजिक न्याय के रूप में लाभ एक अतिरिक्त फायदा होता है। (विमेन्स फीचर सर्विस)

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