November 17, 2018

आलेख

संवेदना
-सन्तोष तिवारी
जीवन में कुछ दृश्य मुझे हमेशा चुप कर देते हैं और सोचने पर विवश कर देते हैं। ऐसे दृश्यों से कई बार तो मेरा  दूर-दूर तक कोई नाता न होने के बावज़ूद कोई रिश्ता बना लेने का मन करता है। मन अचानक द्रवित हो जाता है । पाठकों में जितने भी संवेदनशील हैं, उन्हें भी इस प्रकार के दृश्य झकझोरते होंगे। आप कहेंगे आख़िर मुद्दे पर क्यों नहीं आता मैं ? आ रहा हूँ भाई, थोड़ी भूमिका बनाने से बात जल्दी गले उतरती है।
पहला दृश्य होता है जब कोई बुज़ुर्ग कठोर परिश्रम कर जीविका चलाते दिखता है। कोई बूढ़ा सामान से लदे ठेले को धकियाते दिखे। तब सोचता हूँ, इस व्यक्ति की ऐसी क्या विवशता होगी जो इस उम्र में, जिस में उसे आराम की ज़रूरत है, इस तरह का काम करना पड़ रहा है? पसीने से तर हाँफता बदन आख़िर कौन-सी  मजबूरी ने  इसे ये हालात दिये हैं? 
एक और दृश्य होता जबमैं किसी व्यक्ति को अकेले खाना खाते देखता हूँ। सोचता हूँ इसके परिवार में जाने कितने लोग होंगे। परिवार के बीच हँसी-ठिठोली करते भोजन करता होगा। काम या सफ़र या कोई और कारण हो सकता है कि इसे इस तरह अकेले भोजन करना पड़ रहा है। मन करता है उस से पूछ ही लूँ कि- भाई! तू खाना खा, मैं तेरे पास, तेरे साथ बैठ कर तुझसे बातें करता हूँ , तुझे कंपनी देता हूँ। लेकिन कुछ ख़ुद की हिचकिचाहट और कुछ सामने वाले के अन्यथा ले लेने के भय से चुप दबा जाता हूँ।
एक  दृश्य वो भी होता है जब किसी गरीब ,मज़दूर के बच्चों को किसी पुराने टूटे खिलौने में रस्सी या धागा बाँध कर उसमें लीन हो कर खेलते देखता हूँ। सोचता हूँ जिस बच्चे ने ये खिलौना फेंका होगा उसके पास कितने सारे खिलौने होंगे लेकिन वो इस आनन्द से कितना महरूम होगा जो इस ग़रीब बच्चे को इस टूटे खिलौने में आ रहा होगा। अभाव में लगाव हो ही जाता है।
त्योहारों पर चमचमाती गाड़ियों और बड़े-बड़े मॉल या शोरूम में ख़रीदारी करते, चमचमाते लोगों के बीच निग़ाहें ठहर जाती हैं किसी छोटे बच्चे को फूल या धानी बताशे या दीये बेचते हुए देखकर। उसकी आँखों में फ्रिज, एल.ई.डी. ख़रीदने की हवस नहीं दिखती, बल्कि अपनी टपरी के सामने दो दीपक धर के पुराने कपड़ों में ही सही अपने भाई-बहनों के साथ कुछ फुलझड़ियाँ छुड़ा लेने का नन्हा-सा ख्वाब होता है। गरीबी में दिल बड़ा होता है लेकिन जेब छोटी।
ऐसे कितने ही दृश्य होते हैं, जिन्हें देखें तो लगता है इनसे मेरा क्या रिश्ता है ? मन उनके लिए क्यों पसीज जाता है जो अभी ही मिले हैं और अब के बाद शायद कभी न मिलें। शायद इसी को मानवता का रिश्ता कहते हैं।
जाने दो यार.... लिखने का तो बहुत मन है .... लेकिन आँख हैं कि साथ नहीं दे रहीं। आज आँखों की सारी नमी उन गुमनाम चेहरों के लिए, उन अनाम रिश्तों के लिए। दिल में एक गीत बज रहा है-
दुनिया में कितना ग़म है।
मेरा ग़म कितना कम है।
लोगों का ग़म देखा तो
मैं अपना ग़म भूल गया।

सम्पर्कः  12, ‘‘प्रारब्ध‘‘, शान्तिनगर, सिविल लाईन्स
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