October 03, 2018

अनकही

नैतिकता का पतन...
       -डॉ. रत्ना वर्मा        
भारत का उल्लेख हमेशा ही यहाँ की सभ्यता- संस्कृति, शिक्षा और संस्कारों के लिए किया जाता है; परंतु वर्तमान में जिस प्रकार की घटनाएँ रोज़- रोज़ सुनने और पढ़ने को मिल रहीं हैं, उसके बाद हम एक संस्कारवान् देश के नागरिक हैं, कहते हुए शर्म आने लगी है। नारी को देवी के रूप में पूजने की जिस देश की परम्परा रही हो, उस देश में महिलाओं खासकर छोटी- छोटी बच्चियों के साथ लगातार हो रहे अत्याचार ने यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि हैवानियत का यह बीज आखिर कैसे इतना फल-फूल रहा है। ऐसे कौन से सामाजिक, आर्थिक कारक हैं कि व्यक्ति काज़मीर इतना नीचे गिर जाता है कि वह इंसान नहीं रह जाता; हैवान बन जाता है। आखिर इस नैतिक पतन के कौन से कारक है
एक घटना की आग अभी बुझ भी नहीं पाती कि हमें शर्मसार करने के लिए दूसरी  घटना फिर सामने घट जाती है। हाल ही में दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती 11 साल की लड़की के साथ वहीं, के सफाई कर्मी द्वारा बलात्कार की घटना ने फिर से कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि इस तरह की घटना को अंजाम देने वाले को कानून का खौफ़तो बिल्कुल भी नहीं है, तो फिर ऐसे लोगों के अंदर कौन-सी मानसिकता काम करती है कि उन्हें अपने पकड़े जाने का ज़रा भी भय नहीं होता।
छोटी बच्चियों के साथ की जा रही ज्यादतियों में ज्यादातर यह पाया गया है कि आरोपी उनकी जान- पहचान का या करीबी रिश्तेदार ही होता है। ऐसे लोगों की उम्र अलग-अलग होती है। वह युवा, अधेड़, बुजुर्ग कोई भी हो सकता है। हाँ हाल ही की घटनाओं में यह भी पाया गया कि स्कूल के 12-13 साल के लड़के अपनी ही स्कूल की छोटी लड़कियों से जबरदस्ती करने लगे हैं।
अफ़सोस तो इस बात का है कि कानून में हो रहे लगातार बदलाव और इस तरह की घटनाओं पर जल्दी फैसला सुनाए जाने और दोषियों को फाँसी तक पहुँचाने के बाद भी ऐसी हैवानियत से भरी घटनाएँ घटती ही चली जा रहीं हैं। ऐसे में सख्त कानून के साथ- साथ इन बीमार मानसिकता वालों की मानसिक स्थिति पर अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है; ताकि अन्य रोगों की तरह इस वीभत्स रोग का भी इलाज सोचा जा सके।
इसी परिपेक्ष्य में अब हम बात करते हैं अपने पारिवारिक, सामाजिक और शैक्षिक माहौल की। देश की युवा पीढ़ी को आखिर हम कैसा माहौल दे पा रहे हैं?  हमारी सरकारें सबको शिक्षा की बात तो करती है, पर बेहतर शिक्षा देने के विषय में बिल्कुल भी बात नहीं करती। पाठ्यक्रम में लगातार बदलाव होते रहते हैं, पर इस बदलाव का मानक तय कौन करे; इस पर कोई बात नहीं करता। पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को दे दी जाती है, जिनका शिक्षा से कोई लेना-देना ही नहीं होता। बच्चों की बुनियाद मजबूत होती है। प्राथमिक शिक्षा से, यदि आरंभ में ही नैतिक विकास की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाएगा ,तो इमारत की मजबूती की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
आज स्कूलों में दी जा रही शिक्षा नाममात्र को रह गई है, बच्चों को सिर्फ उतना ही पढ़ाया जाता है, जिससे वे असली कक्षा में जाने के लिए पास हो सकें। चरित्र- विकास और नैतिक शिक्षा अब बीते जमाने की बात हो गई है। हमारे पाठ्यक्रमों से आदर्श स्थापित करने वाले महापुरुषों कीजीवनियाँ, उनके कार्य, घटनाएँ आदि सब विलुप्त होते जा रहे हैं। हाँ बच्चों पर इन दिनो पढ़ाई का, बस्ते का, कुछ कर दिखाने का बोझ भर डालते चले जा रहे हैं, जिसके दबाव में भी मानसिक विकार के शिकार होते हैं।
मोबाइल क्रांति के युग में आज स्कूली बच्चों के हाथ में भी मोबाइल थमा दिया गया है। सोशल मीडिया के इस दौर में यदि ज्ञान के भंडार खुले हैं, तो उससे ज्यादा कहीं बच्चों को गलत मार्ग में ले जाने वाले रास्ते भी खुल गए हैं। इन सबने बच्चों का बचपन छीन लिया है। न वे बाहर खेलने जाते हैं, न दोस्ते से मिलते हैं। इस तरह वे अपने घर में रहते हुए भी अपनों से दूर हो गए हैं।
गुरु-शिष्य के रिश्ते भी बदल गए हैं। शिक्षक अब पहले की तरह न पूजनीय रहे,न आदर्श। वे भी मशीन बन गए हैं, जो बच्चों को रटंत विद्या के माध्यम से आगे बढऩे का सिर्फ वही रास्ता बताते हैं जिससे वे आगे जाकर पैसा कमाने की मशीन बन जाएँ। दरअसल माता- पिता की महत्त्वकांक्षाएँ भी बढ़ गईं हैं, वे बच्चों की इच्छा जाने बगैर उन्हें रोबोट बना देना चाहते हैं।
बदल रही परिस्थितियाँ, बदल रहे विचार और मूल्य, बदल रहीं इच्छाएँ- महत्त्वाकांक्षाएँ, बदल रही शिक्षा- व्यवस्था सबने मिलकर समाज के वातारवण को ही बदल दिया है। अच्छा वातावरण चाहिए, अच्छे विचारों वाले लोग चाहिए, तो परिवार, समाज और देश को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। कानून बनाने वालों को बेहतर कानून बनाना होगा। देश चलाने वालों को अच्छी योजनाएँ बनानी होंगी। शिक्षा देने वालों को शिक्षा का उचित माहौल बनाना होगा। यानी सबको अपना-अपना काम जिम्मेदारी से करना होगा। यह नहीं कि यह मेरा काम नहीं है, मैं क्यों इसमें उलझूँ। ऐसी उपेक्षा हम सबके लिए नुकसानदेह होगी, जिसके दुष्परिणाम हम सब देख ही रहे हैं। वातावरण का प्रदूषण दूर करने के लिए सरकारी- गैरसरकारी संस्थाएँ रात-दिन जुटी हैं, क्या कभी मानसिक विकृति और मानसिक प्रदूषण दूर करने का उपाय सोचा हैसोचना पड़ेगा। अगर नहीं सोचा, तो भारत की गरिमा विश्व भर में धूल -धूसरित हो जाएगी।  

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