उदंती.com को आपका सहयोग निरंतर मिल रहा है। कृपया उदंती की रचनाओँ पर अपनी टिप्पणी पोस्ट करके हमें प्रोत्साहित करें। आपकी मौलिक रचनाओं का स्वागत है। धन्यवाद।

Mar 1, 2022

जीवन दर्शन - खुशी अंतस की अवस्था

  -विजय जोशी
पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल (म. प्र.)

जीवन में हर व्यक्ति सुख, संतोष, प्रसन्नता एवं खुशी की चाहत रखता है और इसकी खोज में निरंतर संलग्न रहता है जैसे पद, प्रतिष्ठा, पैसा इत्यादि। प्राप्ति तक तो जिज्ञासा उसके अंतस को आगत आनंद की कल्पना में आनंदित रखती है, किंतु जैसे ही भौतिक वस्तुएँ सुलभ होती हैं उसकी जिज्ञासा, खुशी सब तिरोहित हो जाती हैं। यह तो हुई पहली बात।
दूसरी यह कि खुशी तो मूलत: अंतस की अवस्था है, बाहरी कतई नहीं। वह तो मृगतृष्णा है।  कुछ लोग कम पाकर भी संतुष्ट रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी इच्छाओं को आकाश नहीं बनने दिया। जबकि सब कुछ पाकर भी कुछ लोग नाखुश रहते हैं। लोभ, मोह के प्रतीक।
इसका सर्वोत्तम उदाहरण तो खेल प्रतियोगिताएँ हैं जहाँ तीसरी पायदान पर कांस्य पदक विजेता तो रहता है बेहद खुश तथा दूसरे स्थान यानी रजत पदक विजेता अमूमन असंतुष्ट । जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। कारण स्पष्ट है, क्योंकि मानव मस्तिष्क तर्क के आधार पर कार्य का संपादन नहीं करता। दरअसल इसे विपरीत तथ्यात्मक सोच (Counterfactual thinking) कहते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि में आदमी की आदत होती है संभव विकल्प की खोज उन चीजों के बारे में जो घटित हो चुकी हैं।
 रजत पदक विजेता सोचता है कि – ओह मैं स्वर्ण  पदक क्यों नहीं जीत पाया।  इसके ठीक विपरीत कांस्य पदक विजेता का सोच होता है – आखिरकर मुझे मेडल तो मिला। ऐसा क्यों होता है। कारण जानना चाहेंगे। तो उत्तर है बहुत सरल। यह इसलिये कि रजत पदक हारने के बाद मिलता है जबकि कांस्य पदक जीत के बाद।
यही सब कुछ तो हमारे असली जीवन में भी होता है। हम इस बात की खुशी नहीं मनाते हैं कि हमें क्या उपलब्ध है, बल्कि इस बात का दुख मनाते हैं कि हमारे पास क्या नहीं है। समाधान सरल है। ईश्वर को धन्यवाद दें कि उसने हमें हमारी ज़रुरतों के मद्देनज़र सब कुछ दिया है। एक बार गिनना शुरू करेंगे तो समस्याएँ स्वयमेव समाप्त हो जाएँगीं। 
एक बार अपनी दृष्टि जो आपसे ऊपर हैं उन पर रखने के बजाय जो आपके समान नहीं बन सके या पा सके उन पर रखिए। उत्तर खुद ब खुद  समझ में आ जाएगा। जीवन असीमित संभावनाओं का प्रवेश द्वार है। अत: उपलब्ध सकारात्मकता को मनोबल सहित बनाए रखें। 
क्या हार में क्या जीत में  किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले वह भी सही यह भी सही
सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल- 62023, मो. 09826042641, E-mail-v.joshi415@gmail.com

32 comments:

शिवजी श्रीवास्तव said...

खुशी तो मूलत: अंतस की अवस्था है, बाहरी कतई नहीं। वह तो मृगतृष्णा है...बहुत सहज ढंग से इस सत्य को उद्घाटित करता सुंदर आलेख।बधाई विजय जोशी जी।

विजय जोशी said...

आदरणीय शिवजी,
सही कहा आपने। मृगतृष्णा की खोज में जीवन ही बीत जाता है और हम रह जाते हैं हाथ मलते। हार्दिक आभार सहित सादर

Sudershan Ratnakar said...

ख़ुशी तो मन की है। सही है बहुत कुछ पाकर भी हम ख़ुश नहीं होते और पाने की लालसा हमारी ख़ुशी छीन लेती है। बहुत सुंदर आलेख। बधाई

विजय जोशी said...

शाश्वत सत्य को उद्घाटित किया है आपने। मोह माया ना मरी, मर मर गया शरीर यही तो कहा गया है। हार्दिक आभार सहित। सादर

देवेन्द्र जोशी said...

इस प्रकार की मानसिकता के लिए आज के प्रबन्धन सिद्धान्त जिम्मेदार हैं। ये महत्वाकांक्षा को बढ़ावा देते हैं। क्लास में दूसरे नम्बर पर आने से माँ हताश हो जाती है तो मेडल नहीं मिलने पर पूरा देश हताश हो जाता है। कई युवा दूसरों की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाने से इतने निराश हो जाते हैं कि मौत तक को गले लगा लेते हैं। आशा है आपका संदेश आज के मेनेजमेंट गुरुओं तक पहुँचेगा।

Unknown said...

Very true. We must count our blessings and learn to be satisfied and happy with we have got...
Vandana Vohra

Sk Agrawal said...

प्रिय जोशी जी, सिल्वर मेडल, हारकर, तथा कांस्य जीतकर मिलता है, बड़ी बात कह दी आपने। इसका मर्म समझ लिया तो कल्यान हो गया। life को enjoy करने के अवसर/बहाने/मौके ढूढ़ना- सारा ज्ञान सफल है, इस विद्या में
डॉ श्रीकृष्ण अग्रवाल, Gwalior, Former Professor and HOD, Mechanical Engineering, MNNIT, ALLAHABAD
जोशी जी की जय

विजय जोशी said...

प्रिय डॉ. अग्रवाल, हार्दिक आभार. हार जीत तो मन तथा सोच का सार है. सादर

विजय जोशी said...

Madam, You are positive and Proactive reader indeed. Thanks very much. Regards

विजय जोशी said...

आदरणीय, सच कहा आपने. इस चूहा दौड़ के लिये अभिभावक तथा संस्थाएं जिम्मेदार हैं. हार्दिक आभार सहित सादर

प्रेम चंद गुप्ता said...

एक कथा याद आ गई। एक आदमी के पास शहर जाने के लिए किराए के पैसे नहीं थे। अतः उसने पैदल जाने का निश्चय किया। एक रुपये की मूंगफली खरीदी और खाते हुए अपनी यात्रा तय करने लगा। एक दूसरा आदमी उसके पीछे पीछे चल रहा था और उसके फेके हुए छिलके को उठा कर देखता जाता था। पहले वाला व्यक्ति इसको देर से देख रहा था। अंत में उसने पूछ ही लिया "भाई जब तुम्हे पता है कि मैं मूंगफली खाकर खाली छिलके फेंक रहा हूँ फिर तुम उसे बार बार क्यों देख रहे हो।" उस आदमी ने कहा "भाई इंसान से गलती हो ही जाती है सम्भव है तुम गलती से मूंगफली फेंक दो और मुझे मिल जाय। और मान लो अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो भी मेरा क्या नुकसान हुआ। इसी तरह तुम्हारे पीछे पीछे मेरा रास्ता भी कट जाएगा।"
इस कहानी के बहुत सारे निहितार्थ हैं। ठीक वैसे ही जैसे आपके आलेख का । बहुत ही सुंदर और सारगर्भित आलेख। बहुत बहुत साधुवाद।

Yogendra Pathak said...

गौधन गज धन बाजि धन और रतन धन खान । जब आवे संतोष धन सब धन धूलि समान।

विजय जोशी said...

आदरणीय, अटल सत्य है आपकी बात. असंतोष के मूल में संतोष भाव का ही अभाव है. हार्दिक हार्दिक आभार सहित सादर

विजय जोशी said...

आ. गुप्ता जी,
आपकी तो बात ही अद्भुत है. जहां मेरा सोच समाप्त होता है, वहां से आपका सोच आरंभ होता है. उपरोक्त उद्धरण से मेरी बात स्वयं सिद्ध है. आपकी प्रतिक्रिया की मन में सदैव लालसा बनी रहती है. यही सद्भाव सदा बना रहे, इसी कामना के साथ हार्दिक आभार सहित सादर

Khalil aslam qureshi said...

सर इस यथार्थ को जिसने समझ लिया वास्तव मे उसका जीन सफल हो गया अपनी महत्व कांक्षा को संयमित रखना अर्थात सब्र ओर शुकर करना जिसने सीख लिया उसका कल्याण हो गया बहुत सुंदर लेख सर

Unknown said...

आदरणीय श्रीमान,
मैं पूर्णतः आपके लेख से सहमत हूं एवं यह उम्मीद करता हूं की इस लेख का व्यापक प्रचार प्रसार होना चाहिए जिससे लोग इस चूहा दौड़ से बाहर आ सके और खुल कर अपना जीवन जी सकें ।
आभार

सी आर नामदेव said...

सही कहा आपने। मृगतृष्णा की खोज में जीवन ही बीत जाता है। आपको सादर प्रणाम

प्रेम चंद गुप्ता said...

आदरणीय,
यह आपका बड़प्पन है। आपके आलेख की प्रतीक्षा तो मुझे भी रहती हैं। आप ऐसे विषय उठाते हैं जिसके बारे हम जैसे लोग अनुमान भी नहीं कर पाते। इसी तरह हमें मार्गदर्शन प्राप्त होता रहे। इस कामना के साथ सादर प्रणाम।

Hemant Borkar said...

आदरणीय जोशी साहेब आप का लेख प्रेरणादायक है । सदैव सुखी व संतुष्ट रहना एक कठिन अभ्यास है जिसने थोड़ा भी प्रयास किया वो सुखी रहेगा। जोशी साहेब को सादर नमस्कार व चरण स्पर्श।

Arun Manglik said...

सुख और शान्ति तो अपने अन्दर ही मिल सकती है। इसे बाहर ढूँढने की ज़रूरत नहीं है। ����

मधुलिका शर्मा said...

सही कहा आपने..खुशी और संतोष तो मन में अंतर्निहित भाव हैं। संतोष व्यक्ति को दृढ़निश्चयी और बलवान बनाता है। संतोष एक अवधारणा है‌। अगर कोई मनुष्य अपने मन-मस्तिष्क में इसे धारण कर पाता है, तो वह सुखी हो जाता है। संतोष से संतुष्टि मिलती है जो तृप्त होने का भाव है। हमें अपनी इच्छाएं सीमित रखना चाहिए उसी में आनंद है।

विजय जोशी said...

बहन मधु, सही कहा। इच्छाएं तो आकाश हैं, उन्हें सीमित रखने में ही सुख है। संतोष तो मन की अवस्था है। सस्नेह

विजय जोशी said...

अरुण भाई, हार्दिक आभार। सादर

विजय जोशी said...

प्रिय हेमंत, बिल्कुल सही बात। प्रयास ही तो नहीं करते हम वरना क्या कठिन है। सस्नेह

विजय जोशी said...

प्रिय चंद्र, जीवन ही तो सार्थक करना है। सस्नेह

विजय जोशी said...

प्रिय शरद, इसी दौड़ में जीवन बीत जाता है और जब तक समझ में आता है समय शेष नहीं बचता। बहुत मनोयोग से पढ़ते हो। अच्छा लगा। सस्नेह

विजय जोशी said...

भाई अस्लम, सब्र ही तो नहीं रख पाते हैं हम। रेशम कर कीड़े से उलझे रहते हैं। सस्नेह

सुरेश कासलीवाल said...

हम इस बात की खुशी नही मनाते है कि हमें क्या उपलब्ध है, बल्कि इस बात का दुख मनाते हैं कि हमारे पास क्या नहीं है।सच बात तो यह है कि जो प्राप्त है वह पर्याप्त है। उत्तम आलेख के लिए धन्यवाद।

विजय जोशी said...

आदरणीय, बिल्कुल सही कहा आपने. हम सुख को छोटा व दुख को बड़ा कर देखने के आदी हैं तथा यही हमारी समस्याओं की जड़ है. हार्दिक आभार सहित सादर

Unknown said...

"परम संतोषी महाधनी" ऐसा हमने पढ़ा/सुना है। मनोयोग से काम करने वाले यदि प्रतिफल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते है सुखद अहसास झलकता है।
पर, यदि वांछित फल हेतु कार्य करते है तो विफलता का दुःख स्वाभाविक है।
अब कौन कितना संतोषी है उसका चेहरा बता देता है।

विजय जोशी said...

प्रिय शरद,
बिल्कुल सही और स्वाभाविक है यह बात। फल की आकांक्षा पूरी न होने पर मनोबल गिरता है।
महत्वकांक्षा स्वाभाविक है पर अति महत्वाकांशा दुख का कारण।
धन्यवाद औपचारिकता होगी सो न कहकर भी कहा समझो। सस्नेह

Unknown said...

पुरुषोत्तम तिवारी 'साहित्यार्थी' भोपाल
संतोषम् परम सुखम्. तृष्णा का कोई अन्त नहीं. यह भी है कि धरा पर कर्म ही प्रधान है. एक शब्द आनन्द भी है. अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर मनुष्य अपना जीवन व्यतीत करता है. लेख के माध्यम से सर आप ने जीवन पथ को सरल सहज करने का सूत्र दे दिया है. सादर प्रणाम.