January 28, 2017

अनकही

इस बार 
लीक से हट कर       
डॉ. रत्ना वर्मा
गणतंत्र दिवस के अवसर पर, 1954 से आरंभ किए गए विभिन्न पुरस्कारों जिसमें पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री शामिल है-  देश भर से असाधारण और विशिष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है।  इस बार 75 लोगों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। ये सभी पद्म पुरस्कार पाने वाले हमारे देश का गौरव होते हैं। अपने- अपने क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर वे देश की सेवा कर रहे होते हैं; जिनके कारण हमारा देश गौरवान्वित होता है। उनके गौरव से हम देशवासी गौरव का अनुभव करते हैं और हमारा मस्तक गर्व से ऊँचा उठ जाता है।
पिछले सालों की तुलना में इस साल के ये पद्म पुरस्कार इसलिए उल्लेखनीय हैं; क्योंकि इस बार कुछ व्यक्तियों का चुनाव लीक से हटकर किया गया है, जो सराहनीय है। अन्यथा सम्मान और पुरस्कार हमेशा से ही विवादों के घेरे में रहा है। अब तक वही व्यक्ति यह सम्मान पाते रहे हैं, जो हमेशा चर्चा में रहते हैं या फिर उनका काम सबको लगातार नज़र आता है या जिनका नाम पुरस्कार के लिए लॉबिंग करके भेजा जाता है। बहुत लोग इसलिए असंतुष्ट होते हैं कि अमुख-अमुख ने क्या किया है; जो उन्हें पद्म पुरस्कार मिल गया। फिर सिर्फ राजनीति और फिल्मों से जुड़े लोगों को ही यह पुरस्कार क्यों ? परंतु इस बार चयन -प्रक्रिया को ऑनलाइन करने के कारण 75 पद्मश्री पाने वालों में से कुछ ऐसे मनीषियों को भी सम्मानित किया गया है;  जो चुपचाप बरसों से अपना काम करते चले जा रहे हैं। न समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते हैं ,न मीडिया उन्हें हाथो- हाथ लेता हैहाँ पद्मश्री मिलने के बाद ज़रूर वे सब सुर्खियों में आ गए हैं, जिसके वे भागीदार भी हैं हम सबको उनपर गर्व है। सबसे खास बात है इनमें से अधिकतर की उम्र 60 से लेकर 90 वर्ष तक की है-
- 92 साल की भक्ति यादव गाइनकोलॉजिस्ट हैं। लोग उन्हें डॉक्टर दादी के नाम से जानते हैं। वे इंदौर की पहली महिला हैं, जिन्हें एमबीबीएस की डिग्री मिली। डॉक्टर दादी पिछले 68 साल से (1948 से) अपने पेशेंट्स का फ्री में इलाज कर रही हैं। अब डॉक्टर दादी को चलने-फिरने में तकलीफ़ होती है, लेकिन वे अंतिम साँस तक अपने मरीज़ों का इलाज करना चाहती हैं।
- केरल की रहने वाली मीनाक्षी अम्मा 76 साल की हैं। उन्हें भारत की सबसे उम्रदराज महिला तलवारबाज कहा जाता है। वे भारतीय मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू में एक्सपर्ट हैं। 7 साल की उम्र से उन्होंने मार्शल आर्ट्स की क्लास लेना शुरू कर दिया था। वे 68 साल से ज्यादा समय से मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग दे रही हैं।
- 68 साल के दरिपल्ली रमैया तेलंगाना के रहने वाले हैं। रमैया ने 1 करोड़ पेड़ लगाए हैं। उन्हें वृक्ष-पुरुष के नाम से जाना जाता है। उन्होंने भारत को हरा-भरा बनाने की ठानी है। रमैया घर से निकलते वक्त बीज साथ लेकर चलते हैं और जहाँ भी उन्हें खाली ज़मीन दिखाई देती है, वो वहाँ प्लान्टेशन करते हैं।
- गुजरात के रहने वाले डॉ. सुब्रतो दास को हाई-वे मसीहा के नाम से जाना जाता है। वे हाई-वे पर एक्सीडेंट में घायल होने वालों को तुरंत मेडिकल सुविधा मुहैया कराते हैं। सुब्रतो दास एक बार खुद हादसे के शिकार हुए तो अहसास हुआ कि हाइवे पर ऐक्सिडेंट होने पर घायलों को मिलने वाली इमर्जेंसी सर्विस ठीक नहीं है। इसके बाद उन्होंने ‘लाइफ लाइन फाउंडेशन’ की शुरुआत की, जिसका विस्तार अब महाराष्ट्र, केरल, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 4000 किलोमीटर तक है। लाइफ लाइन फाउंडेशन की टीम्स हादसा होने पर 40 मिनट से कम वक्त में पहुँच जाती हैं। अब तक 1200 से ज्यादा घायलों को बचाया जा चुका है।
- 59 साल के बिपिन गनात्रा वालन्टियर फायर फाइटर हैं, जो पिछले 40 साल से कोलकाता में आग लगने वाली हर जगह पर मौजूद रहते हैं और लोगों को बचाने में मदद करते हैं। एक हादसे में अपने भाई को खोने के बाद बिपिन ने ऐसे लोगों की मदद का बीड़ा उठाया, जो आग लगने जैसे हादसों में फँस जाते हैं।
तेलंगाना के रहने वाले 44 साल के चिंताकिंदी मल्लेशम की माँ पोचमपल्ली सिल्क की साडिय़ाँ बनाती थीं। मेहनत के चलते उन्हें बहुत दर्द होता था, मल्लेशम माँ की यह तकलीफ़ देख नहीं पाते थे। माँ का कष्ट दूर करने के लिए उसने लक्ष्मी एएसयू मशीन बनाई। जिससे पोचमपल्ली सिल्क की साडिय़ाँ बनाने वाले कारीगरों की मेहनत और काम में लगने वाला वक्त काफी घट गया। आज पोचमपल्ली सिल्क से साडिय़ाँ बनाने वाले 60प्रतिशत कारीगर इसी मशीन से काम कर रहे हैं।
- पुणे के डॉक्टर मापुस्कर जिन्हें स्वच्छता दूत के नाम से जाना जाता है ने पुणे के देहू गाँव में 1960 से ही सफाई अभियान पर जोर दिया। पूरे गाँव को खुले में शौच करने से रोका और सफाई के लिए जागरूक किया। 2004 में पूरे गाँव में शौचालय बना दिए गए।
- प. बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में रहने वाले करीमुल हक को एम्बुलेंस दादा के नाम से भी जाना जाता है। करीमुल हक ने अपने गाँव धालाबाड़ी में 24 घंटे की एम्बुलेंस सेवा शुरू की। वे गरीब मरीजों को अपनी बाइक पर लेकर हॉस्पिटल पहुँचाते हैं और कई बार वो उन्हें फस्र्ट ऐड भी देते हैं।
- सैकड़ों महिलाओं को मानव तस्करी एवं वेश्यावृत्ति के चंगुल से छुड़ाने वाली नेपाल की अनुराधा कोईराला प्रथम विदेशी महिला हैं; जिन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। उन्होंने सन् 1993 में निर्लाभ संगठन माइती नेपालकी स्थापना की है जो यौन तस्करी के शिकार लोगों की मदद करता है। संगठन के अनुसार भारत एवं अरबी देशों में प्रत्येक वर्ष करीब 5,000 नेपाली लड़कियाँ एवं महिलाएँ वेश्यावृति के लिए मजबूर की जाती हैं। जिसमें पहला स्थान भारत का है।
इसके अलावा देश के दूरदराज के इलाकों में सौ से अधिक सस्ते और टिकाऊ पर्यावरण अनुकूल संस्पेशन ब्रिज बनाने वाले एवं सेतु बंधुके नाम से मशहूर कर्नाटक के गिरीश भारद्वाज, स्वच्छ भारत मिशन शुरू होने से 5 दशक पहले से ही सफाई अभियान में लगे महाराष्ट्र के स्वच्छता दूत डॉ. मापूसकर, पंजाब में सीवर प्रणाली के विकास के लिए फंड जुटाने और कार्यकर्ताओं को आंदोलित करने वाले इको बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल, गुजरात के सूखा प्रभावित जिलों में अनार का सर्वाधिक उत्पादन करने वाले दिव्यांग किसान अनार दादा जेनाभाई दर्गाभाई पटेल, निःशुल्क मूक्स प्रणाली के जरिए हारर्वड और एमिटी विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों को विभिन्न भाषाओं में दुनिया भर में फैलाने वाले भारतीय मूल के अमेरिकी अनंत अग्रवाल। इन सबके साथ पिछले छह दशकों से आदिवासी लोक संगीत को लोकप्रिय बनाने वाली कर्नाटक की गायिका सुकरी बोम्मागौडा, ओडिशा के लोकप्रिय लोक गायक जितेन्द्र हरिपाल और बाल साहित्य तथा स्त्री विमर्श साहित्य को समर्पित असम की 81 वर्षीय लेखिका इली अहमद को भी पद्म पुरस्कार के लिए चुना गया है.
इन सबकी जिंदगी हमारे लिए जीती जागती मिसाल हैं। अब समय आ गया है कि इससे भी उच्च सम्मानों की चयन-प्रक्रिया में भी बदलाव किया जाए ताकि सम्मान के हकदार को ही सम्मान मिले।  ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ी को उनके विशिष्ठ कामों की मिसाल दे सकें।  इन सबकी जिंदगी ऐसी प्रेरक हैं जो बच्चो की पाठ्य पुस्तकों में शामिल की जानी चाहिए। 
उदंती के सुधी पाठकों को नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ-                                     

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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