January 28, 2017

रफ़्तार

    एक सेकंड देर से आया 2017
                     - नवनीत कुमार गुप्ता
धरती की रफ़्तार से तालमेल बिठाए रखने के लिए दिल्ली स्थित सीएसआईआर की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला में भारत की आणविक घड़ी को पल भर के लिए रुकना पड़ा। नए साल की शुरुआत से ठीक पहले यानी रात ग्यारह बजकर उनसठ मिनट उनसठ सेकंड पर लीप सेकंड जोडऩे के लिए आणविक घड़ी एक सेकंड के लिए रोक दी गई। धरती के घूर्णन से तालमेल बिठाने के लिए रविवार की सुबह पाँच बजकर उनतीस मिनट उनसठ सेकंड पर लीप सेकंड जोड़ा गया।
2017 में एक अतिरिक्त सेकंड जोडऩे का मकसद धरती के घूर्णन से तालमेल रखने के अलावा रात और दिन के आधिकारिक समय को भी सही बनाए रखना है। एक अतिरिक्त सेकंड का जुड़ाव एक दिलचस्प वैज्ञानिक अवधारणा है। दरअसल अपने अक्ष पर धरती का घूर्णन एक समान नहीं है। विभिन्न कारणों से कभी इसकी गति तेज़ हो जाती है, तो कभी धीमी। इन कारणों में भूकम्प और समुद्री लहरों पर चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव भी शामिल है। नतीजा यह निकलता है कि औसत सौर समय का आणविक समय या वैश्विक समय के साथ तालमेल लडख़ड़ा जाता है। लिहाज़ा जब औसत सौर समय और वैश्विक समय के बीच फर्क 0.9 सेकंड तक पहुँच जाता है तो आणविक घडिय़ों के ज़रिए वैश्विक समय में लीप सेकंड के नाम से एक अतिरिक्त सेकंड जोड़ दिया जाता है।
सटीक वक्त बताने के लिए लीप सेकंड पूरी दुनिया की घडिय़ों में जोड़ा जाता है। दुनिया भर के कंप्यूटरों में लीप सेकंड 1972 से जोड़े जा रहे हैं और इस बार 27वीं बार लीप सेकंड जोड़ा गया है। एक अतिरिक्त सेकंड के जुडऩे से हमारी रोज़मर्रा की किान्दगी पर तो फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उपग्रह संचालन, अंतरिक्ष विज्ञान और संचार जैसे क्षेत्रों के लिए यह काफी महत्त्वपूर्ण है, जहाँ हर कार्रवाई में बिलकुल सटीक वक्त की ज़रूरत पड़ती है। भारतीय घडिय़ों में लीप सेकंड जोडऩे का काम सीएसआईआर की राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला ने किया, जहाँ विश्व की 300 आणविक घडिय़ों में से पाँच मौजूद हैं। आणविक घडिय़ाँ सबसे सटीक वक्त बताने का ज़रिया है, जिनका संचालन सीज़ियम या अमोनिया के परमाणु कंपन से होता है। इनकी सटीकता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनसे 10 करोड़ साल में सिर्फ एक सेकंड की गलती होती है। (स्रोत फीचर्स)

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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