November 19, 2017

खतराः

 पुआल से ज्यादा घातक हैं 
कूड़े से चल रहे बिजली संयंत्र
दिल्ली के प्रदूषण पर पंजाब के पराली से लेकर पश्चिम एशिया की आँधी तक पर उंगली उठ रही है लेकिन दिल्ली में जलाए जा रहे हजारों टन कचरे पर कोई बात नहीं हो रही है। कचरे में जैविक और अकार्बनिक हर तरह के पदार्थ शामिल होते हैं जिन्हें जलाने से जहरीले रसायन निकलते हैं।
यहाँ तक कि ओखला पावर प्लांट को प्रदूषण फैलाने का दोषी भी पाया गया था जिसके लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस पर जुर्माना भी लगाया था। फिर भी प्रदूषण न रुकने पर इसे बन्द करने की चेतावनी भी दी गई थी। इसके बाद भी पिछले दिनों पर्यावरणविदों के विरोध के बाद भी कचरे से बिजली बनाने के तीन संयंत्र चल रहे हैं और चौथे को चालू करने की कोशिश जारी है।
पर्यावरणविदों ने इस पर सवाल उठाया है। पंजाब में पराली जलाने से प्रदूषण होने को लेकर गम्भीर चर्चा हो रही है लेकिन दिल्ली के अन्दर घनी आबादी वाले इलाके में कूड़े से बिजली बनाने के संयंत्र हैं। विशेषज्ञों का कहना है जिस तरह से पुआल जलाने से प्रदूषण होता है, उसी तरह से कचरा जलाना भी घातक है। इसमें भी जैविक कचरा तो है ही प्लास्टिक सहित कई प्रतिबन्धित चीजें इनमें शामिल हैं। दि टॉक्सिक वॉच अलायंसके संयोजक गोपाल कृष्णन ने हैरानी जताते हुए कहा कि लोग पुआल जलाने पर तो परेशान हैं लेकिन कचरे से बिजली बनाने में उन्हें कोई समस्या नज़र  नहीं आती है।
उन्होंने बताया कि दिल्ली में रोजाना आठ हजार मीट्रिक टन कचरा निकलता है जिनमें से ओखला में दो हजार मीट्रिक टन कचरा जलाकर बिजली बनाई जाती है। वहीं, नरेला बवाना में लगे दो संयंत्रों में क्रमशः तीन और दो हजार मीट्रिक टन कचरे को जलाने वाले संयंत्र लगे हैं। इतना ही नहीं विशेषज्ञों सहित स्थानीय निवासियों के व्यापक विरोध के बाद भी कचरे से बिजली बनाने को मंजूरी दी गई।इसे समाधान के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन पिछले दिनों आईआईटी दिल्ली में हुए सम्मेलन में पेश किए गए वैज्ञानिक परचे में गोपाल कृष्णन ने बताया कि ठोस कचरे को जलाना घातक है। कचरे को जलाने से जहरीले रसायन हवा में घुलते हैं। ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, बेल्जियम सहित कई देश कचरे जलाने की बजाय रिसाइकिल करके उसका इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2006 में योजना आयोग की ओर से गठित टास्क फोर्स के अगुवा डॉ. एसएस खन्ना ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कचरे को जलाना नहीं चाहिए। इसलिए बिजली के संयंत्र लगाने की बजाय जैविक खाद बनाने के कारखाने लगाने चाहिए। (जनसत्ता)

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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