September 15, 2017

भारत की नदियों को बचाने की कोशिश

   भारत की नदियों को बचाने की कोशिश
भारत की युवा वैज्ञानिक शिली डेविड 2009 से जर्मनी के सेंटर फॉर मरीन ट्रॉपिकल इकोलॉजी में रिसर्च कर रही हैं। शिली केरल की पम्बा नदी पर शोध कर रही हैं। वो भारत में दम तोड़ रही नदियों में फिर से जान फूँकना चाहती हैं।
त्रिवेंद्रम के सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज में रिसर्च करने के बाद शिली जर्मनी गईं। उन्होंने डीएएडी (DAAD)  की स्कॉलरशिप के लिए आवेदन किया। जेडएमटी ब्रेमन के प्रोफेसरों को अपने शोध का विषय बताने और समझाने के बाद शिली को दाखिला भी मिला और स्कॉलरशिप भी।
जेडएमटी में वह दक्षिण भारत की तीसरी बड़ी नदी पर रिसर्च कर रही हैं। नदी प्रदूषण से बीमार है। गेस्ट साइंटिस्ट के रूप में शिली जेडएमटी के साथ मिलकर नदी और उसके आस पास के पारिस्थिकीय तंत्र को बचाना चाहती हैं। इसके लिए वह छह-आठ महीने में भारत आती हैं। केरल की पम्बा नदी से पानी के नमूने लेती हैं। खेतों में डाली जाने वाली खाद के नमूने जुटाए जाते हैं। नदी इंसानी दखलदांजी की वजह से मर रही है। शिली कहती हैं, 'पम्बा नदी के आस पास बहुत कृषि संबंधी गतिविधियाँ होती हैं। अहम बात वहाँ श्रद्धालुओं का जमावड़ा भी है।
हम यह जाँच करना चाहते हैं कि कैसे ये सारी गतिविधियाँ पानी की क्वालिटी पर असर डालती हैं। अब तक हमने देखा है कि श्रद्धालुओं के सीजन में नदी में प्रदूषण अथाह बढ़ जाता है।
प्लास्टिक और रसायनों की वजह से पानी में जरूरी पोषक तत्व खत्म होते जा रहे हैं। पानी इतना खराब हो चुका है कि नदी के आस पास बसे इलाकों में बीमारियाँ फैल रही हैं। खेती पर असर पड़ रहा है। शिली ऐसे बुनियादी कारणों का पता लगा रही हैं जो नदियों को जहरीला करते हैं, 'जर्मनी में उदाहरण के लिए देखा जाए तो डिटरजेंट फॉस्फेट फ्री होते हैं। लेकिन भारत में अभी तक डिटरजेंट में मुख्य तत्व फॉस्फेट है, जो पानी को ज्यादा गंदा करता है।
जैव विवधता के लिहाज से भारत में नायाब चीजें मिलती है। हिमालय में जहाँ यूरोप जैसी मछलियाँ हैं तो दक्षिण की नदियों में विषुवत रेखा जैसा जीवन है। लेकिन कचरा इस खूबसूरती को खत्म कर रहा है। शिली कहती हैं, 'भारत में हम कह सकते हैं कि नदियाँ धीरे धीरे मर रही हैं। पानी की क्वालिटी के लगातार गिरने से।
पानी में ऑक्सीजन की मात्रा गिरने से नदी के भीतर चल रहा पारिस्थितिकीय तंत्र मरने लगता है। एक हद के बाद वैज्ञानिक भाषा में नदी को मृत घोषित कर दिया जाता है। एक बार कोई नदी मर जाए तो उसे फिर स्वस्थ करने में कम से कम 30 से 40 साल का वक्त लगता है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण की वजह से यूरोप की कई नदियाँ यह हाल देख चुकी हैं। कुछ नदियों में तो आज तक भी जीवन पूरी तरह नहीं लौट सका है। गंदी होती नदियों का असर मौसम और समुद्र पर भी पड़ता है।
शिली के मुताबिक प्रदूषण फैलाने वाली सभी कारणों को अगर मिला दिया जाए तो भी फायदा उतना नहीं है कि जिससे लंबे समय तक पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके।
रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी
संपादन: आभा मोंढे

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष