September 15, 2017

धरोहर

           पत्थरों से निर्मित 
                   अद्भूत मंदिर भोरमदेव
                                         - गोवर्धन यादव
मध्यप्रदेश के उत्तरीय भाग में पन्ना एवं छतरपुर के मध्य स्थित खजुराहो, 10 वीं एवं 11 वीं शताब्दी में बने हिन्दु मन्दिरों के लिए विश्वविख्यात है। मन्दिरों के दीवालों पर उत्कीर्ण मैथुनरत प्रतिमाएँ हमेशा से उत्सुकता के केन्द्र में रही हैं। इन्हें देखने के लिए लाखों पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं।
ठीक इसी तर्ज पर कवर्धा (छत्तीसगढ़) से लगभग 17 कि।मी। पूर्व की ओर मैकल पर्वत शृंखला पर स्थित ग्राम छपरी के निकट चौरागाँव नामक गाँव में स्थित है। छत्तीसगढ़ का खजुराहों कहा जाने वाला भोरमदेव मन्दिर न केवल छत्तीसगढ, अपितु समकालीन अन्य राजवंशों की कला-शैली के इतिहास में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। 11वीं शताब्दी के अंत में (लगभग 1089 ई.) निर्मित इस मन्दिर मे शैव, वैष्णव एवं जैन प्रतिमाएँ भारतीय संस्कृति एवं कला की उत्कृष्टता की परिचायक है। इन प्रतिमाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि धार्मिक व सहिष्णु राजाओं ने सभी धर्मों के मतावलम्बियों को उदार प्रश्रय दिया था।
किवदन्ती है को गोंड जाति के उपास्य देव भोरमदेव (जो कि महादेव शिव का एक नाम है) के नाम पर निर्मित कराए जाने पर इसका नाम भोरमदेव पड़ गया और आज भी इसी नाम से प्रसिद्ध है।
मन्दिर की स्थापत्य कला शैली मालवा की परमार शैली की प्रतिछाया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व- मध्यकाल (राजपूत काल) में निर्मित सभी मन्दिरों में भोरमदेव सर्वश्रेष्ठ है। निर्माण योजना एवं विषय वस्तु में सूर्य मन्दिर कोणार्क एवं खजुराहो के मन्दिरों के समान होने से इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।
इस मन्दिर का निर्माण, श्री लक्ष्मण देव राय द्वारा कराया गया था। इसकी जानकारी वर्तमान मण्डप में रखी हुई एक दाढ़ी-मूँछ वाले योगी की बैठी हुई मूर्ति, जो 0.89 से.मी. ऊँची एवं 0.67 से.मी. चौड़ी है, पर उत्कीर्ण लेख से प्राप्त होती है। इसी प्रतिमा पर उत्कीर्ण दूसरे लेख में, कलचुरिन संवत् 840 तिथि दी हुई है। इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि यह मन्दिर छठे फणि नागवंशी शासक श्री गोपालदेव के शासन में निर्मित हुआ था।
किन्तु मण्डवा महल से प्राप्त शिलालेख में राजा रामचन्द्र द्वारा निर्माण होना बताया गया है। चूंकि यहाँ $फणिनाग वंश के नागवंशी राजाओं ने लम्बे काल तक राज्य किया, जो कलचुरियों के अधिसत्ता को स्वीकार करते थे। लंबी वंशावली में सर्वप्रथम अहिराज राजा से नागवंश की शुरुआत हुई। शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि अर्तुकन की अनुपम सुंदरी पुत्री मैथिला का एक नागराज से प्रेम हुआ था और इनसे उत्पन्न पुत्र अहिराज से वंश की शुरुआत हुई।
पूर्वाभिमुखी प्रस्तर निर्मित यह मन्दिर, नागर शैली का सुन्दर उदाहरण है। मन्दिर में तीन प्रवेशद्वार हैं- प्रमुख द्वार पूर्व दिशा की ओर, दूसरे का मुख दक्षिण की ओर और तीसरा, उत्तराभिमुखी है। इसमें तीन अर्ध-मंडप, उससे लगे अंतराल और अंत में गर्भगृह है। अर्धमंडप का द्वार शाखों व लता-बेलों से अलंकृत है। द्वार शाखों पर शैव द्वारपाल, परिचारिक,-परिचारिका प्रदर्शित है। मण्डप के तीन दिशाओं के द्वारों के दोनों ओर पाश्र्व में एक-एक स्तंभ है, जिनकी यष्टि अष्ट कोणीय हो गई है। इसकी चौकी उल्ट विकसित कमल के समान है, जिस पर कीचक बने हुए हैं, जो छत का भार थामे हुए हैं।
मण्डप में कुल 16 स्तंभ हैं, जो अलंकरणयुक्त हैं। मण्डप की छत का निर्माण प्रस्तरों को जमाकर किया गया है। छत पर शतदल कमल बना हुआ है। मन्दिर 153 मीटर ऊँचे अधिष्ठान पर निर्मित है। इसकी लम्बाई 1813 और चौड़ाई 1220 मीटर है।
मण्डवा महल
गर्भगृह का मुँह पूर्व की ओर है तथा धरातल 1.50 मीटर गहरा है। इसके ठीक बीच में शिवलिंग प्रतिष्ठित है। छत के ऊपर शतदल कमल बना हुआ है। गर्भगृह में पंचमुखी नाग प्रतिमा, नृत्य गणपति की अष्ट भुजी प्रतिमा, ध्यानमग्न राजपुरुष की पद्मासन में बैठी हुई प्रतिमा, उपासक दंपत्ति प्रतिमा विद्यमान है।
मंदिर के कटिभाग की बाह्य भित्तियाँ अलंकरण युक्त हैं। कटिभाग में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है,जिसमे विष्णु, शिव, चामुण्डा, गणेश आदि की सुन्दर प्रतिमाएँ उल्लेखनीय है। मन्दिर के जंघा पर कोणार्क के सूर्य मन्दिर एवं खजुराहों के मंदिरों की भांति सामाजिक एवं गृहस्थ जीवन से संबंधित अनेक मिथुन दृश्य तीन पंक्तियों में कलात्मक अभिप्रायों समेत उकेरे गए हैं, जिसके माध्यम से समाज के गृहस्थ जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है। मिथुन मूर्त्तियों का यहाँ बाहुल्य है। इन प्रतिमाओं में नायक-नायिकाओं, अप्सराओं की प्रतिमाएं अलंकरण के रुप में निर्मित की गई हैं। प्रदर्शित मिथुन मूर्त्तियों में कुछ सहज मैथुन विधियों का चित्रण तो हुआ है, कुछ काल्पनिक विधियों को भी दिखाने का प्रयास किया गया है। पुरुष नर्तक-नारी नर्तकियों से यह आभास होता है कि दसवीं-ग्यारवीं शताब्दी मे इस क्षेत्र के स्त्री-पुरुष नृत्यकला में रुचि रखते थे। मंजीरा, मृदंग, ढोल, शहनाई, बाँसुरी एवं वीणा आदि वाद्य-उपकरण मूर्तियों के द्वारा बजाए जाते हुए प्रदर्शित हुए हैं। मंदिर के परिसर में संगृहीत प्रतिमाओं में विभिन्न योद्धाओं एवं सती स्तंभ प्रमुख हैं।
भोरमदेव मन्दिर के उत्तर की ओर शिवमन्दिर, दक्षिण में एक शिवमन्दिर जिसे मण्डवा महल के नाम से जाना जाता है,स्थित है। पश्चिम की ओर छेरकी नामक शिवमन्दिर है।
सन् 2002 में मुझे प्रमोशन मिला था और मैं कवर्धा प्रमुख डाकघर में, बतौर पोस्टमास्टर के पद पर पदस्थ हुआ। छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरमदेव के बारे में काफी पहले से सुन रखा था। अपनी ज्वाईनिंग देने के पश्चात् मुझे इन्तजार था उस इतवार का, जिस दिन डाकघर बंद रहता है, अपनी मित्र मण्डली के साथ वहाँ जा पहुँचा और इस अद्भुत मन्दिर के दर्शन- लाभ ले पाया।
छेरकी मंदिर
अगले इतवार को मैंने कवर्धा के वर्तमान विधायक श्री जोगेश्वरराजसिंह से भेंट की,जो भूतपूर्व कवर्धा रियासत के राजा के बेटे हैं। यहाँ जाने से पूर्व मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी। उनकी स्वीकृति मिलने के बाद मै उस भव्य राजप्रसाद के परिसर में जा पहुँचा,जहाँ उन्होंने आगे बढ़कर मेरा स्वागत किया। महल के भीतरी भागों में घुमाया और साथ बैठकर नाश्ता और चाय का भी आनन्द उठाया। मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था- यह पहला मौका है जब कवर्धा के पोस्टमास्टर मुझसे मिलने आए हैं।
जब-जब भी कवर्धा की बात होती है, तो मुझे वहाँ बिताए गए प्रत्येक क्षण की मधुर याद ताजा हो उठती है।
Email-goverdhanyadav44@gmail.com 

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
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