July 25, 2017

व्यंग्य:

आह वर्षा, वाह वर्षा, हाय वर्षा 
- यशवंत कोठारी
वर्षा का आना एक खबर हैं। वर्षा का नहीं आना उससे भी बड़ी खबर है। वर्षा नहीं तो अकाल की खबर हो जाती है। कल तक जो अकाल को लेकर चिल्ला रहे थे वे ही आज वर्षा के आगमन पर हर्ष की अभिव्यक्ति कर बाढ़ -बाढ़ खेल रहे हैं। जो नेता अफसर अकाल की सेवा में थे, वे ही अब बाढ़ की व्यवस्था कर अपना घर भरने में लग  गए  है। आसमान में उमड़ते घुमड़ते बादल, चमकती बिजली, मेघ गर्जन और तेज़ बौछारें मन को गीला कर जाती हैं। उदासी कही दूर पीछे छूट जाती है। मन मयूर नाचने लग जाता है। सरकार में तबादलों की वर्षा है, पहाड़ों पर हरियाली हैं, प्रियतमा चूरमा खाने पहाड़ों की आड़ में चली गई है। यही तो समय होता है वर्षा के आगमन का। कालिदास मेघदूत लिखते है, ऋतुसंहार में वर्षा का अलौकिक वर्णन करते हैं, और मन बौरा जाता हैं। वर्षा कभी स्वयं प्रेमिका बन जाती है कभी मानिनी पत्नी बन जाती है, कभी स्वयं दूती-सा व्यवहार करने लग जाती है कभी मुग्धा नायिका की तरह हो जाती है, तो कभी प्रौढ़ प्रगल्भा की तरह बनने सँवरने लग जाती है। कभी वर्षा सौतन हो जाती है ,तो कभी कठोर सास या फिर सावन के झूले पर बैठी इठलाती भारतीय परम्परागत नारी बन सबको लुभा लेती है। गीत, सावन की बूँदें लेहरिया, गेबर, चूरमा, आभूषण, वस्त्रालंकार मेहन्दी रचे हाथ, मुँह पर चाँदनी की शोभा, मृणाल बाहों में झूलता झूला सब मिलकर वर्षा को वर्षा बनाते है।
मगर आज की वर्षा हे भगवान। राज्य पानी के लिए लड़ रहे है, वर्षा होते ही बिना माँगे पानी दे रहे हैं। कृष्णा कावेरी से लगाकर पंजाब की नदियों से पानी बिना माँगे मिल रहा हैं। आधी रात को बेला महकते हैं, वर्षा आती है। पिया बिन तड़पत मन मोरा, रामचरित मानस में राम कहते हैं। और पिया की खोज में वानर सेना को लगा देते है।
वर्षा है तो मेढक हैं, केंचुएँ हैं, हाथियों की चिंगाड़ है, वर्षा नहीं तो कोयल तक नहीं कूकती।
रात को उमस की गरमी से परेशान रहता हूँ।  सुबह आषाढ़ का बादल देखकर मन प्रसन्न होना चाहता है, मगर अखबार में बाढ़ के समाचार देखकर वर्षा का हर्ष काफ़ूर हो जाता है। मेघों से घिरा मैं स्वयं को बाढ़ से गिरा पाता हूँ। कुछ समझ में नहीं आता तन मन क्यों अलसा रहा है, शायद वर्षा के स्वागत में मन अधीर है।
हवा में खुनक है, वोमन्द-मन्द बादलों को ले जा रही है। जल के बादल रंग बदल रहे है, गिरगिट की तरह या भारतीय राजनेताओं की तरह वे बहे चले जा रहे हैं। दिशाहीन नहीं हैं बादल, वे प्रिया के देश उड़कर जा रहें हैं, मन है कि उनके पीछे भागता चला जा रहा है। तेज वर्षा के कारण बादल फटने के कारण, बिजली गिरने के कारण बाढ़ मे बह जाने के कारण बस गरीब ही मारा जाता हैं। चिड़िया दाना ढूँढ रही है, गरीब के आशियानें में पानी भर गया है ; क्योंकि वर्षा हो रही है। नदी ,नाले, झीलें, तालाब बाँध सब में पानी ही पानी है। चारो तरफ से पानी बहकर वर्षा का आनन्द दे रहा है। वर्षा हो तो अच्छा लगता है, बच्चे उछल कूदकर रहे हैं। छतपर, सड़क पर, नालों में, नंगे बदन नहा रहे हैं। कम उम्र लड़कियाँ भी नहा रही हैं, प्रोढ़ाएँ उन्हें बरज रही है। मगर मन है कि मानता नहीं।
वर्षा ऋतु का आना सर्वत्र साक्षी होता है। पेड़ों पर, जंगलों में, घरों में, तालाबों में सर्वत्र वर्षा दिखाई देती हैं। साक्षी ऋतु सर्वत्र हर्ष को बिखरा देती है। हे वर्षा तुम मरुधरा की वसुन्धरा पर जमकर बरसो।
वर्षा में राजनीति ठंडी पड़ जाती है। अफ़सरी दुबक जाती है। छतें टपकने लग जाती हैं। साहित्य में सीलन आ जाती है। चोर- उचक्के नये- नये वितान तानकर अपने धन्धे पर चल पड़ते हैं।
वर्षा आई तो मन हर्षा। अफ़सर की बेबी बाढ़ में पिकनिक मनाने चल पड़ती है। सरकारी गाड़ी, सरकारी ड्राइवर, सरकारी पेट्रोल, सरकारी अरदली सरकारी खाना-पीना। उन्हें बाढ़ सुन्दर, ब्यूटिफुल और क्यूट दिखाई पड़ती है। और गरीब कच्ची बस्ती की मलिका के साथ फोटो खिँचवाकर अखबार में दे आती है। आह ! वर्षा वर्णन बड़ा सुहाना, वाह वर्षा के क्या कहना, बाढ़ के लिए खरीद में जीमों, चूरमा बाटी की गोठ करो और हाय वर्षा तुम अभी क्यों आई। कुछ समय ठहरती या फिर कब आओगी। मेरे मन मे यही सब गुमड़ रहा है। और बाहर मेढक टर्र-टर्र कर रहे हैं। केंचुए अफसरों की शक्ल में सचिवालय में रेंग रहे है। बरसाती मेढकों की तरह लोग समर्थ की विरुदावलियाँ गा रहे है। वाह वर्षा वाह!
कालिदास तो शृंगार के अप्रतिम कवि है वर्षा, मेढक, सुन्दर स्त्रियाँ, कामदेव उनके प्रिय विषय हैं, वे बताते हैं कि 'बरसात में नदियाँ बहती है, बादल बरसते है, मस्त हाथी चिंघाड़ते है, जंगल हरे- भरे हो जाते हैं, और अपने प्रियतमों से बिछुड़ी स्त्रियाँ दुखी होती हैं। मोर नाचते हैं, और बन्दर गुफाओं में छिप जाते हैं।
सैकड़ों झरनें, हजारों नदियाँ नाले सब लबालब भर जाते हैं। और सर्वत्र पानी ही पानी हो जाता है समुद्र की प्यास को बुझाने चल पड़ती है सैकड़ों नदियाँ, और समुद्र है कि फिर भी प्यासा ही रह जाता है, वह प्यासा ही अगली वर्षा का इन्तज़ार करने लगता है।
धरती पर बिछ गई है एक हरी चादर वर्षा की बूँदें सूर्य की किरणों के कारण हीरों- सी चमक रही है। वीर बहूटियों से धरती अँटी पड़ी है। चारो तरफ वर्षा की झड़ी लगी है। धरती और समुद्र की प्यास बुझाने वर्षा फिर आएगी। इन्दर भगवान की कृपा रहेगी। कृष्ण गोवर्धन पर्वत को तर्जनी पर उठा लेंगे और वृन्दावन ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को आनन्द देंगे।
वर्षा ऋतु सबसे सुन्दर लगती है लोकगीतों में इस सुन्दरता का बड़ा मनोहारी वर्णन है। मैं एक लोकगीत के अंशो के साथ इस प्रबन्ध को समाप्त करने की इजाजत चाहता हूँ -
   कच्ची नीम की निबौरी,
   सावन कब आवेगो?
   बाबा दूर मतदीजोहमकूं
   कौन बुलावेगो?
हे वर्षा मैं तुम्हारा फिर आह्वान करता हूँ। आओ और मुझे भिगोओ।
सम्पर्क: 86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर 302002, फोन 2670596

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