July 25, 2017

वर्षा जल को रोकना होगा - भारत डोगरा

वर्षा जल को रोकना होगा 
- भारत डोगरा

मई की तपती दोपहर में टीकमगढ़ जिले के जताराब्लाक में स्थित वनगॉय गाँव में पहुँचे तो पाया कि यह गाँव बहुत  गम्भीर जल संकट से गुज़र रहा है। 200 परिवारों के इस गाँव में पेयजल मात्र एक हैंडपंप से ही मिल रहा था और वह भी रुक-रुक कर चल रहा था। एक मटका भरता और हैंडपंप रुक जाता। इस स्थिति में लोग दो-दो कि.मी. दूर से कभी बैलगाड़ी पर, कभी साइकिल पर, तो कभी पैदल ही पानी ला रहे हैं। दूषित पानी के उपयोग को भी मजबूर हैं जिससे बीमारियाँ फैल रही हैं। प्यासे पशु संकट में हैं व पिछले लगभग तीन महीनों में ही यहाँ के किसानों के लगभग सौ पशु मर चुके हैं। गाँव का तालाब सूख चुका है। स्कूल में भी पेयजल उपलब्ध नहीं है। प्यास से त्रस्त बच्चे कभी हैंडपंप की और दौड़ते हैं, तो कभी घर की ओर।
समस्या के समाधान के रूप में गाँव वासियों से पूछो तो वे अस्थायी समाधान के रूप में टैंकर भेजने व स्थायी समाधान के रूप में बोर खोदने या टैंक बनाकर पाइपलाइन से पानी पहुँचाने की बात करते हैं। इस संदर्भ में काम पहले ही आरंभ हो जाना था पर किसी न किसी वजह से देरी होती गई।
अत: एक ओर तो प्रशासन पर समुचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाना ज़रूरी है पर दूसरी ओर गाँव समुदाय की अपनी भूमिका भी  महत्त्वपूर्ण है। पिछले वर्ष वर्षा ठीक से हो गई थी, अत: गाँव के तालाब में काफी पानी आ गया था। पर गेहूँ की खेती के लिए इस जल का इतना अधिक उपयोग कर लिया गया कि गर्मी के दिनों में पशुओं की प्यास बुझाने लायक पानी भी नहीं बचा।
इस क्षेत्र में जल संकट दूर करने के लिए प्रयासरत संस्था परमार्थ के स्थानीय समन्वयक रवि प्रताप तोमर बताते हैं कि ऐसी समस्या यहाँ के कई गाँवों में है। अत: पेयजल संकट दूर करने के लिए गाँव समाज का अपना अनुशासन भी ज़रूरी है।
इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे गाँव भी है जहाँ कमज़ोर वर्गों, विशेषकर दलित व आदिवासी समुदाय, के जल अधिकारों की उपेक्षा होती है। उदाहरण के लिए मोटो गाँव में आरंभ में दलित व कमज़ोर वर्ग को एक कुएँ को साफ करने व उसकी मरम्मत करने से दबंगों ने रोक दिया था। इस स्थिति में जल-जन-जोड़ो अभियान के कार्यकर्ताओं ने कमज़ोर वर्ग की महिलाओं की सहायता की व उन्हें प्रोत्साहित किया ताकि वे दबंगों के अवरोध की परवाह न करते हुए कुएँ को ठीक कर सकें।
इस अभियान के राष्ट्रीय संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि सामंती असर व विषमता के कारण अनेक गाँवों में स्थितियाँ विकट हैं। यहाँ कमज़ोर वर्ग के जल अधिकारों पर ध्यान देने की विशेष ज़रूरत है। इस स्थिति में बुंदेलखंड के अनेक गाँवों में कमज़ोर वर्ग की अनेक महिलाओं को जल सहेलियों के रूप में चयनित किया गया है व गाँवों में पानी पंचायतों का गठन करते समय कमज़ोर वर्गों को अच्छा प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस तरह यह जल संकट हल करने के प्रयासों को सामाजिक स्तर पर समावेशी बनाने का प्रयास है।

परमार्थ संस्था के एक समन्वयक मनीष कुमार अपने अनुभवों के आधार पर बताते हैं कि उपयोग किए गए जल को बेकार बहने से रोक कर सब्ज़ी उत्पादन व किचन गार्डन में उसका उपयोग किया जा सकता है जिससे पोषण सुरक्षा में बहुत मदद मिल सकती है।
सबसे बड़ी ज़रूरत है वर्षा के जल को भलीभांति रोकना जिसके लिए जन भागीदारी से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नियोजन ज़रूरी है। जल संरक्षण पर हुए बहुत से खर्च के सही परिणाम नहीं मिलते हैं क्योंकि स्थानीय लोगों, विशेषकर ज़रूरतमंदों व छोटे किसानों से पर्याप्त विमर्श के बिना ही इन्हें जल्दबाज़ी में बनाया जाता है। निर्णय इस आधार पर नहीं लिया जाता कि कहाँ निर्माण करने से अधिकतम जल बचेगा, अपितु इस आधार पर लिया जाता है कि कहाँ निर्माण करने से अधिक पैसा गलत ढंग से बचा लिया जाएगा।
इसी तरह परंपरागत तालाबों का उपयोग सभी लोगों का जल संकट दूर करने के लिए नहीं हो सका है; क्योंकि कई दबंग लोग इन पर व इनके जल-ग्रहण क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लेते हैं। इस स्थिति में इन तालाबों को गहरा करने व इनकी सफाई का कार्य उपेक्षित रह जाता है, व इनमें पर्याप्त पानी का प्रवेश भी नहीं हो सकता है।
इस तरह किसी भी गाँव के जल-संकट को दूर करने के विभिन्न सामाजिक व तकनीकी पक्ष हैं व इन सभी पर ध्यान देकर जल संकट दूर करने की समग्र योजना गाँव व पंचायत के स्तर पर बननी चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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