February 19, 2017

रहन-सहन

 समुद्र तटीय क्षेत्रों की गहराती समस्याएँ
                                                - भारत डोगरा
भारत में समुद्र तटीय क्षेत्र लगभग 7000 कि.मी. तक फैला हुआ है। विश्व के सबसे लंबे समुद्र तटीय क्षेत्रों वाले देशों में भारत की गिनती होती है। समुद्र तट सदा अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध रहे हैं और विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी समुद्र तट के अनेक क्षेत्र पर्यटक स्थलों के रूप में विकसित व विख्यात हुए हैं।
किन्तु समुद्र तटीय क्षेत्रों का एक दूसरा पक्ष भी है जो उनके प्राकृतिक सौंदर्य के कारण छिपा रह जाता है। यह हकीकत यहाँ जीवन के बढ़ते खतरों के बारे में है। समुद्र तटीय क्षेत्रों में आने वाले कई तूफान व चक्रवात पहले से अधिक खतरनाक होते जा रहे हैं। इसे वैज्ञानिक जलवायु बदलाव से जोड़ कर देख रहे हैं। जलवायु बदलाव के कारण समुद्र में जल-स्तर का बढ़ना निश्चित है। इस कारण अनेक समुद्र तटीय क्षेत्र डूब सकते हैं। समुद्र तट के कई गाँवों के जलमग्न होने के समाचार मिलने भी लगे हैं। भविष्य में खतरा बढऩे की पूरी संभावना है, जिससे गाँवों के अतिरिक्त समुद्र तट के बड़े शहर व महानगर भी संकटग्रस्त हो सकते हैं।
जहाँ समुद्र तटीय क्षेत्रों के पर्यटन स्थलों की सुंदरता व पर्यटकों की भीड़ की चर्चा बहुत होती है, वहीं पर इन क्षेत्रों के लिए गुपचुप बढ़ते संकटों की चर्चा बहुत कम होती है। हमारे देश में समुद्र तटीय क्षेत्र बहुत लंबा होने के बावजूद कोई हिन्दी-भाषी राज्य समुद्र तट से नहीं जुड़ा है। शायद इस कारण हिन्दी मीडिया में तटीय क्षेत्रों की गहराती समस्याओं की चर्चा विशेष तौर पर कम होती है।
इस ओर अधिक ध्यान देना ज़रूरी है। वैसे भी समुद्र तट क्षेत्र में आने वाले तूफानों का असर दूर-दूर तक पड़ता है। दूसरी ओर, दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाले बाँधों का असर समुद्र तट तक भी पहुँचता है।
तट रक्षा व विकास परामर्श समिति के अनुसार भारत के तट क्षेत्र का लगभग 30 प्रतिशत 2012 तक समुद्री कटाव से प्रभावित होने लगा था। इस बढ़ते कटाव के कारण कई बस्तियाँ और गाँव उजड़ रहे हैं। कई मछुआरे और किसान तटों से कुछ दूरी पर अपने आवास नए सिरे से बनाते हैं पर कुछ समय बाद ये भी संकटग्रस्त हो जाते हैं।
सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) में घोराबारा टापू एक ऐसा टापू है जो समुद्री कटाव से बुरी तरह पीडि़त है। 50 वर्ष पहले यहाँ 2 लाख की जनसंख्या और 20,000 एकड़ भूमि थी। इस समय यहाँ मात्र 800 एकड़ भूमि बची है और 5000 लोग ही हैं। इससे पता चलता है कि समुद्र व नदी ने यहाँ की कितनी मीन छीन ली है।
अनेक समुद्र तटीय क्षेत्रों में रेत व अन्य खनिजों का खनन बहुत निर्ममता से हुआ है। इस कारण समुद्र का कटाव बहुत बढ़ गया है। कुछ समुद्र तटीय क्षेत्रों में वहाँ के विशेष वन (मैन्ग्रोव) बुरी तरह उजाड़े गए हैं। इन कारणों से सामान्य समय में कटाव बढ़ा है व समुद्री तूफानों के समय क्षति भी अधिक होती है। नए बंदरगाह बहुत तेज़ी से बनाए जा रहे हैं और कुछ विशेषज्ञों ने कहा है कि जितनी ज़रूरत है उससे अधिक बनाए जा रहे हैं। इनकी वजह से भी कटाव बढ़ रहा है।
समुद्र किनारे जहाँ तूफान की अधिक संभावना है वहाँ ख़तरनाक उद्योग लगाने से परहे करना चाहिए। पर समुद्र किनारे अनेक परमाणु बिजली संयंत्र व खतरनाक उद्योग हाल के समय में तेज़ी  से लगाए गए हैं ,जो प्रतिकूल स्थितियों में गंभीर खतरे उत्पन्न कर सकते हैं।
अनेक बड़े बाँधों के निर्माण से नदियों के डेल्टा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में व वेग से अब नदियों का मीठा पानी नहीं पहुँचता है और इस कारण समुद्र के खारे पानी को और आगे बढऩे का अवसर मिलता है। इस तरह कई समुद्र तटीय क्षेत्रों के जल स्रोतों व भूजल में खारापन आ जाता है ,जिससे पेयजल और सिंचाई, सब तरह की जल सम्बन्धी रूरतें पूरी करने में बहुत कठिनाई आती है।
इस तरह के बदलाव का असर मछलियों, अन्य जलीय जीवों व उनके प्रजनन पर भी पड़ता है। मछलियों की संख्या कम होने का प्रतिकूल असर परम्परागत मछुआरों को सहना पड़ता है। इन मछुआरों के लिए अनेक अन्य संकट भी बढ़ रहे हैं। मछली पकडऩे के मशीनीकृत तरीके बढ़ने  से मछलियों की संख्या भी कम हो रही है व परंपरागत मछुआरों के अवसर तो और भी कम हो रहे हैं। समुद्र तट पर पर्यटन व होटल बनाने के साथ कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। कई मछुआरों व उनकी बस्तियों को उनके मूल स्थान से हटाया जा रहा है।
तट के पास का समुद्री जल जैव विविधता को बनाए रखने व जलीय जीवों के प्रजनन के लिए विशेष महत्त्व का होता है। प्रदूषण बढऩे के कारण समुद्री जीवों पर अत्यधिक प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
समुद्र तटीय क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के लिए कई स्तरों पर प्रयास की
ज़रूरत है। इन समस्याओं पर उचित समय पर ध्यान देना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती. com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी,कविता, गीत,गजल, व्यंग्य,निबंध,लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है।आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष