February 19, 2017

जीवन- दर्शन

सच बोलने का साहस
- विजय जोशी
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक भेल, भोपाल)

सत्य शाश्वत तथा सुंदर है तथा हर स्थिति में प्रासंगिक है, किन्तु विपरित परिस्थितियों में अनिष्ट की आशंका के मद्देनजर आदमी सच बोलने से कतरा जाता है और झूठ का सहारा लेने लगता है। लेकिन याद रहे झूठ के पैर नहीं होते। वह अधिक दिन चल नहीं पाता और एक दिन एक्सपोज हो जाता है। ऐसी स्थिति में आदमी अधिक बड़े संकट से घिर जाता है।
एक बार एक राजा ने अपने उत्तराधिकारी को परिवार या दरबारियों के मध्य से ही चुनने की परंपरा को तिलाजंली देते हुए नगर के नौजवानों को आमंत्रित किया। हर एक को एक एक बीज देते हुए एक वर्ष बाद अपने योगदान सहित लौटने हेतु कहा।
सब प्रसन्नतापूर्वक अपने घरों को चले गए तथा उनको गमलों में रोप दिया। कस्बई मनोवृत्ति वाले एक नौजवान ने यही उपक्रम किया तथा रोज गमले में पानी देने लगा। दिन बीतते रहे, वह पूरा जतन से नियमपूर्वक पानी देता रहा लेकिन परिस्थिति पूर्ववत् ही रही। उसके गमले में कोई पौधा नहीं  उगा।
एक वर्ष बाद दरबार में प्रसन्न मुद्रा में सब एकत्र हुए रंग बिरंगे सुंदर पुष्प सज्जित गमलों वाले अपने पौधों के साथ, मात्र उस कस्बई युवक के जो केवल अपने गमले के साथ कोने में निराशा के भाव से मन मसोसकर खड़ा हुआ था।
राजा का पर्दापण हुआ। सबको देखने के बाद उनकी दृष्टि कोने में छुप रहे उस युवक की ओर गई। उन्होंने सैनिकों से उसे आगे लाकर खड़ा करने को कहा। वह सबके उपहास का पात्र बन गया। राजा ने सबको डाँटते हुए चुप रहने को कहा तथा घोषणा की कि यही बालक राज्य का अगला उत्तराधिकारी है।
राजा ने अपना कथन जारी रखा- एक वर्ष पूर्व मैनें सबको जो बीज दिये थे ,वे उबले हुए थे तथा उनमें अकुंरण संभव ही नहीं था। सबने अपनी प्रगति को देखकर स्वार्थवश उन्हें नये बीजों से बदल दिया, केवल इस युवक के , जिसने न तो सच्चाई का मार्ग छोड़ा और न प्रयत्न करना।
सबके सर शर्म से झुक गए।
बात का सारांश मात्र इतना है कि कठिनाई के मार्ग में जब आप सत्य का दामन न छोड़ते हुए अपने प्रयत्न ईमानदारी से जारी रखते हैं तो सफलता निश्चित है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है धैर्य तथा सत्य में विश्वास। अमूमन लोग सच बोलने का अहंकार पाल लेते हैं, जबकि सच बोलने का तो साहस होना चाहिए। सत्यकाम की माँ ने उसे यही सिखाया था और उसी निर्भीकता से उसने सत्य का साथ दिया। यही कारण है कि आज भी उसका नाम चिर स्थायी है। कहा ही गया है- सत्यमेव जयते। अंतत: सत्य की ही जीत होती है।
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