May 16, 2014

दो लोक कथाएँ , दो बाल गीत

 -लाला जगदलपुरी 

1. भेड़े की भिड़न्त
  
1      भेड़ा जा रहा था। सियार गूलर के पेड़ पर चढ़ा हुआ था। पेड़ पर बहुत से फल लगे थे। भेड़ा फलों को देख वहाँ रुक गया। उसने सियार से कहा, 'मित्र! एक फल मेरे लिए भी तोड़ कर गिरा दो। मैं गूलर का स्वाद लेना चाहता हूँ। देखूँ तोकैसा लगता है?’
सियार ने भेड़े के लिए एक कच्चा फल तोड़ कर नीचे गिरा दिया। कच्चा फल देख कर सियार की धूर्त्तता पर गुस्सा आयाकिन्तु क्या करता! विवश था। बोला, 'मेरे लिए तूने कच्चा फल गिराया। मैं भी देख लूँगा तुझे।और वहाँ से चल दिया।
समीप के गाँव में कहीं से एक राक्षसी आई। डर के मारे गाँव के लोग बाल-बच्चों सहित प्राण बचाने के लिए जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। राक्षसी ने एक अच्छे से मकान में डेरा जमाया और इधर-उधर से स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ लाकर वहाँ जमा करती गई।
एक दिन की बात। राक्षसी कहीं बाहर घूमने गई  हुई थी। उसके सूने घरमें भेड़ा आया और उसके मकान में घुस गया। भेड़े ने वहाँ स्वादिष्ट वस्तुएँ देखीं। फिर क्या था! भेड़ा खाने में जुट गया। वह चबा-चबाकर चबैने खा रहा था। उसी समय राक्षसी लौटी। उसे घर में किसी के होने की आहट मिली। चबैनों के चबाए जाने की आवाज़ साफ़ सुनाई  दे रही थी। राक्षसी ने जोर से आवाज दी, 'कौन हे रेमेरे मकान में?’
भेड़े ने उत्तर दिया, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ यह सुन कर राक्षसी काँप उठी। तुरन्त भागी वहाँ से। रास्ते में उसे एक नाग मिला। राक्षसी को बेतहाशा भागते देख कर नाग ने उसे रोक कर भागने का कारण पूछा। इस पर राक्षसी ने बताया कि मेरे घर में जाने कौन घुस गया! कहता हैमैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ साँप ने उसे ढाढ़स दिया। कहा, 'घबराने की ज़रूरत नहीं है। चलोमैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। मैं उसे डस लूँगा। उसके प्राण निकल जाएँगे।
फिर दोनों वहाँ से रवाना हुए। पहुँचे। राक्षसी ने दरवाजे पर से ही आवाज़ लगाई, 'कौन हैमेरे मकान में?’ उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को पकड़ कर छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार!
भेड़े की धमकी का पूरा-पूरा असर दोनों पर हुआ। दोनों भागे वहाँ से। उन्हें भागते देख लिया जंगल के एक बाघ ने। उसने उन्हें रोका। भागने का कारण पूछा। राक्षसी ने उसे भी कारण बतायाक्या बताऊँमेरे घर में पता नहीं कौन घुस गया है। मुझे खदेड़ कर खा जाना चाहता है। अब तुम्हीं बताओ कि अब क्या उपाय करें?’
बाघ यह सब सुन कर जोश में आ गया। बोला, 'चलो तोजरा मैं भी तो देखूँकौन है! नानी याद आ जायेगी उसे।
इस बार तीनों रवाना हुए राक्षसीसाँप और बाघ। दरवाजे के पास खड़े हो कर राक्षसी ने जोर से हाँक लगाई, 'कौन है मेरे मकान में?’
भीतर से फिर उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार! बाघ की खाल उतारने वाला भेड़-कुमार!
बाघ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई  और वह भागता नजर आया। उसके साथ-साथ राक्षसी और साँप भी भागे। उनके भागते ही भेड़ अब यह सोच कर बाहर निकल आया कि अधिक समय तक भीतर घुसे रहना खतरे से खाली नहीं है। और वह जंगल की ओर चल पड़ा। वह स्वादिष्ट चबैनों का मज़ा लेता हुआ चला जा रहा था। रास्ते में वही जाना-पहचान सियार मिला। वह लालच में आकर भेड़े से बोला, 'क्या खा रहे होमित्रमुझे नहीं दोगे?’
भेड़े ने तुरन्त जवाब दिया, 'उस दिन तुमने मेरे लिए पेड़ से कच्चा गूलर गिराया थायाद है?’
इतने में सियार ने सफाई दी, 'क्या करता मित्र! बच्चों को गूलर कहीं कम न पड़ जायेंइस बात की चिन्ता थी और इसीलिए मैंने कच्चा गूलर गिरा दिया था। मुझे खेद है।

भेड़ा सियार की दलील सुन कर हँसा और उसने उसे सुझाव दियायहाँ से थोड़ी दूरी पर एक आलीशान मकान है। वहाँ बहुत- सी स्वादिष्ट वस्तुएँ रखी हैं। वहाँ कोई नहीं है। वहीं से मैं खाता आ रहा हूँ। साहस होतो वहाँ घुसकर तुम भी उन वस्तुओं को खाकर तृप्त हो सकते हो। चलोमैं तुम्हें वहाँ तक पहुँचा आऊँ। ऐसा कह सियार को ले कर भेड़ा रवाना हुआ। उसे ठिकाने पर पहुँचा और दूर से मकान को दिखाकर लौट आया। सियार खुशी-खुशी बिना सोचे-विचारे अचानक भीतर प्रवेश कर गया। उस समय राक्षसी मकान में पहुँच गई  थी और भोजन बना रही थी। सियार को देखकर राक्षसी के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसकी ऐसी मरम्मत की कि सियार वहीं ढेर हो गया। राक्षसी ने उस दिन सियार के मांस के साथ भोजन किया।

    2. असत्य का राज्य
एक साँप पिटारी में बंद पड़ा था। एक राहगीर उधर से निकला। उसकी दृष्टि उस पिटारी पर पड़ी। वह पिटारी के करीब पहुँचा। पिटारी के छेद में से साँप ने भी उसे देख लिया और सहायता के लिये चिल्लाया। राहगीर को साँप की स्थिति पर दया आई । उसने सोचा कि इस बेचारे को पिटारी से मुक्त कर दूँताकि यह खुली हवा में साँस ले सके। ऐसा सोच कर उसने पिटारी खोल दी। पिटारी से निकलते ही साँप ने अपनी धूर्त्तता दिखाई । वह उस राहगीर की ओर बढ़ा। मुसाफिर को उसका इरादा समझते देर न लगी। उसने साँप से कहा, 'अरे! भाईमैंने तुम्हें पिटारी से मुक्त किया है और तुम मुझे ही काट खाना चाहते हो?’
साँप ने उत्तर दिया, 'झूठ। तुमने मुझे कहाँ मुक्त किया हैक्या तुम्हें नहीं मालूम कि आजकल दुनिया में झूठ का राज्य चल रहा है?’
राहगीर बोला, 'मैं यह नहीं मानता। झूठ की क्या औकातसत्य का राज्य चल रहा है भाईसत्य का।’ सामने एक बैल चर रहा था। दोनों उस बैल के पास पहुँचे। उससे पूछा, 'बैल भाईइन दिनों में संसार में किसका राज्य चल रहा हैझूठ का अथवा सत्य का?’ बैल ने  जवाब दिया, 'आजकल राज्य चल रहा है झूठ का। विश्वासघाती जिसका मन्त्री है। देखोमैं कितनी मेहनत करता हूँ। जो देते हैंखा लेता हूँ। बात मानता हूँ फिर भी मुझे डंडे पड़ते हैं। सत्य का राज्य होता तो मुझे मेरी नेकी का उचित परिणाम न मिलता?’
बैल के उत्तर से साँप को गर्व हुआ और वह राहगीर को फिर दौड़ाने लगा। राहगीर प्राण लेकर भागा जा रहा था और साँप बेरहमी से उसका पीछा कर रहा था। जाते-जाते एक फलदार पुराना पेड़ मिला। आदमी ने रुककर उससे भी पूछ लिया, 'क्यों भाईपेड़! क्या तुम बता सकते हो कि इन दिनों दुनिया में किसका राज्य चल रहा हैसच का या झूठ का?’
पेड़ ने तपाक से कह दिया, 'झूठ का। क्योंकि लोग मेरे बाल-बच्चों को खुले आम मुझसे छीन लेते हैं। उन्हें तराश-तराश कर खा जाते हैं और मुझे भी काट डालते हैंजला देते हैं। ऐसा अँधेर केवल असत्य के राज्य में ही हो सकता है।
आदमी पेड़ की बात सुन कर फिर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। अन्त में उन्हें एक साधु मिला। उन्हें भागते देख कर बाबाजी ने कहा, 'साँप ठीक ही तो कहता है। असत्य के राज्य में वह सिर क्यों न उठायेमौके का लाभ न उठानाबेवकूफी का सबसे बड़ा सबूत है।’ फिर भी साधू ने दोनों को आश्वासन देते हुए कहा, 'हम इसका न्याय अभी किए देते हैं। किन्तु भाईसाँप! जरा यह तो बताओ कि पिटारी में तुम किस तरह बन्द थे?’ यह सोच कर कि बाबाजी उसके पक्ष में ही फैसला देंगेसाँप फिर से पिटारी में घुस गया। साँप के घुसते ही बाबाजी ने पिटारी का मुँह एक मजबूत रस्सी से बाँध दिया और पास के पेड़ में उसे लटका दिया। राहगीर साधु को प्रणाम करके घर चला गया और साधु भी साँप को यह बताकर चल दिया कि, 'भाई साँप! आजकल असत्य का राज्य चल रहा हैइसमें संदेह नहीं। प्रमाण सामने है।
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बाल गीत
 जा तितली  
 जा तितली आ जा तितली
उडऩा हमें सिखा जा तितली
बुला रहे हैं रम्मू-कम्मू
साथी उन्हें बना जा तितली।
खुली हथेली पर तू क्षण भर
बैठजरा सुस्ता जा तितली
कितने फूल-कटोरों का तू
पी आई रस ताजा तितली
क्या तू उतरी परी-लोक से
हाँतो हाल सुना जा तितली। 


छत्तीसगढ़ी बाल गीत


सुनव-सुनव रे मुसवा मन








सुनव-सुनव रे मुसवा मन
गुन ला गाही जउने मोर,
साद बुताही जउने मोर
सेवा करिहय जउने मोर
तउने पाहय नवाँ अँजोर
म्याऊँ-म्याऊँ मोर बचन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
कोनो होवयँ सोन मढ़े
कोनो होवयँ रतन जड़े
फेर मोर ले कोन बड़े
बिलवा बोलिस पड़े-पड़े
मोर घरो-घर सिंहासन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
भूँकिस कुकुर भों-भों-भों
भागिस बिलवा मरों-जियों
फुटिस ढोल घमंडी के
खुल गे पोल घमंडी के
सुन ले भइया मनराखन।
(सुनो-सुनो हे चूहो तुम। जो गाएगा गुण मेरेजो पूरी करेगा मेरी साधजो करेगा मेरी सेवावही पायेगा नया उजियाराम्याऊँ-म्याऊँ मेरे बोलसुनो-सुनो हे चूहो तुम। हो कोई भी सोने से मढ़ाहो कोई भी रत्नों से जड़ातो भी मुझसे कौन बड़ाबिल्ला बोला पड़ा-पड़ाघर-घर में मेरा सिंहासनसुनो-सुनो हे चूहो तुम। कुत्ता भौंका भों-भों-भोंभागा बिल्ला बचाकर प्राणफूट गया ढोल घमंडी काखुल गई  पोल घमंडी कीसुन ले भैया मनराखन।)



  

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