February 23, 2018

जीवन दर्शन

बटन बंद करने की योग्यता
- विजय जोशी 
(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल)
एट्सो (एबिलिटी टू स्विच आफ) यानी बटन बंद करने की योग्यता, इस दर्शन से मुझे हाइडलबर्ग सीमेंट्स, जर्मनी की भारत इकाई के निदेशक श्री जमशेद कूपर ने अवगत कराया। दो दशक पूर्व तक न तो हमारे पास मोबाइल थे और न ई- मेल, तब भी हम प्रगति और विकास कर पा रहे थे। आज संस्थाएँ चतुर हो गई हैं। केवल एक लेप टाप व मोबाइल की सुविधा प्रदान कर उन्होंने हमें हमारे प्रियजनों के साथ बिताए जाने वाले पलों को हमसे छीन लिया है।
सोचिए, मोबाइल पर एक रिंग बजते ही हम अपने बच्चों से बात करना छोड़ की- पेड पर उँगलियाँ चलाते हुए स्क्रीन पर नजर गड़ा देते हैंमानों संसार के धराशायी हो जाने जैसा कोई समाचार प्रतीक्षारत हो और जिसे जानकर कार्यवाही करना हमारे उत्तरदायित्व का अंग हो।
आज तक कुछ ही लोग समझ पाए हैं  कि टेक्नालॉजी ने उनके साथ क्या कर दिया। कंपनियाँ या संस्थाएँ मुस्कुरा रही हैं कि मात्र 8 घंटे के दाम देकर वे आपको 24 घंटों के लिए बंधक बना चुकी हैं।
इस दिशा में सबसे पहला कदम वाक्सवेगन नामक जर्मन कंपनी ने उठाया, जब वर्कर्स की मांग पर पहली शिफ्ट समाप्ति के 30 मिनट पूर्व से अगली शिफ्ट शुरू होने के 30 मिनट बाद तक अपने सर्वर बंद करना आरंभ कर दिया। कंपनी का उद्देश्य उनसे काम लेने का था। जर्मनीवासी निजी जीवन में टेक्नालॉजी के इस अतिक्रमण को लेकर काफी संवेदनशील हो गए हैं।
यह सच है कि संवाद की सुविधा से उत्पादकता में अभिवृद्धि हो रही है लेकिन दूसरी ओर यह चिंता बढऩे का कारण भी बन रही है। मेल या मोबाइल से अंतरंगता हमें अपनों से दूर ले जा रही है। हम एक बार आगत मेल का अवलोकन करने के बाद भी बार-बार इन-बाक्स को आदतन क्लिक करते रहते हैं। और तो और खाली इन बाक्स अब हमें किसी हद तक अवसाद की ओर भी ले जाने लगा है।
एरोस नामक फ्रेंच कंपनी ने पाया कि वर्कर्स आंतरिक संदेशों पर ही कई घंटे बर्बाद कर देते हैं अत: उनके यहाँ इस सुविधा में कटौती करते हुए 2014 से आंतरिक ई- मेल संवाद पर पूरी तरह प्रतिबंध का निर्णय ले लिया गया है। एक सर्वे के मुताबिक 100 % में से केवल 15 %- मेल ही उपयोगी थीं। एक अन्य डिटर्जेंट कंपनी हेंकल ने तो क्रिसमस एवं नववर्ष के बीच केवल अत्यावश्यक मेल की अनुमति ही प्रदान की है।
एक अन्य विद्वान ओर्ता ओसोरियो ने कहा कि जब मैं स्काटलेंड से अपने 90 वर्षीय पिता के साथ छुट्टी मनाकर लौटा तो एक अद्भुत अनुभव से मेरा साक्षात्कार हुआ। बच्चे वहाँ पर वर्तमान उपकरण जैसे लैपटाप, मेल, टी.वी. की सुविधा के अभाव में गंभीर पढ़ाई की ओर उन्मुख हुए। आपस में खूब बातचीत की, जल्दी उठना आरंभ किया और वे उपकरण के बदले अपने उस पिता के साथ थे, जो उन्हें वहाँ पर आसानी से उपलब्ध भी था।
मेरे विद्वान मित्र श्री जमशेद आगे कहते हैं कि पिछले एक वर्ष में मैंने भी बटन बंद कर पाने की योग्यता के गुण का विकास अपने व्यक्तित्व में करने का प्रयास किया है। मैं घर पहुँचने के पश्चात न तो लेपटाप को छूता हूँ और न मोबाइल को। और यदि छूना आवश्यक हो भी जाए तो एक लंबे अंतराल के बाद। इसी को कहते है बटन बंद करने की योग्यता का सिद्धांत।  
 सम्पर्कः 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, 

1 Comment:

Unknown said...

आज के परिप्रेषय में सार्थक।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष