July 25, 2017

संस्मरण:

 कृपा बनाए रखना नागबाबा 
- भावना सक्सैना
जीवन की रफ़्तार में जहाँ कई चीज़ें पीछे छूट जाती हैं वहीँ बहुत सारी ऐसी बातें हैं ,जो शिलाओं पर उत्कीर्ण आकृतियों की तरह स्मृतियों में अंकित रहती हैं। कुछ स्मृतियाँ किसी अवसर से तो कुछ किसी मौसम से जुड़ी रहती हैं। कई बार कोई सुगंध कुछ याद दिला जाती है,तो कई बार वर्षा की फुहार किसी दूसरे समय और काल में पहुँचा आती है।
श्रावण मास आरम्भ होते ही जहाँ एक ओर मन बचपन की अल्हड़ शरारतों, जानबूझकर बहाने से जी भरकर भीगने, चिंता में डूबी मीठी झिड़कियों, कागज़ की कश्तियों और आम की गुठली के बाजों की यादों में भीग जाता है वही सावन के सारे त्योहार अतीत से पुकारते- से महसूस होते हैं।
उन्हीं पर्वों में से एक है नागपंचमी जिसे श्रावण के शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। बचपन में अम्मा के घर सभी त्योहार पूरी आस्था से मनाए जाते थे। यूँ हर दिन की शुरुआत ही अम्मा की आरती के पावन वातावरण से होती और साँझ भी दिया-बाती के साथ ही होती थी, उत्सव-त्योहारों पर पूजा अर्चना और भी विशेष हो जाती थी। नागपंचमी से एक दिन पहले घर के प्रवेशद्वार के दोनों तरफ की दीवारों पर अम्मा पंचभुज के आकर में गोबर से लीप कर स्थान को स्वच्छ कर देती थी, ताकि अगली सुबह तक वह सूख जाए। अम्मा का पंचभुज एक झोंपड़ी जैसा होता, जिसकी सभी रेखाएँ वह यथासंभव सीधी रखती; लेकिन मैं फिर भी अपना पैमाना और पेंसिल लाकर उसे नाप -नाप कर सीधा कराती और वह हँसते हुई कहती 'ले कर दिया सीधा, अब ठीक! अगली बार से ये पूरा काम तुम ही करनाऔर मैं नहीं, नहीं कहती अपने पैमाने पर कहीं -कहीं लग चुके गोबर को साबुन से रगड़ कर धोने भाग जाती.... बेचारी छोटी- सी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ऩे वाली बच्ची गोबर को हाथ लगाने के ख्याल से उस समय तो दुबक जाती थी! लेकिन अगली सुबह का काम करने को तत्पर रहती और वह था क्यारी से ताज़े-ताज़े हरे पत्ते लेकर उस पंचभुज पर तब तक रगड़ना, जब तक कि वह अच्छे से हरा न हो जाए। इसके लिए अकसर तोरई या सेम के पत्ते काम में लाए जाते; क्योंकि वे थोड़े बड़े और रसदार होते थे। उस सुबह का दूसरा काम होता था तवे पर दूध में कच्चा कोयला घिसना और वह छोटी बुआ का काम होता। उसके बाद मैं पूरे उत्साह के साथ उस पंचभुज में झाड़ू की सींक के आगे थोड़ी सी रुई लपेटकर नाग की कोठरी और नागों की लहराती पाँच आकृतियाँ बनाती। कभी -कभी कोठरी की किनारी को ज्यादा सजाती तो अम्मा कहतीं -नाग बाबा को सुन्दर कोठरी नहीं दूध चाहिए।  मैं तपाक से उत्तर देती -कोठरी सुन्दर होगी तो वह ज्यादा खुश होंगे, मैं अपनी जानकारी उनको बघारती और कहती अम्मा साँप तो चूहे और कीड़े-मकोड़े खाते हैं, वे दूध नहीं पीते और अम्मा समझाती कि वे चूहों और कीड़े-मकोड़े को हमारी और खेतों की रक्षा के लिए ही खाते हैं। वह बताती थी कि बारिश के मौसम में बहुत से साँप निकलते हैं, यदि हम नागपंचमी पर उनकी पूजा करेंगे तो वे प्रसन्न रहेंगे और हम पर कुपित होकर काटेंगे नहीं। उनकी मान्यता थी कि धरती शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और इस पर्व पर न सिर्फ हम उनके कोप से मुक्त रहने व उनकी कृपा के लिए उन्हें पूजते हैं; अपितु धरती को सतत धारण किए रहने के लिए उनका आभार प्रकट करते हैं।
अम्माँ बहुत श्रद्धा से नागाकृतियों को हल्दी का टीका लगाती, चंपा के फूल चढ़ाती, आटे से बना दिया जलाकर आरती उतारती, धूप सुगंधी देती और घी-गुड़ और कच्चे दूध का भोग लगातीं और कहती जाती कृपा रखियो नागबाबा, मेरे परिवार की सदा रक्षा करियो। उसके बाद वे कथा कहती थी, जिसमें धर्म-कर्म करने वाली एक पतिव्रता नि:संतान स्त्री के हाथ में फफोला हो जाता है और उसमें से साँप का बच्चा निकलता है, वह उसे देखकर डर जाती है; लेकिन अपना पुत्र मानकर उसकी सेवा करती है और उसे बड़ा करती है, धीरे -धीरे वह पुत्र बड़ा होता है। वह रोज़ सुबह होते ही मनुष्य वेश में आ जाता था; लेकिन रात को अपनी केंचुली में प्रवेश कर पुन: नाग बन जाता था। उसने अपनी माता से वचन लिया था कि वह कभी उसका यह रहस्य किसी को नहीं बताएगी, बहुत समय बाद माता का मोह बढ़ता जाता है, वह पुत्रवधू व पोते की कामना करती है और एक दिन उसकी केंचुली जला देती है, पुत्र नाराज़ होता है, उसे छोड़कर जाने लगता है; लेकिन वह अपनी ममता का वास्ता देकर उसे रोक लेती है और वह सदैव के लिए उसके पास पुत्र रूप में रह जाता है।
बालमन यह कहानी सुनकर कितना आश्चर्यचकित होता था इसका वर्णन तो शब्दों से परे है, लेकिन वह कथा सुनने की उत्सुकता हर बार इस प्रकार रहती थी, मानो इस बार कथा में कुछ नया होगा। शायद कक्षा चार या पाँच में रही होऊँगी, किसी प्रयोजन से घर में एप्पन (भीगे और पिसे हुए चावलों का लेप) बना हुआ था, मैंने अपनी चित्रकारी का प्रदर्शन करने के लिए उस नाग कोठरी को और सुन्दर बनाते हुए दोहरी लकीर से उसकी किनारी बनाकर साड़ी के बॉर्डर जैसा डिजाइन बनाते हुए उसे सजा दिया। बुआ थोड़ा नाराज़ हुई; क्योंकि उनके मेहनत से पीसे हुए एप्पन में मैंने चित्रकारी करते- करते हरा व काला रंग घोल दिया था, मैं डरी हुई थी कि अम्मा भी नाराज होंगी; लेकिन अम्मा ने बहुत प्यार से समझाया कि जिस काम को करने की जो रीति होती है ,उसे वैसे ही करना चाहिए। अब सोचती हूँ, तो लगता है जाने कहाँ से वह इतना धैर्य लाती थीं कि उन्हें गुस्सा आता ही नहीं था, जब अपने बच्चों की नादानियों पर नाराज़ होने लगती हूँ, तो बहुत बार अम्मा का धैर्य से मुस्कुराता चेहरा सामने आ जाता है और मैं अपना गुस्सा भूल जाती हूँ।
नागपंचमी से ही जुड़ा एक और दिन भी याद आता है। वह है छड़ियों का मेला या जाहर दीवान का मेला जो श्रावण की शुक्ल नवमी के दिन लगता था। जाहरवीर को साँपों के देवता के रूप में पूजा जाता है और मान्यता है कि जाहर दीवान के मंदिर में प्रसाद चढ़ाने से साँप नहीं काटते। अम्मा मानती थी कि जब भी उनसे नागपंचमी पर कोई चूक हो जाती है ,तो उन्हें घर में कहीं न कहीं साँप अवश्य दिखाई दे जाता है और उनके हाथ जोड़कर क्षमा माँगने और जाहरदीवान पर प्रसाद चढ़ाने के वचन से वह शान्ति से कहीं चला जाता है। बहुत भीड़ वाले उस मेले में जाने की रुचि मुझे इसलिए होती थी; क्योंकि वहाँ लोहे की जंजीरे सिर पर छुआ कर जाहरवीर का आशीर्वाद मिलता था जो मेरे लिए बहुत विस्मयकारी होता था। ये शब्द लिखते -लिखते मेरा मन जा पहुँचा है प्रसाद चढ़ाने की उस कतार में और प्रतीक्षा कर रहा है छड़ियों के आशीर्वाद की, प्रसाद के गुलदाने की मिठास स्वत: मुँह में घुलने लगी है... काश कि फिर लौट पाती उन पलों में जहाँ से मिला आशीर्वाद आज तक फल रहा है। कृपा बनाए रखना नागबाबा!

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