July 25, 2017

अनकही:

 बात
 खुशियों
 की... 
- डॉ. रत्ना वर्मा
बारिश का मौसम है और हमारे आसपास हरियाली दिखाई देने लगी है। पेड़-पौधों के पत्तों से धूल की परतों को बारिश ने धो दिया है और वे चमक रही हैं। रंग- बिरंगे फूलों में तितलियाँ और भौंरों का गुंजन सुनाई देने लगा है। तरह तरह के पंछी चहचहाते हुए इस डाल से उस डाल फुदक रहे हैं। बया अपना नया संसार बसाने तिनके तिनके जोड़कर खूबसूरत घोसला बनाने में जुट गई है । ऐसे खुशनुमा माहौल में बादलों का उमड़ना घुमड़ना देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। रिमझिम बारिश में किसी को चाय और पकौड़े खाने का मन करने लगता है, तो कोई गरमा गरम भुट्टे का आनन्द लेना चाहता है। कहने का तात्पर्य यही कि भीषण गर्मी के बाद जब बादल बरसते हैं तो धरती की तपन को तो राहत मिलती ही है, हम सब भी सुकून की साँस लेते है... कुछ इसी तरह के खुशनुमा मौसम में आज बादलों को बरसते देख विचारों का एक ठंडा झोंका सा आया... और मैं सोचने लगी कि मौसम बदलता है तो हम अपने जीने का तरीका भी थोड़ा बहुत बदल लेते हैं। बदलाव जीवन का अंग है चाहे फिर वह मौसम हो या इंसान। पर प्रश्न यहाँ यह उठता है कि हम इस बदलाव को जीवन में ढालते कैसे है। अच्छा खाना, अच्छा पहनना और अच्छे से खुशी-खुशी जीवन गुजारना। यह तो हर कोई चाहता है, लेकिन क्या हम इतने मात्र से संतोष प्राप्त कर लेते है, समस्या यही है हमारी चाहतों का कोई अंत नहीं होता। अंतहीन चाहतों का नतीजा परेशानी, मुसीबतें और दुख। थोड़े में खुश होना हमें आता नहीं तो बहुत के बीच से खुश होने के कोई एक बहाना ढूँढ़ते हैं, पर खुशी कोई चीज तो है नहीं कि बाजार से खरीदी और खुश हो लिए। हाँ अक्सर लोग खुश होने के लिए पार्टी करते हैं, फिल्में देखते हैं और सोचते हैं कि हमने खुशी पा ली। पर सच तो यह है यह सब क्षणिक खुशी है।
जब हम अपने लिए अच्छा घर अच्छा काम और अच्छा परिवार पा लेते हैं अपनी और अपने परिवार की सभी ज़रूरतेँ बिना किसी परेशानी के पूरा कर लेते हैं, पैसा कमा रहे हैं तो उन्हें अच्छे से खर्च तो करना ही है सब कुछ है फिर भी और अच्छे की चाहत में भागते ही रहते हैं। अब आप ये कह सकते हैं कि अच्छा जीवन गुजार रहे हैं तो क्या चुपचाप बैठ जाएँ....क्येंकि परमसंतोषी जीव बनकर बैठ जाना भी तो जीवन को नीरस बना देता हैं । तब क्या करें, क्या चाहतों और उपभोग की वस्तुओं के पीछे भागना ही कुछ करते रहने का नाम है। क्या हम कुछ अलग हट कर थोड़ा सा दूसरों के लिए मानवता के नाम पर काम करके अपनी ऊर्जा को बनाए नहीं रख सकते, कर सकते हैं और बहुत अच्छे से कर सकते हैं। अपने लिए तो हम हर मुसीबत हर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते हैं तो थोड़ी मेहनत एक ऐसी खुशी से लिए जिसका कोई मोल नहीं होता भी कर लें-बहुत बड़ा करने या बहुत ज्यादा कुछ करने की बात मत सोचिए। अपने रोज की दिनचर्या में न सही महीने में एक दिन या साल में कुछ दिन समाज के लिए देश के, लिए, उपेक्षित, पीड़ित मानवता के लिए तो समय हम निकाल ही सकते हैं।
दसअसल आज हमनें अपना जीवन इतना अधिक उलझा लिया हैं कि बेहतर तरीके से जीना छोड़कर समस्याओं के जाल में उलझ गए हैं। जितनी जरुरत है उतनी आश्यकताओं में जीना सीखने के बजाए और अधिक और अधिक के पीछे भागते चले जाते हैं। इस भागमभाग में हम छोटी छोटी खुशियों के लिए भी तरसते रहते हैं। याद करने की कोशिश कीजिए कि आपने अपने पूरे परिवार के साथ एकसाथ बैठकर कब खाना खाया था। मुझे याद है अपने बचपन में हम सब भाई बहन दिन का तो नहीं पर रात का खाना एक साथ बैठकर खाते थे। टेबल में खाना लगते ही सबको खाने के लिए आवाज लगाई जाती थी और सब हाज़िर। स्कूल कॉलेज की बात हो या किसी की कोई आवश्यकता हो, कोई परेशानी हो सब कह सुन लिया जाता था और हल भी उसी समय निकाल लिया जाता था। कोई काम की बात न हो तो भी हँसी खुशी से गप्प- बाजी करते हुए खाना समाप्त करते थे। एक और बात जो आजकल के परिवारों में मुझे देखने को मिलती है वह ज़रूरत का समान खरीदने में –चाहे वह कपड़े हों, घर की सजावट का सामान हो या जेवर, बतर्न आदि...एक समय था जब साल में एक या दो बार खासकर दीपावली में नए कपड़े खरीदे जाते थे। बहुत उत्साह के साथ उस नए कपड़े को पहन कर दीपावली मनाते थे। आज नए कपड़े पहनने की वैसी खुशी महसूस ही नहीं होती। जन्म दिन मनाने जैसा कोई उत्सव तब होता ही नहीं था। कब जन्म दिन आया कब निकल गया याद ही नहीं रहता था। तो जन्म दिन पर कपड़े लेने का प्रश्न ही नहीं उठता था। अब तो कपड़े खरीदने का जैसे कोई अवसर ही नहीं होता बिना अवसर के ही जब चाहे तब कपड़े खरीद लिए जाते हैं। जरूरत हो या न हो। 50 प्रतिशत छूट जो चल रही है तो दो चार क्यों न ले लिया जाए। कपड़ों से आपका वार्डरोब कितना भर गया है यह बिना देखे। पर बात सिर्फ कपड़ों की नहीं है अपनी ज़रूरतों की हर चीज़ की है। हमने अपनी आवश्यकताएँ बढ़ा-बढ़ाकर ही जीवन को उलझा लिया है। खुशियाँ कहीं गुम हो गईं हैं। जो हमारे पास है उसमे खुश रहना हम सीख ही नहीं पाए हैं, जो नहीं है उसके पीछे भागते हुए खुशी ढ़ूँढ़ते हैं। परिणाम, मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं और दिन रात उसी का रोना।
तो जीवन बस इन्हीं आवश्यकताओँ को पूरा करते करते कट जाता है। जब सोचने बैठते हैं कि जीवन में किया क्या तो नतीज़ा शून्य निकलता है...अरे हमने तो कुछ किया ही नहीं बस भागते ही रहे। जीवन तो व्यर्थ ही चला गया।

तो आइए सब मिलकर थोड़ा- थोड़ा करके अपने अंदर की छोटी-छोटी खुशियों को हासिल करने का प्रयास करें। अब आप सोचेंगे छोटी खुशी क्या होती है- चलिए एक छोटे से उदाहरण से शुरू करते हैं- आप हर साल नए कपड़े खरीदते हैं । हर साल कुछ कपड़े पुराने भी हो जाते हैं- क्या करते हैं आप उनका- आपकी अलमारी के किसी कोने में पड़े जगह ही तो घेरते रहते हैं। तो साल में एक बार ऐसे कपड़ों को जो आप उपयोग में नहीं ला रहे हैं अलग करिये और उन लोगों तक पहुँचाने की कोशिश कीजिए जिन्हें इसकी जरूरत है। ऐसे बहुत लोग आपको अपने आसपास ही मिल जाएंगे। आपको अपनी अलमारी का वह कोना खाली होने पर तो खुशी मिलेगी ही पर ज्यादा खुशी मिलेगी किसी जरूरतमंद की आवश्यकता पूरी करके। ये तो हुई पुराने कपड़ों की बात किसी त्योहार में या दीपावली में आप अपने लिए ,तो नए कपड़े खरीदते ही हैं,एक बार आप कुछ ऐसे बच्चों को भी नए कपड़े दे कर देखिए जो दीवाली में तो क्या किसी भी अवसर पर कभी भी नए कपड़े नहीं पहन पाते। तब उनके चेहरे की खुशी देखकर आपको जो खुशी मिलेगी वह अनमोल होगी। इसी तरह की खुशी हम घर के अन्य सामान को देकर भी हासिल कर सकते हैं बशर्ते वे कपड़े, जूते चप्पल, बतर्न, गद्दे चादर, पर्दे, फर्नीचर आदि कुछ भी जिन्हें आप दे रहे हों वह उनके काम की हो। विदेशों में तो इस तरह की पुरानी चीजों को दान में देने के लिए सेंटर खुले होते हैं। लोग वहाँ अपना सामान रख जाते हैं जहाँ से जरूरतमंदों को सेंटर खुद ही पहुँचा देता है।  मुझे याद है एक दो साल पहले हमारे देश में भी कुछ इसी तरह का काम करने की कोशिश हुई थी। फेसबुक में एक खबर बहुत शेयर की गई थी- नेकी की दीवार  जिस पर लिखा था- जो आपके पास अधिक है यहाँ छोड़ जाएँ, जो आपकी ज़रूरत का है यहाँ से ले जाएँ – यह शहर का कोई सार्वजनिक जगह होता था जहाँ एक दीवार होती थी और सामने कुछ जगह दीवार में कुछ कीलें ठोंक दी जाती थीं और नीचे जमीन पर कोई बड़ा कपड़ा या चादर बिछा कर उसमें लोग अपने घर की अनुपयोगी पर सही काम आने वाली वस्तुएँ रख जाया करते थे, कपड़े दीवार में टाँग देते थे। जरूरतमंद व्यक्ति आते जाते अपने काम की वस्तु वहाँ से उठा कर ले जाता था। यह अभियान कितना सफल हुआ यह तो पता नहीं पर जिसने भी शुरू किया था उसकी नीयत साफ थी। यदि कुछ लोग मिलकर ऐसा कुछ काम माह में एक दिन वालिंटियर के तौर पर ही सही करना शुरू कर दें तो मेरा विचार है अपनी खुशी के साथ साथ हम दूसरे बहुत लोगों को खुशियाँ बाँट सकते हैं।

बात बारिश की खुशियों से हुई थी... पर खतम कहीं और की खुशियों से हो रही है। जो भी है बात तो खुशियों की ही है। 

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