February 23, 2012

शिक्षा की ध्वस्त बुनियाद

मानव समाज के विकास यात्रा का इतिहास हमें यह बताता है कि गुफा निवासी पाषाण युगीन प्राणी से आज के अंतरिक्ष यात्री मानव के विकास में सबसे महत्वपूर्ण तत्व शिक्षा है। शिक्षा मानव को सभ्य, सुसंस्कृत और सक्षम मनुष्य बनाती है। सामान्य ज्ञान की बात है कि चाहे पारिवारिक नीति हो या राष्ट्रीय नीति शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी है। यह निर्विवाद है कि मानवीय सशक्तीकरण का मूलमंत्र शिक्षा है।
शिक्षा एक बहुआयामी और विशाल संरचना है। किसी भी विशाल संरचना का सबसे महत्वपूर्ण अंग उसकी बुनियाद होती है। शिक्षा रूपी इमारत की बुनियाद प्राथमिक - प्रायमरी- शिक्षा है। प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर ही आधारित होती है उच्च शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता। इसीलिए संसार के जितने भी विकसित देश हैं वे प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 10 तक) को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इसका समुचित प्रबंध सरकारी खर्चे पर करते हैं। विकसित देशों में सरकार प्राथमिक शिक्षा के लिए सभी अनिवार्य सुविधाओं यथा कक्षाओं के लिए उचित आकार के कमरों, पुस्तकालय, शौचालय, पेयजल, खेल के मैदान, प्रयोग शालाओं से युक्त स्कूल भवन तथा परिसर की स्थापना करती है। इन स्कूलों में हर विषय के लिए भली भांति प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है तथा इन विद्यालयों को पूर्णतया अपने खर्चे पर चलाने के साथ छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा ही नहीं बल्कि उन्हें पाठ्य पुस्तकें व अन्य पाठ्य सामग्री भी मुफ्त दी जाती है। यही वजह है कि वर्तमान काल में किसी भी देश की समृद्धि का एक मापदंड उस देश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को भी माना जाता है।
इस परिप्रेक्ष्य में हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति अत्यंत शर्मनाक है। ग्रामीण क्षेत्र में स्कूल की इमारत के नाम पर या तो कुछ भी नहीं है या अधिकांशत: खंडहर हो चुके अथवा हो रहे कमरे मात्र देखने को मिलेंगे। मेज, कुर्सी, शौचालय या पेयजल इत्यादि कल्पना से परे की बात है। शहरों में अधिकांश सरकारी स्कूलों की इमारतें अवश्य हैं परंतु टूटे खिड़की- दरवाजों तथा मेज- कुर्सियों और बरसों से पुताई को तरसती दीवारें अत्यंत दयनीय दृश्य प्रस्तुत करती हैं। शौचालयों की सफाई महीनों नहीं होती है। ऐसे स्कूलों में जिनमें शौचालय हैं भी तो वहां छात्राओं के लिए शौचालयों की कोई व्यवस्था नहीं होती, जिसके कारण ऐसी लड़कियों की बहुत बड़ी संख्या है जिन्हें माता पिता स्कूल नहीं भेजते हंै।
प्राथमिक पाठशालाओं में सरकारी प्रयत्नों का ढिंढोरा पीटने के नाम पर बच्चों को भोजन देने की योजना चलाई गई है। वास्तविकता में तो सरकारी कर्मचारियों को यह योजना बहुत प्रिय है क्योंकि इसमें भी अन्य सभी सरकारी योजनाओं की भांति भ्रष्टाचार का बोलबाला है। जहां तक स्कूली बच्चों का सवाल है तो रुखे- सूखे निकृष्ट भोजन में छिपकली तथा अन्य कीड़े मकोड़े का समावेश होने और बच्चों के बीमार होने के समाचार आते ही रहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश स्कूलों में यदि एक या दो शिक्षक नियुक्त भी हैं तो बड़ी संख्या में वे विद्यालयों में शायद ही कभी उपस्थित होते हैं। अधिकांश शिक्षक शिक्षण में प्रशिक्षित नहीं है।
उपरोक्त पृष्ठभूमि में ऐसे प्राथमिक स्कूलों से निकलने वाले छात्रों के ज्ञान का स्तर क्या होगा? ऐसे में पिछले माह अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आकलन कार्यक्रम (PISA) के मापदंड के अनुसार जब हमारे प्राथमिक स्कूल के छात्रों का आकलन किया गया तो पता चला कि बड़ी संख्या में हमारे पांचवी कक्षा के छात्र भाषा और अंक गणित में दूसरी कक्षा के प्रश्न भी हल नहीं कर पाते हैं। उक्त आकलन के अनुसार विश्व के 75 देशों में भारत का स्थान 74वां है। इस शर्मनाक स्थिति पर मीडिया में सुर्खियां बनी परंतु हमारे विचार में इसमें चौंकाने वाला कुछ भी नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों ने जिस तरह से प्राथमिक शिक्षा की दुर्गति की है उसमें ऐसी स्थिति स्वाभाविक है। इतना ही नहीं कई समाजशास्त्री और राजनीति विश्लेषक कहते हैं कि सभी राजनीतिक दल जान बूझ कर प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा करते हंै जिससे कि जनसंख्या का बड़ा हिस्सा अशिक्षित रहते हुए उनका आसान वोट बैंक बना रहे। जो भी हो शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण अंग की इस अत्यंत शर्मनाक और समाज के लिए घातक स्थिति के लिए केंद्र और प्रादेशिक सरकारें अर्थात सभी राजनैतिक दल जिम्मेदार हैं।
प्रश्न यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है? इस समय जिस प्रकार राजनैतिक दल तथा सरकार भ्रष्टाचार के संरक्षण में जुटे हैं उससे यह स्पष्ट है कि इनसे शिक्षा के क्षेत्र में वांछित सुधार की आशा करना व्यर्थ है। केंद्रीय शिक्षामंत्री जो संचार मंत्री भी हैं संचार मंत्रालय में लाखों करोड़ रुपयों की सरकारी खजाने में लूट के मामले में यह सिद्ध करने में जुटे हैं कि खजाने के चौकीदारों (तत्कालीन वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री) की कोई जिम्मेदारी नहीं है। ऐसे में प्राथमिक शिक्षा जैसे मामले के लिए उनके पास कोई समय नहीं है। हमारे विचार में शिक्षा की बुनियाद को सुदृढ़ बनाने के लिए भी अन्ना हजारे जैसा देशव्यापी आंदोलन चलाना होगा।

-डॉ. रत्ना वर्मा

1 Comment:

jai jai ram Anand said...

apke prathmik siksha ke vishay men vichaaron se sahmat hoon.siksha ka itihas batataa hai ki sabse upekshit elmentary education hain
Ayog aur reports sifaarishon ke bundal hain sabko uchch siksha ki chinta hai Yah desh ke bhavishy ke sath khilvaad hai.apkaalekh aankhr kholane balaahai
Dhanybaad
DRjaijairam anand

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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