February 23, 2012

हर मुश्किल पार करके पूरा हुआ मनु नायक का सपना

- मोहम्मद जाकिर हुसैन

अनुपम चित्र कंपनी के मुलाजिम के तौर पर 350 रूपए मासिक पगार पाने वाले मनु नायक के सामने चुनौती थी कि छत्तीसगढ़ी में फिल्म बनाएं तो बनाएं कैसे...? एक तो रकम का जुगाड़ नहीं दूसरे हौसला डिगाने वाले भी ढेर सारे लोग।
पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले मनु नायक की कहानी भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 11 जुलाई 1937 को रायपुर तहसील के कुर्रा गांव (अब तिल्दा तहसील) में जन्मे श्री नायक 1957 में मुंबई चले गए थे कुछ बनने की चाह लेकर। यहां शुरूआती संघर्ष के बाद उन्हें काम मिला निर्माता-निर्देशक महेश कौल के दफ्तर में।
स्व. कौल की सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक पं. मुखराम शर्मा के साथ व्यवसायिक साझेदारी में अनुपम चित्र नाम की कंपनी थी। इसी अनुपम चित्र के दफ्तर में वे मुलाजिम हो गए। मुलाजिम भी ऐसे कि लगभग 'ऑल इन वन' का काम। प्रोडक्शन से लेकर अकाउंट सम्हालने तक का। और इन सब से बढ़ कर हिंदी में लिखने वाले पं. मुखराम शर्मा की रफ स्क्रिप्ट को फेयर करने, कॉपी राइटर जैसी जवाबदारी भी। पं. मुखराम शर्मा की लिखी और महेश कौल की निर्देशित अनुपम चित्र की पहली फिल्म 'तलाक' 1958 में रिलीज हुई। राजेंद्र कुमार, कामिनी कदम, राधाकिशन और सगान अभिनीत इस फिल्म में गीत पं. प्रदीप और संगीत सी. रामचंद्र का था। फिल्म 'तलाक' सुपर-डुपर हिट साबित हुई और इसके साथ ही चल निकली अनुपम चित्र कंपनी। इस कंपनी ने न सिर्फ फिल्में बनाई बल्कि फिल्मों के प्रदर्शन के अधिकार भी खरीदे। इस तरह मनु नायक भी फिल्म निर्माण के हर पहलू से परिचित होते चले गए। इन्हीं सब अनुभवों को लेकर एक छत्तीसगढिय़ा अपनी भाषा में पहली फिल्म बनाने के लिए प्रेरित हुआ-
भोजपुरी ने दिखाया छत्तीसगढ़ी को रास्ता
वह 1961-62 का दौर था जब पहली भोजपुरी फिल्म 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' की रिकार्ड तोड़ सफलता ने भोजपुरी सिनेमा का सुखद अध्याय शुरू किया। दादर के रूपतारा स्टूडियो व श्री साउंड स्टूडियो में धड़ल्ले से दूसरी कई भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग चल रही थी। माहौल ऐसा था कि क्षेत्रीय सिनेमा के नाम से भोजपुरी फिल्मों का सूरज पूरे शबाब पर था। ऐसे में रंजीत स्टूडियो में महेश कौल की दूसरी फिल्मों में व्यस्त फिल्मकार मनु नायक तक भी भोजपुरी फिल्मों की चर्चा पहुंची। 'गंगा मइया...' और उसके बाद बनने वाली 'लागी नाही छूटे राम' और 'बिदेसिया' जैसी दूसरी फिल्मों की सफलता ने मनु नायक को भी उद्वेलित किया कि आखिर हम छत्तीसगढ़ी में फिल्म क्यों नहीं बना सकते। बस फिर क्या था मनु नायक के मन में अपनी माटी से जुड़ी छत्तीगसगढ़ी फिल्म बनाने का सपना झिलमिलाने लगा।
अनुपम चित्र कंपनी के मुलाजिम के तौर पर 350 रूपए मासिक पगार पाने वाले मनु नायक के सामने चुनौती थी कि छत्तीसगढ़ी में फिल्म बनाएं तो बनाएं कैसे...? एक तो रकम का जुगाड़ नहीं दूसरे हौसला डिगाने वाले भी ढेर सारे लोग थे। जैसे ...भोजपुरी के नजीर हुसैन, शैलेंद्र, चित्रगुप्त और एसएन त्रिपाठी जैसे दिग्गज छत्तीसगढ़ी में नहीं हैं तो फिर तुम्हारी छत्तीसगढ़ी फिल्म मुंबई में बनेगी कैसे? इसमें कौन काम करेगा? बन भी गई तो देखेगा कौन? सिर्फ छत्तीसगढ़ में रिलीज कर घाटे की भरपाई कर पाओगे? ऐसे ढेर सारे 'ताने' और सवाल थे युवा मनु नायक के सामने। लेकिन पास था तो खुद का विश्वास और डॉ. हनुमंत नायडू 'राजदीप' जैसे हौसला देने वाले दोस्त का साथ। फिर महेश कौ और पं. मुखराम शर्मा की छाया का भी असर था कि बहुत सी दिक्कतें तो शुरूआती दौर में ही खत्म हो गई। और हो गया उनका सपना साकार। बन गई छत्तीसगढ़ी भाषा में उनकी पहली फिल्म 'कहि देबे संदेस' ।
सेक्रेटरी से प्रोडक्शन कंट्रोलर तक का सफर
अब थोड़ी बात मनु नायक के कैरियर को लेकर- लगातार विवादों के चलते मनु नायक का कैरियर भी प्रभावित हुआ। हालांकि उन्होंने अगली छत्तीसगढ़ी फिल्म 'पठौनी' की घोषणा कर दी थी। लेकिन 'कहि देबे संदेस' का कर्ज छूटते- छूटते और कई कारणों से 'पठौनी' शुरू नहीं हो पाई। इस बीच मुंबई में टिके रहने और परिवार चलाने मनु नायक 'जो काम मिला सो किया' की स्थिति में आ गए। उस दौर में भी कई मॉडल, हीरोइन बनने का ख्वाब लिए मुंबई पहुंच रहीं थीं, जिन्हें बतौर सेक्रेटरी मनु नायक ने मंजिल दिलाने की कोशिश की लेकिन मॉडल और उनके सेक्रेटरी दोनों को नाकामी हासिल हुई। तभी नई तारिका रेहाना (सुल्ताना) का पदार्पण हुआ। मनु नायक ने रेहाना की सेक्रेट्रीशिप कर ली। इस दौरान 'दस्तक' और 'चेतना' की सफलता ने रेहाना के कैरियर को नई ऊंचाईयां दीं। इसी बीच संयोगवश नायक को तब की सुपर स्टार तनूजा का सेक्रेट्री बनने का मौका मिला। तनूजा और मनु नायक दोनों एक दूसरे के लिए 'लकी' साबित हुए। बाद में इन्हीं संबंधों के चलते तनूजा ने अपनी बेटी काजोल को लांच करने पहली फिल्म 'बेखुदी' के निर्देशन का दायित्व भी मनु नायक को सौंपा था, हालांकि परिस्थितिवश फिल्म उनके हाथों से निकल गई। खैर, तनूजा की सेक्रेट्रीशिप के दौरान नायक ने प्रोडक्शन कंट्रोलर के तौर पर अपने कैरियर की नए ढंग से शुरूआत की। पहली फिल्म डायरेक्टर मुकुल दत्त की 'आज की राधा' थी। रेहाना सुल्ताना, महेंद्र संधू, रंजीत, डैनी डैंग्जोंपा और पद्मा खन्ना जैसे सितारों से जड़ी यह फिल्म कतिपय कारणों से रिलीज नहीं हो पाई। बाद में 'जीते हैं शान से' सहित बहुत सी फिल्में बतौर प्रोडक्शन कंट्रोलर उन्होंने की।
नहीं बन पाई 'पठौनी'
मनु नायक की दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म'पठौनी' आज 40 साल गुजर जाने के बाद भी बनने के इंतजार में है। आज भी मनु नायक अपनी इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं। वह कहते हैं- अगर सही फाइनेंसर मिल जाए तो वह अपना 'पठौनी' प्रोजेक्ट हर हाल में पूरा करना चाहते हैं। वे कहते हैं मेरी 'पठौनी' नारी शक्ति जागरण पर केंद्रित है, उसके लिए मैंनें संगीतकार मलय चक्रवर्ती और गीतकार डा. एस. हनुमंत नायडू के साथ रायपुर में संगीत पक्ष की तैयारी की थी और यहां से मिथिलेश साहू व पुष्पलता कौशिक को मुंबई ले जाकर गीत रिकार्ड करवाए थे। 'पठौनी' का प्रोजेक्ट उसी दौरान पूरा करना था लेकिन 'कहि देबे संदेश' का कर्जा छूटते-छूटते मुझे कई साल लग गए। जिससे मेरा कैरियर भी चौपट हो गया।

नूतन की सादगी बस्तर का लाली लुगरा
पलारी का अनुभव सुनाते हुए मनु नायक ने बस्तर में फिल्माई गई कस्तूरी फिल्म की नायिका नूतन की सादगी को भी याद किया। वे बताते हैं कि कस्तूरी फिल्म में नूतन, मिथुन दा आदि को लेकर मैं बस्तर आया था। नूतन के आने की खबर लोगों को पहले ही लग चुकी थी। भीड़ से बचाने के लिए उन्हें मैंने राजनांदगांव में ही उतार लिया फिर वहां से उन्हें बस्तर ले गया। नूतन से मैंने कहा जंगल में बंगलो है आप शहर में रहेंगी या जंगल में। तब उन्होंने कहा कि आप जैसा रखेंगे वैसा रहूंगी। वे बस्तर में 10-12 दिन रही और वहां की जीवनचर्या को अपना लिया। भोजन, कपड़ा रहन- सहन सब बिल्कुल आदिवासियों जैसा सादगी से भरा। शूटिंग समाप्त होने पर उन्हें बस्तर की आदिवासी साड़ी लाल लुगरा चाहिए थी। वे स्वयं बाजार गईं और लाली लुगरा पसंद किया। मैंने वह लुगरा उन्हें भेंट स्वरूप दिया। उन्होंने एक कोसा कपड़ा भी अपने पैसे से खरीदा। जयकिशोर ने एक टिन शहद उन्हें भेंट किया। इतनी उच्च दर्जै की कलाकार होने के बावजूद उन्होंने यहां रहते हुए किसी किस्म की कोई शिकायत नहीं की। फिल्म आखिरी दांव में भी हमने साथ काम किया था।

लेखक के बारे में

उदंती के इस अंक में प्रकाशति छत्तीसगढ़ी में बनने वाली पहली फिल्म 'कहि देबे संदेस' से संबंधित सामग्री मोहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा संकिलित की गई हैं । वे भिलाई नगर के निवासी हैं तथा पेशे से पत्रकार हैं। उन्होंने प्रथम श्रेणी से बीजेएमसी करने के बाद फरवरी 1997 में दैनिक भास्कर से पत्रकरिता की शुरुवात की। दैनिक जागरण, दैनिक हरिभूमि, दैनिक छत्तीसगढ़ में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं देने के बाद आजकल दैनिक भास्कर (भिलाई) में कार्यरत हैं। पत्रकारिता के साथ मो. जाकिर विभिन्न सामाजिक, संस्कृतिक आदि विषयों पर लेखन कार्य करते हैं, जिनका प्रकाशन देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में होता है।
संपर्क- क्वार्टर नं.6 बी, स्ट्रीट-20, सेक्टर-7, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़) मो.9425558442,
Email: mzhbhilai@yahoo.co.in

2 Comments:

Mayur Malhar said...

shandar prastuti

Sandeep Chandravanshi said...

Manu nayak ji jaisi kalpna shakti aur himmat aaj hr kisi ke pass nhi hoti...
wo us dour me film banane ki kalpna kiye the Jab chhattisgarh gine chune log hi film k bare me jante the...
unko to main pranam karta hu...
sath hi jakir hushain ji aapka bhi dhanyawad jo aapne NAYAK ji ke bare me itni acchi jankari se hame avgat karaya....
uske sath hi udanti.com ko bhi dil se dhanyawad karna chahta hu...

aapke dwara prakashit kiya gya ye lekh mere project pura karne me bahut sahyog kiya h...

लेखकों से अनुरोध...

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