November 10, 2011

मेरी सांसों में संगीत है...

यह मेरे जीवन का 76वाँ वर्ष है। मैं आज भी हर रोज संगीत को नए- नए स्वरूपों में खेजता हूँ। मेरी रगों में दौडऩे वाला लहू संगीत है। श्वास के रूप में जो हवा मैं लेता हूँ वह संगीत है। मेरे लिए संगीत हर जगह मौजूद है। संगीत ही सब कुछ है। मेरा जन्म पूर्वोत्तर में हुआ। ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त उस सुंंदर भूमि की हर ध्वनि में संगीत है। उस भूमि के टेड़े-मेड़े रास्ते भी संगीत हैं। वहाँ के लोगों की आत्मा संगीत है। वे सब ध्वनियाँ मेरे भीतर मौजूद हैं। मैं उन्हीं का हिस्सा हूँ। जीवन के इसी मोड़ पर मैं सिनेमा में पहुँच गया। मैं अपनी प्रत्येक धुन में लोक संगीत में मौजूद माटी की सुगंध, शास्त्रीय संगीत की जटिलता और वैश्विक संगीत की जीवंतता का मिश्रण करने का प्रयत्न करता हूँ। यही मेरी संगीत यात्रा है। आइए, आने वाले कल के लिए हम संगीत के कालजयी होने का लाभ उठाएँ। एक नया संयोजन, एक नया मिश्रण, नया संगीत बनाएँ। नई शक्ति का निर्माण करें। वह संगीत हमारी आत्मा को मधुरता प्रदान कर उजाला फैलाए। उजाला स्वतंत्रता का, शांति का और प्रसन्नता का।
(इन्दौर में लता मंगेशकर अलंकरण के अवसर पर 18 फरवरी, 2001 को व्यक्त भूपेन हजारिका के विचार)
----
सुर के पंछी

- भूपेन हजारिका
एक सुर
दो सुर, सुर के पंछियों का झुण्ड
झुण्ड के झुण्ड सुर बसेरे बनाते हैं
मन- शिविर में
आवाजाही जारी रहती है
शब्द का पताका तूफान
कुछ लोग गीतों के जरिए
सामने आते हैं
कण्ठरुद्घ प्रकाश
कण्ठहीन कण्ठ से
अनगिनत अन्तराएं
आबद्घ होता है नाद ब्रह्म
एक सुर दो सुर
सुर के पंछियों का झुण्ड
शून्य में उड़ता है
विसर्जन की प्रतिमा की तरह

गीत- संगीत का जादूगर

भूपेन हजारिका के गायन की शुरूआत कैसे हुई इसका एक दिलचस्प वाक्या है घटना तब की है जब वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे। गीत- संगीत का शौक तो था ही एक दिन वे अपने हॉस्टल के कमरे में बैठे भजन गुनगुना रहे थे। तभी सेठ घनश्याम दास बिड़ला वहां से गुजरे उन्होंने उनका भजन सुना और वे ठिठग गए। भजन खत्म होने पर वे उनके पास गए और पहले तो उनके बारे में उनसे पूछताछ की फिर 50 रूपए के कड़कड़ाते हुए नोट उन्हें देते हुए उनके भजन की प्रसंशा की और आशीर्वाद दिया कि खूब रियाज़ करो और बढिय़ा गाओ, देखना तुम एक दिन महान गायक बनोगे, दुनिया में तुम्हारा नाम होगा। घनश्याम दास जी के वचन सत्य सिद्ध हुए। कॉलेज में अपने शौक पूरा करने के लिए भजन गुनगुनाने वाला युवक भूपेन आगे चलकर महान गायक और संगीतकार बना। और दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया।
भूपेन की गायकी से जुड़ा एक और मजेदार वाक्या है। एक बार उन्हें कॉलेज में आए नए विद्यार्थियों के लिए रखे गए स्वागत समारोह में एक भाषण पढऩा था। भूपेन के पिता ने उन्हें वो भाषण लिख कर भी दिया था। लेकिन स्टेज पर आते ही भूपेन वह भाषण भूल गए और वहां उन्होंने एक गाना सुनाया। वहां उपस्थित सभी लोगों को भूपेन ने अपने गाने से मंत्रमुग्ध कर दिया और वो अपने कॉलेज में लोकप्रिय हो गए। फिर भूपेन ने संगीत से जुड़ी कई पुस्तकों का अध्ययन किया। धीरे- धीरे संगीत के क्षेत्र में खुद को स्थापित किया इसके बाद तो उनके गीत- संगीत का जादू ऐसे गूंजा कि पूरी दुनिया में उनकी आवाज गूंजने लगी।

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष