October 15, 2008

परिवार/ बुजूर्ग



जीवित पितरों  से  बढ़ती दूरियां

- डॉ. राकेश शुक्ल

बागबां फिल्म को भूले न होंगे आप। नयी सदी की कुछ वर्ष पहले आई अमिताभ बच्चन और हेमामालिनी अभिनीत यह फिल्म एक पारिवारिक प्रस्तुति थी। इसमें एक मध्यमवर्गीय परिवार के चार बेटे अपने माता व पिता को बोझ समझकर उन्हें अलग- अलग जीने को विवश कर देते हैं। पहले इस तरह की कोई घटना होने पर इसकी समाज में दूर- दूर तक चर्चा होती थी। इसे अनहोनी और कलयुग का लक्षण कहा जाता था। बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक तक सामाजिक निंदा एक बड़ी प्रताडऩा थी। अपनों की निंदा के भय से सयाने सदस्यों की उपेक्षा की कुछ घटनाएं अघटित रह जाती थीं, तो कई दुर्घटनाओं का अंत बिना समय गंवाए मेल- मिलाप में होता था।

सिर्फ तीन सौ चूल्हे- चौकों वाले मेरे अपने गांव में फिल्म बागबां की पटकथा अब सत्यकथा बन चुकी है। अनेक परिवारों में मां- बाप को अलग रसोईघर का उपहार मिला है, तो कुछेक में घर निकाले या उदासीनता की व्यवस्था है। अनहोनी या अपवाद के दिन नहीं रहे। सामाजिक खोखलेपन के मरे हिुए सांप ने हमें अच्छी तरह लपेट लिया है। पर परीक्षित बनने की योग्यता हममें नहीं है।

पिछले दशकों में भारत ने तरक्की की जोरदार छलांग लगायी है, तो भारतीय समाज पीछे कैसे रहता। जोरदार छलांग के बड़े मायने हैं। कुछ मायनों में इससे समाज अस्त- व्यस्त हो गया। कारण यह कि छलांग स्वाभाविक नहीं थी, न इसकी तैयारी का कोई प्रारूप था। सीमा लांघने तथा दूसरों से हटकर नया करने की इच्छा से प्रेरित थी छलांग। परिवर्तनशील समाज के नये मानकों का तर्क देकर इसका डंका पीटा गया। अतिक्रामक औतर आक्रमक आवेशों से भरी छलांग ने समाजशात्रियों को भी हैरान कर दिया। सामाजिक ढांचा टूटा- फूटा, सास्कृतिक गिरावट के नवीन उच्चांक बने और धार्मिक पर्यावरण के अंधेरों को सुविधाजनक व्याख्याओं के वस्त्रों से ढंकने की कोशिशें हुईं।

संटुक्त परिवार टूटे, कुटुम्ब की जगह परिवार ने ली। एकल परिवार की व्यस्था ने जीने के अलावा सोचने की प्रणाली प्रभावी ढंग से बदलकर रख दी। अहं आत्मग्रस्तता अस्तित्व की ंिचताएं इतयादि बढ़ गईं। हर किसी के लिए अपना- अपना राग- विराग महत्वपूर्ण हो गया। इसने समाज के प्रभुत्व और सामाजिक विधानों को कमजोर किया, फलत: समाज- निंदा का भय कमतर होता गया। घर की जोरू का झोंटा पकड़ सबक सीखाना बेडरूम के भीतर का मामला था। लेकिन इससे आगे बढ़ते हुए बूढ़े अशक्त अभिभावकों को जबरिया बाहर खदेडऩे में हिचक खत्म हो रही है। विचित्र बात है कि जिस भारत- भूमि पर ईश्वर की महान कल्पना हीं त्वमेव माता च पिता... से शुरू होती है वहां बुजुर्गों को प्रताडि़त या अपमानित करने के किस्से बढ़ते ही जा रहे हैं।

सामाजिक विकास में जातीय संगठनों का खासा योगदान है । उन्होंने सामुदायिक मंगल भवन, पाठशला आदि खड़े किए। अब ये धन जमा कर रही हैं वृद्धाश्रमों के लिए। सभी जातीय ईकाइयां मानने लगी हैं कि बुजुर्गों के प्रति उदासीनता की व्याधि और बढ़ेगी, तब आश्रम विकल्प होंगे और हेल्प लाइन का काम करेंगे।

गत दिनों तर्पण का महापर्व सम्पन्न हुआ। गुजरे हुए पिता, पितामह आदि की तस्वीरों को पोंछा सया, नयी माला डाली गयी। प्रात: स्नान के बाद सफेद फूल, चावल, जल, धूप- दीप, कुश चंदन आदि संजोए गए। पेटी से बाहर निकाल पहनी गई धोती। पुष्पांजलि, श्रद्धांजलि, दान- दक्षिणाओं, अर्पण- तर्पण में व्यस्त रहे बेटे। कपिला ही नहीं, काग व कुत्ते भी श्रद्धा- पात्र बने। सारी व्यस्तता के बीच बेटे ने सथियों से मोबइल पर हैलो किया , किंतु बाजू के कमरे में पलंग पर पड़े पिता से उनकी तबियत या रात की नींद के बारे में नहीं पूछा। उनकी टिमटिमाती आंखों में कातरता बढ़ती रही। दवा सिरहाने रखी थी, लेकिन गिलास भर पानी न मिलने से ले नहीं पाए । बहू जुटी थी जल्दी- जल्दी पितरों के लिए खीर- पूड़ी बनाने में, सामाजिकाता के नाम पर पांच- सात करीबियों को भोजन कराना जरूरी जो था।

पश्चिम की नकल करते- करते हम बंद गली तक पहुंच चुके हैं। चिंता यह नहीं कि समाज परिवर्तनशील है या परिवर्तनकामी है। चिंतित करने वाला पहलू यह है कि समाज एक सिरे से दरक रहा है, घिस रहा है, तो दूसरे सिरे से नवरचना क्यों नहीं हो रही है?

सत्तर पार का बसंत स्वयं बुजुर्गों के लिए सुखकारी नहीं होता। कोई उच्चैश्रवा है, तो कोई सूरदास के पथ पर अग्रसर। कोई बोलना चाहता है तो बस हवा निकलती है। स्मृतियों व अनुभवों का कोष उनके पास है, लेकिन जानते हैं कि वे आप्रासंगिक हैं, पीछे छूट चुके हैं। वे सौंदर्य- पिपासु समाज में ड्राईंगरूम की शोभा को ग्रहण लगाए बैठे हैं? भारी संख्या में वृद्धजन मृत्यु से पूर्व फिलर का जीवन जी रहे हैं। काया, माया से विरक्त दुर्भाग्य की शैय्या पर पड़े भीष्मों को औषधि से अधिक अपनेपन की आवश्यकता है। दिवंगत हो चुके प्रियजनों की श्राद्ध- क्रियाओं के प्रति जागरूक भद्रजन क्या जीवित पितरों के लिए थोड़ा और भावुक होना पसंद करेंगे?

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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