October 04, 2008

कला / अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : समाज का हिस्सा है कलाकृति

-संदीप राशिनकर

ललित कलाओं का कोई भी पहलू अभिव्यक्ति का अहम माध्यम होने से जनजीवन में अपना एक गहरा एवं दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ता है। अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होने से कलाओं में निश्चित ही जन भावनाओं को स्पंदित करने, उन्हें जागृत करने एवं उन्हें आंदोलित करने की एक विलक्षण क्षमता होती है।

भाषाओं के साथ-साथ कलाओं का विकास भी मानव की वृहत्तर अभिव्यक्ति के अलावा वृहद विहान से जुडऩे की महत्वाकांक्षाओं का माध्यम रहा है। चूंकि परस्पर संवाद एवं सामुहिकता के विकास में पारस्परिक अभिव्यक्ति की संप्रेषणीय संभावनाएं एक अहम आधार है अत: यह जरूरी ही नहीं आवश्यक भी है कि अभिव्यक्ति के माध्यम में सार्थक संप्रेषणीयता का सामथ्र्य निहित हो। भाषाओं की तो हालांकि क्षेत्रीय सीमाएं हैं किंतु यह निर्विवाद तथ्य है कि चित्रकला वह वैश्विक भाषा है, जिसे विश्व के किसी भी कोने में स्वतंत्र अनुभूति, अभिव्यक्ति के साथ समझा, परखा और संवेदनाओं के स्तर पर सुना जा सकता है। जब चित्रकला देशों-उपनिवेशों की सीमाओं से परे एक सर्वग्राहय एवं सर्व स्वीकृत अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है तो इसके व्यापक संप्रेषण एवं वृहद प्रभाव को देखते हुए इसके सृजन में स्वअनुशासन की शर्तें अंतरनिहित होना अस्वाभाविक नहीं है।

जब सृजन और कलाओं का मूल उद्देश्य ही अभिव्यक्ति एवं परस्पर संवाद से जुड़ाव के एक वैश्विक वितान का निर्माण करना हो तब यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो जाता है कि कलाओं के सर्जक अपनी अभिव्यक्ति में निहित स्वतंत्रता एवं संपन्नता के बावजूद इसके व्यापक परिणामों को देखते हुए अभिव्यक्ति की मौलिक निष्ठा एवं नियमों के प्रति सतर्क एवं जागरूक रहे। सृजन के वक्त चित्रकार द्वारा यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि जो रचा जा रहा है वह सृजन तक कलाकार का व्यक्तिगत मामला है परंतु सृजन पश्चात वह सार्वजनिक समाज का हिस्सा होता है।

अत: कलाकार की अभिव्यक्ति का सर्वग्राह्यïता एवं स्वीकार्यता के मापदंडों पर खरा उतरना भी उतना ही आवश्यक है जितना कलाकार द्वारा अभिव्यक्ति में स्वतंत्रता की अपेक्षा रखना।

यह सारी भूमिका उन घटनाक्रमों के मद्देनजर है जिसमें कलाकार की अभिव्यक्तियों ने समाज को विरोध में उतरने के लिए उद्वेलित किया है। बीच में वरिष्ठ चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन द्वारा चित्रित सरस्वती के चित्र पर उठा विवाद भी इस तरह के विवादों एवं अंतरविरोधों की एक कड़ी है। हाल ही में न्यायालय द्वारा हुसैन की संपत्ति को कूर्क करने के निर्णय और उस पर स्थगन के घटनाक्रम के चलते यह मामला अभी भी थमने के आसार नजर नहीं आ रहे। यह पहली बार नहीं है कि किसी कलाकार की कलाकृति ने मान्य सामाजिक मान्यताओं, आस्थाओं को आहत करते हुए सामाजिक विरोध को आमंत्रित किया है। ऐसे ही समय यह बहस भी जन्म लेती है कि यह कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आक्रमण या अतिक्रमण है या फिर इसे पुरातनपंथी या कट्टïरपंथियों द्वारा कला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के तौर पर भी देखा जाता है।

कला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या कलाकारों के सृजन के संदर्भ में सामाजिक दायित्वों की पड़ताल में जाने की बनिस्बत मोटे तौर पर यह स्वीकार करना गलत नहीं होगा कि कलाएं परस्पर संवाद के जरिए मानव-मानव की दूरियों को पाट उन्हें जोडऩे का एक माध्यम है न कि उनमें विलगाव से उन्हें तोडऩे का एक जरिया। कलाएं जोड़ती है, तोड़ती नहीं, कला के इस मूलभूत तत्व की अपेक्षाएं कलाकारों से करना बेमानी नहीं होगा।

हुसैन अकेले ही विवादास्पद चित्रकार हो ऐसा भी नहीं है। राजा रवि वर्मा ने शांतनु और सत्यवती का जो चित्र उस समय बनाया था वह भी सामाजिक आलोचना का शिकार रहा है।

भारत में ही चित्रों को लेकर विवाद उठता हो ऐसी नहीं है। यूरोप में भी कई चित्र समय-समय पर काफी विवादित रहे हैं। वहां बलात्कार के चित्रण वाली एक कलाकृति को भारी विरोध के चलते कलावीथिका से हटाना पड़ा था। ऐसे ही अमेरिका की प्रख्यात चित्रकार गाय कालवेल द्वारा एक गैलेरी में रखी गयी पेटिंग को सामाजिक विरोध के बाद हटाना पड़ा। उस पेटिंग में अमेरिकी सैनिकों द्वारा ईराक के सैनिकों पर की गई बर्बरता का जीवंत चित्रण था। इस पेटिंग को लेकर दर्शकों में इतना रोष था कि गैलरी मालिक सुश्री लॅारी हेग को लोगों ने बुरी तरह पीट दिया था।

बहरहाल इन सारी घटनाओं के बरक्स यह सच है कि अभिव्यक्ति में कला के इस मूलभूत तत्व को भी सहेजने की दरकार है, जो कहता है कि कलाएं परस्पर जुड़ाव का माध्यम है न कि टकराव या विलगाव का।

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