July 10, 2020

कोरोना ने बदल दी हमारी जीवन -शैली

 कोरोना ने बदल दी हमारी जीवन -शैली
 -डॉ. रत्ना वर्मा
कोरोना वायरस ने 2020 में पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। सबका जीवन इसके इर्द-गिर्द ही घूम रहा है, इसने सबकी जीवन- शैली को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। शुरुआती दौर में वायरस से डरकर लोग घरों में सिमटे रहे , फिर इससे बचने के उपाय करने लगे।  मास्क पहनना, एक दूसरे से दूरी बनाकर रखना, बार- बार हाथ धोने की आदत, बहुत जरूरी होने पर ही बाहर निकलना और घर आते ही फिर नहाकर स्वच्छ कपड़े पहनना,  बाजार से आने वाली दैनिक उपयोग की वस्तुओं को सैनिटाइ करना आदि  कई बातें हमारे जीवन का हिस्सा बन गईं। यही वजह है कि आज हम जब भी किसी जरूरी काम से बाहर निकलते हैं और बगल से गुरने वाला व्यक्ति,  जिसने मास्क नहीं पहना हुआ है यदि वह खाँस या छींक देता है , तो हम एकदम से घबरा जाते हैं  और उसे मास्क लगाने की सलाह देते हैं या उससे दूरी बना लेते हैं। कुल मिलाकर हम सब इस संक्रमण के साथ अब जीना सीख रहे हैं। इस वायरस से मुक्ति जब मिलेगी, तब मिलेगी; पर पनी तरफ से सावधानी बरतते हुए जीना होगा।
       इस समय लोग सबसे अधिक जागरूक अपनी सेहत को लेकर हुए हैं और सेहत से जुड़ी है हमारी पूरी जीवन-शैली। इस दौरान लोगों के खान- पान में जबरदस्त बदलाव आया है। लॉकडाउन के दौरान लोग घर की बनी चीजें खाने लगे, वैसे भी बाजार, दुकानें होटल आदि तब सब बंद ही थे। लॉकडाउन खुलने के बाद भी भय से कहिए या जागरूकता के कारण आज भी लोग होटल आदि में खाना पसंद नहीं कर रहे।  संक्रमण से बचने के लिए स्वास्थ्यवर्धक वस्तुओं की अहमियत को सबने स्वीकार किया है।  यह शुभ संकेत है कि घर, परिवार और  रिश्तों के महत्त्व को भी इस महामारी ने बहुत अच्छे से समझाया है। परिवार जैसी संस्था पिछले कुछ दशकों से  कमजोर होती नजर आ रही थी। समाजशास्त्री इस बात को स्वीकार भी कर रहे थे,  कि आधुनिकता के साथ बदलती जीवन शैली के चलते नई पीढ़ी परिवार की आवश्यकता को नकारने लगी है। इस महामारी ने परिवार के महत्त्व को बहुत अच्छे से समझा दिया है। महामारी के चलते शारीरिक  दूरी भले ही बढ़ गई हो; पर मानवीय रिश्ते मजबूत हुए हैं और वे मुसीबत में एक दूसरे की ताकत बने हुए हैं , तभी तो अकेले जीवन बसर करने वाले इस दौर में निराशा के शिकार होते दिखाई दे रहे हैं । कुछ निराशाजनक खबरें सामने आईं भी हैं, जो इस बात को साबित करता है कि, रिश्ते, दोस्ती और सम्बन्धों का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है।
       दूसरा जबरदस्त बदलाव इस दौर में काम-काज के क्षेत्र में आया है। विकसित देशों में तो घर से काम करने के लाभ को बहुत पहले से ही स्वीकार कर लिया गया है, परंतु भारत में लॉकडाउन ने इसके महत्त्व को स्वीकार करने पर मजबूर किया है अब कई बड़े सेक्टर यह कह भी रहे हैं कि घर पर काम करने के कई फायदे भी हैं और इससे उनके उत्पाद में बढ़ोतरी ही हुई है। इसमें कोई दो मत नहीं कि  आईटी जैसे की क्षेत्रों में जहाँ घर पर ही रहकर काम संभव है , सिर्फ उन्हें नहीं बल्कि पूरे देश को फायदा है जैसे- इससे ऑफिस आने- जाने का समय बचेगा तो कर्मचारी को यात्रा की थकावट भी नहीं होगी। वह अधिक समय तक अपने परिवार के बीच रह पागा, इससे खुशियाँ बढ़ेंगी वह संतुष्ट रहेगा तो उनके कार्य क्षमता में भी वृद्धि होगी। सड़कों पर भीड़ तो कम होगी ही, साथ ही मोटर गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण भी कम होगा।
तीसरा सामाजिक बदलाव– यात्रा में कटौती है। लोग अभी आवश्यक काम से ही बाहर निकल रहे हैं। होटलिंग, पार्टी, पर्यटन,  जैसी मात्र शौक के लिए की जाने वाली अनावश्यक खरीददारी आदि सब लगभग बंद  है। इसका प्रमुख कारण कोरोना तो है ही, साथ ही बेरोगारी और आर्थिक मंदी भी है। इन सबको शुरू होने में समय लगेगा। तब तक लोगों के जीवन में कुछ बदलाव आ जाएगा और वे अपनी जीवन चर्या को जरूरत के हिसाब से ढ़ाल चुके होंगे।
         बहुत अच्छा और लोगों को जागरूक करने वाला जो बदलाव समाज दिखाई दे रहा है वह है- विवाह समारोह , जन्म दिन पार्टी, या अन्य कई परिवारिक सामाजिक आयोजन जहाँ पहले सैकड़ों हज़ारों की संख्या में लोग उपस्थित होते थे में – कोरोना नियम के चलते – सीमित  लोगों के बीच ही कार्य सम्पन्न हो रहे हैं। कुछ लोग इसे मजबूरी मान रहे हैं ; परंतु कुछ लोगों का मानना है कि विवाह,  जन्म दिन, मृत्यु भोज जैसे आयोजन निकट सम्बंधियों के बीच ही सम्पन्न हों; तो बेहतर है। शहर भर के लोगों को आमंत्रित करके एक दिन मँहगा खाना खिलाने का क्या औचित्य है?  इससे तो अच्छा होता कुछ भूखों को ही पेट भर खाना खिलाकर उनके चेहरे पर मुस्कुराहट ला दें और उनकी दुआएँ बटोर लें।  सर्वोत्तम तो यही होगा कि ऐसे समारोह में किए जाने वाले खर्च को  समाज के किसी उत्तम कार्य में लगाएँ- रूरतमंदों की सहायता करें, जो शिक्षा से वंचित हैं  उन्हें शिक्षित करने में उपयोग करें , हमारे देश को स्वास्थ्य सेवाओं की अति आवश्यकता है उसमें सहायता करें ....ऐसे न जाने कितने कार्य हैं जहाँ सहायता करके आप अपनी खुशियों को कई गुना बढ़ा सकते हैं। यद्यपि इस तरह की सामाजिक जागरूकता की बातें लम्बे समय से की जाती रही हैं पर ऐसे आयोजनों पर कोई नियम कानून नहीं होने से,  लोग अपनी सम्पन्नता का दिखावा करते हैं।  कोरोना के इस आक्रमण  ने  हम सबको इस विषय पर चिंतन- मनन करने का अवसर दिया है , इन पर विचार कीजिए और अमल करने का प्रयास कीजिए । आप पहल करेंगे, तो कई लोग आपसे प्रेरित होंगे। इस तरह समाज की ऐसी कई कुप्रथाओं का अंत होगा। 
     इन सबके साथ एक सत्य यह भी है कि इस महामारी ने लोगों में घबराहट भर दी  हैं , लोगों के जीवन में निराशा के बादल मंडरा रहे हैं कि आखिर कब तक इस तरह जीवन चलेगा?  लेकिन मानव का स्वभाव है कि वह आपदा के गुर जाने के बाद सारे दुःखों को भूलाकर फिर से एक नई शुरूआत करते हुए अपनी जीवनचर्या में लौट आता है। ....तो इसी उम्मीद पर कि देर-सवेर एक दिन अवश्य इस वायरस को हरा देंगे और नई उम्मीदों के साथ बदले हुए रूप में नई जीवन -शैली के सात एक बेहतर जीवन की शुरूआत करेंगे।

5 Comments:

शिवजी श्रीवास्तव said...

कोरोना के कारण जीवन शैली में आए परिवर्तनों का सम्यक विश्लेषण करता हुआ सुंदर आलेख,निःसन्देह यह महामारी बहुत कुछ सकारात्मक बदलाव भी ला रही है,आलेख के अंत मे यह संकल्प कि हम अवश्य एक दिन इस वायरस को हरा देंगे...जीवन मे आशा का संचार करता है।बधाई डॉ. रत्ना जी

Sudershan Ratnakar said...

कोरोना के कारण जीवन में आए बदलावों का बहुत सुंदर विश्लेषण किया है आपने। सकारात्मक सोच लिए बहुत बढ़िया आलेख ।

प्रीति अग्रवाल said...

हर सिक्के के दो पहलू होते है, बहुत सुंदर विश्लेषण रत्ना जी , आपको बधाई!

प्रगति गुप्ता said...

आज के विषमकाल का बहुत अच्छे से विश्लेषण किया रत्न जी। हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई

रत्ना वर्मा said...

शुक्रिया आप सबका... आभारी हूँ मेरा उत्साह बनाए रखने के लिए...

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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