November 17, 2018

कविता

बोलकुछ तो बोल 
- डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति
हाथो में कुछ -
पकड़ने की ताक़त है ना
फिर ख़ाली क्यों हैं ?
पकड़, कुछ भी पकड़
पैन, पत्थर, कॉलर, मशाल ।

मुँह में ज़ुबान है ना
शब्द हैं
बोलने का गुण है
बोल, कुछ तो बोल
चीख़।

पैरों में ताक़त है ना
चल, चाहे चार क़दम ही ।

दर्द महसूस कर रहा है ना
तेरे चेहरे से साफ़ दिखता है।

जुर्म की मार से परेशान है ना,
फिर भी बेहरकत है?

कीड़े से भी गया गुज़रा है
देखा है कभी उन्हें?
ताका है कभी परिन्दों को?
फड़फड़ाते हुए
जीवन के लिए

चल,
बोल,
पकड़ हाथों में,
इतना कुछ है तेरे पास।
मानव होने के गौरव का
अपमान न कर।

अमृतसर
9815808506

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