March 24, 2018

अनुसंधान

उम्र बढ़ती है
मसालेदार
भोजन से 
- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
पिछले पाँच सालों में हमने इस बारे में काफी कुछ सीखा है कि हम कैसे और क्या खाते हैं। इस दौरान कई शोध पत्रों में हमारे भोजन पैटर्न, पसंद और अनुकूलन पर जानकारी दी गई हैं। यहाँ हम ऐसे तीन शोध पत्रों को देखेंगे।
हम पहले शाकाहारी थे
याद कीजिए हम मनुष्य वानर और चिंपैंज़ी के वंशज हैं। ये प्राइमेट्स शाकाहारी हैं, अत: आदिमानव भी शाकाहारी रहे होंगे। लेकिन अफ्रीका में रहने वाले प्राइमेट के विपरीत, हम आगे बढ़े और पूरी दुनिया में फैल गए। उस दौरान भोजन के रूप में जो उपलब्ध था वही खाते रहे, जैसे वनस्पति, मछली या मांस। समय बीतने के साथ हममें से कुछ लोगों ने सिर्फ वनस्पति को ही भोजन के रूप में चुना ,जबकि अन्य इतने नखरैल नहीं थे। बहरहाल, दोनों ही स्थितियों में हमने परिस्थितियों के साथ अनुकूलन किया। यह चयन के दबाव का एक उदाहरण है। यह अनुकूलन शरीर के उन जीन्स में भिन्नता में दिखाई देता है जो प्रोटीन्स और एंजाइम्स के कोड होते हैं। ये एंजाइम्स हमारे खाए हुए भोजन को कोशिकाओं के काम करने के लिए आवश्यक अणुओं में परिवर्तित करते हैं। कॉर्नेल युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक समूह ने इसी तरह के एक जीन, जिसे FADS कहते हैं, पर ध्यान केंद्रित किया है। यह हमारी कोशिका में कारूरी ओमेगा 3 और 6 वसा अम्लों का कोड है। FADS शाकाहारियों द्वारा खाए जाने वाले वनस्पति तेल और वसा को ओमेगा 3 और ओमेगा 6 वसा अम्लों में परिवर्तित करता है। ये वसा अम्ल हमारी कोशिका भित्ती के कारूरी घटक हैं और कोशिका के अंदर-बाहर अणुओं के आवागमन के नियमन में मदद करते हैं। इसके विपरीत मांसाहारी लोग ये ओमेगा वसा अम्ल पशुओं के मांस से सीधे प्राप्त कर लेते हैं।
थॉमस ब्रेना और कुमार कोठापल्ली के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल ने कुछ शाकाहारियों (महाराष्ट्र, पुणे के शाकाहारी परिवार जो सख्ती से शाकाहार का पालन करते हैं) तथा दूसरी ओर कुछ मांसाहारियों के FADS जीन्स में भिन्नता का अध्ययन करने का फैसला किया। शाकाहारियों में FADS जीन्स में एक इंसर्शन (I/I) की दो प्रतियां थीं। यह इंसर्शन यानी प्रविष्टि जीन अनुक्रम के अंदर 22 अक्षरों से बनी थी। मांसाहारियों में FADS के इस तत्व की बजाय डीलीट (D यानी विलोप) मिला यानी यह तत्व गायब हो गया था। अर्थात शाकाहारियों के गुणसूत्रों में I/Iजबकि मांसाहारियों में D/D। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि दक्षिण एशियाई आबादी में यह I/Iसंस्करण सबसे ज़्यादा होता है ;लेकिन युरोपियन और पूर्वी एशिया में यह सबसे कम होता है। (संयोग से निएंडरथल के FADSजीन्स में यहI/Iसंस्करण पाया गया है)।
हड़प्पावासियों का शोरबा
दूसरी रोमांचक खोज वाशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी की अरुणिमा कश्यप और स्टीव वेबर द्वारा की गई है। उन्होंने हरियाणा के प्राचीन शहर फरमाना (प्रसिद्ध हड़प्पा स्थल) में पाए गए मानव दाँतों के अवशेषों का विश्लेषण कर दाँतों पर उपस्थित अदरक और हल्दी की पहचान की। ऐसा लगता है कि जो चीज़ें आज हम बनाते और इस्तेमाल करते हैं वैसी हमारे पूर्वज 4000 साल पहले भी करते थे। अदरक और हल्दी के अलावा हड़प्पा भोजन में मसूर व मूँग दाल, चावल, बाजरा और केले भी शामिल थे। यह बहुत ही रोचक है कि कैसे 4000 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता में इस तरह के मसाले इस्तेमाल किए जाते थे। अब हम जानते हैं कि अदरक में उपस्थित अणु सूजन में मददगार होते हैं। साथ ही ऑस्टियो-आर्थराइटिस और  प्रतिरक्षा तंत्र को नियमित करते हैं। और हैदराबाद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान के शोध कार्य से हम यह भी जानते हैं कि हल्दी कितनी महत्त्वपूर्ण औषधि है।
लेकिन क्या हड़प्पावासी लाल मिर्च या काली मिर्च के बारे में जानते या इस्तेमाल करते थे? हालांकि इस बारे में विवाद है कि काली मिर्च भारत की ही है या बाहर से लाई गई थी किंतु लाल मिर्च के बारे में साफ है कि इसे पश्चिम से समुद्री व्यापारियों द्वारा लाया गया था। डॉ. के. टी. अचया और अन्य ने बताया है कि लाल मिर्च की उत्पत्ति मैक्सिको और मध्य अमेरिका में हुई है, और वहाँ से इसे पुर्तगालियों द्वारा भारत और दक्षिणी एशिया में 16वीं सदी में लाया गया था। इससे पहले भारत में तीखा भोजन अदरक, हल्दी वगैरह चीज़ों का इस्तेमाल कर बनाया जाता था।
लाल मिर्च, लंबी उम्र
एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका में भोजन को तीखा करने के लिए अधिकांशत: लाल मिर्च का इस्तेमाल किया जाता है। और 16वीं सदी में भारतीय भोजन में इसने अपना ज़ोरदार कदम रखा था। इसे इतने सम्मान से देखा जाता था कि मशहूर संत कवि पुरंदरदास (1480-1564) ने भगवान कृष्ण की प्रशंसा एक लाल मिर्च मणि कहकर की है। हाल ही में हुए दो अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि यह लाल मिर्च स्वाद ही नहीं बढ़ाती, बल्कि स्वस्थ रहने में भी योगदान देती है। पहला अध्ययन चीन का है, जहाँ पाया गया कि जो लोग अपने भोजन में लाल मिर्च का इस्तेमाल करते हैं वे सामान्य से ज़्यादा उम्र तक ज़िन्दा रहे बजाय लाल मिर्च का इस्तेमाल नहीं करने वालों के। इसके एक साल बाद ऐसा ही अध्ययन यूएस के चोपान और लिटेनबर्ग द्वारा किया गया था। इसका निष्कर्ष भी यही निकला कि लाल मिर्च खाने का सम्बंध मृत्यु दर में कमी से है। लाल मिर्च में कैप्सेसिन और अन्य जादुई अणु बहुतायत में होते हैं जो बैक्टीरिया संक्रमण से लडऩे, ऑक्सीडेटिव क्षति रोकने आदि में मददगार होते हैं। इनके चलते यह अधिक उम्र तक जीने में मदद करती है। मेरी पत्नी को दुख है कि मैं लाल मिर्च नहीं खा पाता। लेकिन मैं इसी तरह के अन्य स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ (जैसे रेड वाइन) लेता हूँ। और उम्मीद करता हूं कि वे भी इसी तरह से काम करते होंगे। (स्रोत फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष