March 24, 2018

अनकही

गुलाबी रंग बनाम महिला सशक्तीकरण  
- डॉ. रत्ना वर्मा
  इस बार २०१७-१८ के आर्थिक सर्वेक्षण की सबसे खास बात यह रही कि इसे गुलाबी रंग में पेश किया गया, जो महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को खत्म करने के लिए तेज हो रहे अभियानों को सरकार के समर्थन का प्रतीक है। इस आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों ने लैंगिक समानता के क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है, जो पूरे देश के लिए एक मॉडल हो सकता है। सर्वे में लैंगिक भेदभाव की बात जिन आयामों पर की गई है, उनमें महिला/पत्नी के प्रति हिंसाबेटों की तुलना में बेटियों की संख्या, प्रजनन, खुद पर और परिवार पर खर्च करने का फैसला लेने की क्षमता, आखिरी बच्चे के जन्म के आधार पर बेटा या बेटी को महत्त्व, महिलाओं के रोजगार, परिवार नियोजन के फैसले, शिक्षा का स्तर, शादी की आयु, पहले बच्चे के जन्म के समय महिला की उम्र आदि बातें शामिल हैं। सरकार ने इन संकेतकों के जरिए समाज में महिलाओं के सशक्तीकरण की पड़ताल की है।
 महिला सशक्तीकरण एवं लैंगिक समानता को समर्पित इस आर्थिक सर्वेक्षण में जितने भी मुद्दे उठाए गए हैं, वे एक ही बात की ओर संकेत करते हैं कि देश में स्त्रियों की स्थिति आज भी दोयम दर्जे की है। अन्यथा हर नागरिक को समानता का अधिकार वाले देश में आजादी के इतने बरस बाद भी लड़कियों को लेकर इतना भेदभाव क्यों। सर्वेक्षण का यह आँकड़ा चौंकाने वाला है कि वित्त वर्ष २००५-०६ में ३६ फीसदी महिलाएँ कामकाजी थीं, जिनका स्तर २०१५-१६ में घटकर २४फीसदी पर आ गया। भारत में अभी भी बेटों की चाहत ज्य़ादा है। आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि अधिकतर माता-पिता तब तक बच्चों की संख्या बढ़ाते रहते हैं, जब तक कि उनके यहाँ लड़के पैदा नहीं हो जाते। सर्वेक्षण में बालक-बालिका अनुपात के अपेक्षाकृत कम रहने का पता चलता है। २००१ में की गई गणना के अनुसार प्रति १००० लडक़ों की तुलना में ९२७ लड़कियाँ थी, जो २०१ में गिरकर ९१८ तक आ गया।
 गाँव हो या शहर महिला पुरूष भेदभाव की चुनौती लंबे समय से, कहना चाहिए सदियों से चली आ रही है। बेटे की चाह एक ओर जहाँ हमारे देश में जनसंख्या रोकने के उपायों में बाधक है, वहीं बेटे की कामना अवांछित बेटियों की बढ़ती संख्या को भी दर्शाता है। ऐसी कन्याओं की संख्या लगभग 21 मिलियन के लगभग आँकी गई है। पहली संतान यदि बेटी हुई, तो दूसरी संतान बेटे की उम्मीद में पैदा होती है और इस उम्मीद में अवांछित बेटियों की संख्या बढ़ती ही चली जाती है। इसका एक दूसरा पहलू कन्या- भ्रूणहत्या भी है। विज्ञान की तरक्की जहाँ एक ओर देश को विकास के रास्ते पर ले जाता है, तो वहीं दूसरी ओर विनाश की गर्त में भी धकेलता है। गर्भ में बच्चे के स्वास्थ्य का पता लगाते- लगाते लोग यह भी पता लगाने लगे कि आने वाला बच्चा लड़का है या लड़की? लड़की हुई तो उस भ्रूण को ही मार दिया जाता है और पैदा हो गई तो फिर तो वह जिंदगी भर के लिए एक बोझ बन जाती है।
 भारत ही नहीं पूरी दुनिया में में बेटियों को लेकर जो विसंगतियाँ हैं, वे किसी से छुपी नहीं हैं। बेटी को लेकर हो रहे भेदभाव को दूर करने के लिए हम न जानें कब से प्रयास करते आ रहे हैं पर बेटियाँ न जानें क्यों आज भी बेचारी ही बनी हुई हैं। हम यह कहते नहीं अघाते कि बेटियाँ हमारा मान, हमारा अभिमान, हमारी शान होती हैं। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता... जैसे बड़े- बड़े शब्द अब सिर्फ उद्धरण देने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि सच्चाई तो कुछ और ही रंग दिखाती है। अब नवरात्रि का पर्व शुरू हो गया है, जिसमें बेटियों को देवी के रूप में पूजा जाएगा। जबकि सच्चाई के धरातल पर इन्हीं बेटियों को भ्रूण में ही मार दिया जाता है, यही नन्हीं बच्चियाँ बलात्कार की शिकार होती हैं, लड़कियाँ पढ़-लिखकर क्या करेंगी, कहते हुए छोटे भाई-बहनों की देख-रेख में लगा दिया जाता है ,जिससे वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। विभिन्न सर्वेक्षण इस बात के गवाह हैं कि प्रायमरी स्कूल के आते-आते लड़कियाँ स्कूल जाना बंद कर देती हैं । या तो वे घर के काम-काज में झोंक दी जाती हैं या फिर कम उम्र में ही ब्याह कर माता पिता बेटी के बोझ से मुक्ति पा जाते हैं।
इस लिंगभेद की असमानता को ही दूर करने के लिए सरकार ने बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ योजना की शुरूआत की है;लेकिन क्या योजना से हालात सुधर रहे हैं? कुछ स्थानों के कागज़ी आँकड़े भले ही सुधार का संकेत दे रहे हों ; पर हालात वैसे नहीं सुधरे हैं ,जिसकी हम उम्मीद करते हैं। अत: योजना मात्र बनाने से या गुलाबी रंग में सर्वेक्षण रिपोर्ट पेश कर देने से, बेटियों की स्थिति में सुधार नहीं होने वाला। बेटियों को लेकर समाज का नज़रिया जब तक नहीं बदलेगा, बेटियाँ यूँ ही मारी जाती रहेंगी। सदियों से स्थापित इन रुढ़िगत सोच को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर काम करना होगा। सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ लड़कियों को शिक्षा इस सोच को बदलने का सबसे बड़ा अस्त्र हो सकता है। लड़कियों की शिक्षा के स्तर में सुधार सरकार की किसी भी योजना को फलीभूत कर सकता है।

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