February 23, 2018

चार कविताएँ

1. ले आए बगिया से 
- अनुभूति गुप्ता     
ले आए बगिया से
फूलों को नोंचकर,
बगिया को चिन्तित
होने को छोड़कर।
अब-
क्या करोगे इनका
सुगन्ध से इनकी
अभिभूत होगे?
फिर, कुछ मिनटों बाद
गैलरी में हाथों से
मसलकर फेंक दोगे।

क्या मिलता है
तुम्हें ये सब करके?
बगिया के हृदय को
दु:खों से भरके।

बड़ा मदमाते हो
हँसते हो अभिमान से,
स्तर में हीन हो
तुम तो
ड्योढ़ी पर पड़े
पायदान-से।
 2. अनाम यात्राएँ

 हाँ,
तुम्हीं हो:
हृदय में लिए हुए
सम्भावनाएँ-असम्भावनाएँ अपनी
नई-नई युक्तियाँ
सुझाते हुए-
हँसते-गाते, उन्मादी जगत के
क्रिया-कलाप को
समझाते हुए।
समझ लेती हूँ तुम्हें
नएपन से, अपनेपन से,
दिए हुए
अनगिनत सुझावों में,
मुख पर छाए
हुए उलझे हुए तुम्हारे भावों में।
क्या समझा भी
पाती हूँ तुम्हें मैं ?
नए अर्थो में, सुन्दर पंक्तियों में,
शब्दों की कौंधायी आँखों में,
शब्दों की देह पर
गिरती-उठती मात्राओं में,
सरल भाषाओं में,
यह रहस्य-
जीवन की अनाम यात्राओं का।
 3. घडिय़ाँ नहीं सोचती
घडिय़ाँ नहीं
सोचती हैं
टिक-टिक करने से पहले
उनकी नियति में हैं
हर किसी को
सही समय बतलाना
वे,
नहीं देखती हैं
अमीरी-गऱीबी को।
जिस क्षण
चुप्पी भर लेंगे
इन घडिय़ों के काटे
उसी क्षण
समझ जाना
रातों रात-
जि़न्दगी बदल जाएगी
सबकुछ
उथल-पुथल हो जाएगी ।
हरी-भरी धरती
त्रास से भर जाएगी ।
घाटियाँ
चीखेंगी
चिल्लाएँगी,
पक्षियों का रुदन सुनाई देगा।
समुद्र के गले से
चीखें
ऊपर की ओर उठेगी,
ज्वालामुखी
आक्रोश से फटेगा।
नदियाँ बाढ़ ले आएँगी।
शहर के टॉवर
सभी मीनारें
गाँव के खेत-खलियान
सब डूब जाएँगे।
माहमारी से
लोग मरने लगेंगे।
और
मन को समझाना
कठिन होगा
कि-
दुनिया का अन्त
बहुत नज़दीक होगा।
 4. गन्तव्य
मैं
अनन्त यात्रा
पर हूँ
पग-पग पर
काँटे बिछे हुए हैं।
पैरों के छाले
नजऱअंदाज़ करती हुई
बढ़ रही हूँ-
अपने गन्तव्य की ओर।
अँधेरी गुफाओं के,
मुँह से होते हुए
आ रही हूँ
चट्टानों की ओर।
दूरी से चट्टानें
स्वभाव की
सख्त लगती हैं।
पास से,
लाचार-बेबस
खुरदरे तन को लिये खड़ी हैं।
बीच-बीच में
काले-काले बादलों का गरजना
तेज़-तेज़ हवाओं का बहना
यात्रा में बाधाएँ
उत्पन्न करना
मन को विचलित सा करता है,
परन्तु-
एक ओर से
बढ़ता हुआ प्रकाश
उम्मीद की
किरण लाया है,
पर्वतों के मुख पर-
चमकीली
गहराती धूप का
खिलता हुआ साया है।

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