February 23, 2018

व्यंग्य

लाइक
-विनय कुमार पाठक
अगर कहूँ कि अंगरेजी के मामले में अपना हाथ थोड़ा तंग है तो इसका मतलब शायद यह निकल जाए या निकाला जाए कि हिन्दी में अपना हाल ठीक है। दोनों भाषाओं में अपन राम हैं तो फिसड्डी ही, पर मातृभाषा मगही होने के कारण हिन्दी बोलना आसान पाता हूँ अंगरेजी की तुलना में। अंगरेजी बोलने में पता नहीं क्यों अपना स्वर यंत्र गड़बड़ाने लगता है, हड़बड़ाने लगता है, बड़बड़ाने लगता है। स्वर यंत्र के साथ साथ पूरे शरीर में कंपन होने लगती है। मुँह सूखने लगता है। यदि सूखने न लगे तो मुँह से झाग निकलने की स्थिति बन आती है। मस्तिष्क अंधकारमय हो जाता है और दिल धक धक गर्ल के दिल की तरह धक धक करने लगता है; जियरा डरने लगता है। पाँव शरीर का वजन उठाने से इंकारकरने लगते हैं।अपनी इस कमजोरी का फ़ायदा उठाकर मुझसे भी कम अंगरेजी जानने वाले मुझ पर रौब गांठने लगते हैं। कारण बस यही है कि अंगरेजी बोलते वक्त उनका स्वर यंत्र और भी खुल जाता है, मस्तिष्क प्रकाशमय हो जाता है, दिल में मैकाले की आत्मा का वास हो जाता है। श्रेष्ठ भाषा वादक होने के दर्प से उनका मुखमंडल दैदीप्यमान हो जाता है।
मुझसे भी कम अंगरेजी जानने वाले मुझ पर अंगरेजी का रौब गांठते हैं यह मुझे तब पता चला जब अपना लिखा अंगरेजी का एक लेख एक सज्जन के पास पीडीएफ फाइल में भेजा था। उन्होंने उसे पढ़कर बताया कि इसमें तो व्याकरण सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ हैं। मैंने उनसे हिन्दी में आग्रह किया कि उदाहरण के लिए एक दो बता दो। मैं सुधार कर लूँगा। जनाब ने कुछ भी नहीं बताया पर एक अलग दांव फेंका। मुझसे वर्ड फाइल में लेख को माँगा। फिर रिव्यू में स्पेल्लिंग एंड ग्रामर विकल्प से एक दो गलतियाँ बताईं, जिसके बारे में मैंने उन्हें विनम्रता से बताया कि अमेरिकन और ब्रिटिश इंग्लिश में शब्दों के वर्तनी सम्बन्धी कुछ अंतर होते हैं। वर्तनी सम्बन्धी ही नहीं और भी कई अंतर होते हैं।बेचारे बड़े दुखी हुए कि अंगरेजी के दो वाक्य बोलने में थरथराने वाला शख्स उन्हें ब्रिटिश और अमेरिकन इंग्लिश समझा रहा है। जनाब न सिर्फ अंगरेजी फर्राटे से बोलते हैं, बल्कि दाढ़ी भी फ्रेंचकट रख रखी है और सर को नियमित रूप से मुँडवाते हैं ही। ऐसे आधुनिक फैशन परस्त और ताबड़तोड़ अंगरेजीवादक को मुझ जैसे निकृष्ट, अंगरेजी न बोल पाने वाले व्यक्ति से, अंगरेजी के बारे में किसी प्रकार की जानकारी होने के कारण कुछ ऐसा नागवार गुजरा कि उनकी मुखाकृति जो कभी-कभार वक्र होती थी अब स्थायी तौर पर वक्र हो गई प्रतीत होती है।
तो मैं अपनी अज्ञानता की बात इसलिए कर रहा था कि अंगरेजी में एक शब्द है लाइक जिसका जहाँ तक मुझे पता है अर्थ होता है पसंद करना। फेसबुक पर लाइक करने की सुविधा है। इस सुविधा का उपयोग लोग उसी प्रकार करते हैं जैसे लावारिस खड़ी स्कूटर के रियर व्यू मिरर में चेहरा देखने के लिए प्रयोग करते हैं या फिर उसके एक्सेलेरेटर को उमेठने का प्रयोग उसी अधिकार से करते हैं जैसे एक जमाने में शिक्षक छात्रों के कान उमेठने का कार्य करते थे।
कुछ ऐसे पोस्ट पर लाइक देखता हूँ तो मेरा अपने इस शब्द के बारे में ज्ञान के प्रति शंका होने लगती है। या फिर लाइक डिसलाइक के समझ के प्रति समझदारी पर संदेह होने लगता है।
उदाहरण के लिए एक सज्जन ने फेसबुक पर पोस्ट डाला- मेरी ममेरी बहन की मृत्यु हृदयाघात के कारण मात्र तीस वर्ष की उम्र में हो गई, न कोई दर्द न और कोई परेशानी, बस गुपचुप तरीके से मौत ने उसे दबोच लिया। अब इस पर सैकड़ों लाइक देखे गए। अब लाइक करने वाले किस बात को लाइक कर रहे हैं यह समझना मेरे लिए टेढ़ी खीर है। पोस्ट डालने वाले सज्जन की बहन की मृत्यु को लाइक किया गया या हृदयाघात से मृत्यु को लाइक किया गया या फिर सिर्फ तीस वर्ष की उम्र में मृत्यु में से किसी एक को या समग्र रूप से सम्पूर्ण घटना को लाइक किया गया यह मेरे समझ से परे हैं।
इसी प्रकार एक सज्जनी ने (सजनी कहना शायद असभ्यता का प्रतीक माना जाएगा) पोस्ट लिखा- आज हमारे पिताजी हमें रोता बिलखता छोड़ पंचतत्व में विलीन हो गए। इस पर भी लाइक की भरमार लग गई। वैसे भी देखा गया है कि महिला के पोस्ट पर लाइक कुछ ऐसे चिपकता है चुनाव के समय टिकट पर नेता। पर यहाँ भी बात मेरे समझ में नहीं आई कि लाइक किस बात को किया जा रहा है। पिताजी की पंचतत्व में विलीन होने को या रोता बिलखता छोड़ने को या फिर दोनों को।
वैसे लाइक के लिए फेसबुक ने आधा दर्जन विकल्प उपलब्ध करवा रखा है जिसमें एक उदास विकल्प भी है। पर हो सकता है ये विकल्प बाद में उपलब्ध करवाए गए हैं अतः इन पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। यह भी हो सकता हो लोगों को यह बात बहुत पसंद और उदास के औसत निकालकर लाइक किया हो। या फिर हो सकता है लाइक करने वालों को सचमुच ही उन्हीं में से कोई एक बात लाइक हो जो मैं समझ पा रहाहूँ।तो इस लाइक के फंडे को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ और इसफंदे को सुलझा नहीं पा रहा हूँ। अभी अभी एक श्रवणकुमार के कल्कि प्रतिरूप एक प्रोफ़ेसर के द्वारा ब्रेन हैमरेज से पीड़ित माँ की ह्त्या से संबंधित पोस्ट पर भी सैकड़ों लाइक दिखा। ऐसे लाइक करने वाले कहीं ऐसा न हो कि इस घटना से प्रेरित होकर कुछ नवोन्मेषी योजना बना रहे हों। कोई ऐसे योजना जिसमें प्रोफ़ेसर की तरह पकड़े जाने की आशंका न होइस परिस्थिति ने अपनी स्थिति बड़ी ही विचित्र बना दी है।अब यदि मैं इस दुविधा को फेसबुक पर अपलोड करूँ तो उसे भी लोग लाइक कर दें। और फिर मैं सोचता रहूँ कि किस बात को लाइक किया लाइक करने वाले ने- मेरे लाइक का फंडे को न समझ पाने को या फंदे को न सुलझा पाने को या मेरी स्थिति विचित्र बन जाने को।


लेखक के बारे मेः विभिन्न पत्रिकाओँ यथा सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, गृहशोभा में रचानाएँ प्रकाशित| 'Besmirched God' (partridge publishing)  शीर्षक से लघु उपन्यास तथा उसका हिन्दी रूपांतरण 'निस्संग' (अंजुमन प्रकाशन) के नाम से प्रकाशित| 'एषणा' लघु उपन्यास यथार्थ प्रकाशन की सहायक कंपनी अनवरत प्रकाशन से | एक व्यंग्य उपन्यास 'यशोधनम' अयन प्रकाशन से। कथादेश में लघुकथाएँ, अट्टहास, परिंदे में व्यंग्य रचना तथा राजस्थान पत्रिका में कहानियाँ तथा लघुकथाएँ प्रकाशित। सम्पर्कः 2बीब्लॉक- एफ, जयश्री ग्रीन सिटी, पुन्दाग रोड, अरगोड़ा, राँची, झारखंड 834002, 9001895412, email- binaypathak1964@gmail.com

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