February 23, 2018

इतिहास

  अहमदाबाद अब विश्व धरोहर शहर
- जाहिद खान
किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति और सांस्कृतिक, प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों से होती है जो उसे दूसरे देशों से अलग दिखलाती हैं। हमारे देश में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक ऐसी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक छटाएँ बिखरी पड़ी हैं कि विदेशी पर्यटक उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो जाएँ। प्राचीन स्मारक, मूर्ति शिल्प, पेंटिंग, शिलालेख, प्राचीन गुफाएँ, वास्तुशिल्प, ऐतिहासिक इमारतें, राष्ट्रीय उद्यान, प्राचीन मंदिर, अछूते वन, पहाड़, विशाल रेगिस्तान, खूबसूरत समुद्र तट, शांत द्वीप समूह और भव्य किले। यह धरोहर सचमुच बेमिसाल है।
ऐसी ही एक बेमिसाल धरोहर गुजरात का छह सौ साल पुराना शहर अहमदाबाद अब विश्व धरोहर शहर बन गया है। यूनेस्को की विश्व विरासत समिति ने हाल ही में अहमदाबाद शहर को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। तुर्की, लेबनान, ट्यूनीशिया, पुर्तगाल, पेरू, कज़ाकिस्तान, वियतनाम, फिनलैंड, अज़रबैजान, जमैका, क्रोएशिया, ज़िम्बाब्वे, तंज़ानिया, दक्षिण कोरिया, अंगोला और क्यूबा समेत करीब 20 देशों ने इस बैठक में सांस्कृतिक शहरों की श्रेणी में अहमदाबाद का समर्थन किया। इन देशों ने इसे लकड़ी की हवेली की वास्तुकला के अलावा सैकड़ों वर्षों से मुस्लिम, हिंदू और जैन समुदायों के सह-अस्तित्व वाला शहर मानते हुए सर्वसम्मति से चुना। इन देशों के प्रतिनिधियों के लिए अहमदाबाद का महत्व इसलिए भी था कि यही वह शहर है जहाँ  से महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत का अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम शु डिग्री हुआ था और 1947 में अंजाम तक पहुँचा था। महात्मा गांधी वर्ष 1915 से 1930 तक यहाँ  रहे और उनकी कई यादें, इस ऐतिहासिक शहर से जुड़ी हैं।
देशवासियों के लिए यह सचमुच गर्व की बात है कि यूनेस्को ने पहली बार भारत के किसी शहर को विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। भारत के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास मायने रखती है कि भारतीय उपमहाद्वीप के केवल दो शहर - नेपाल के भक्तपुर और श्रीलंका के गाले को ही इस सूची में शामिल होने का गौरव हासिल है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पेरिस, वियना, काहिरा, ब्रूसेल्स, रोम और एडिनबरा ही इस श्रेणी में शामिल हैं।
अहमदाबाद शहर को विश्व धरोहर की फेहरिस्त में शामिल करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें बीते सात साल से लगातार कोशिश कर रहे थे। गुजरात सरकार ने अहमदाबाद को वर्ल्ड हैरिटेज सिटी का दर्जा प्रदान करने के लिए 31 मार्च, 2011 में इस शहर का विस्तृत विवरण तैयार कर एक प्रस्ताव विश्व विरासत केन्द्र को भेजा था। प्रस्ताव में अहमदाबाद के अभूतपूर्व सार्वभौम मूल्यों का उल्लेख करते हुए पिछली कई सदियों से इस शहर की अनोखी बसाहट, आर्थिक, वाणिज्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के साथ विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच सहअस्तित्व की भावना का खास तौर से उल्लेख था। यही नहीं प्रस्ताव में अहमदाबाद के परकोटा क्षेत्र में बने ओटले (चबूतरे), पोल और उनकी गलियाँ, पोलों में रहने वाले लोगों के रहन-सहन को भी शामिल किया गया था। लकड़ी व स्थानीय ईंटों से तैयार किए गए पोल के मकान अपनी बनावट और नक्काशी के लिए अनूठी पहचान रखते हैं। इन मकानों के आँगन की खासियत है कि ये वातावरण को नियंत्रित करने में मददगार साबित होते हैं। पोलों की गलियों का आपसी जुड़ाव भी अनूठा है।
बहरहाल, सरकार की कोशिशें रंग लाईं और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद की सिफारिश पर यूनेस्को की वर्ल्ड हैरिटेज कमेटी ने अहमदाबाद शहर को विश्व विरासत की फेहरिस्त में शामिल कर लिया। यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में शामिल कर लिए जाने के बाद, वह जगह या स्मारक पूरी दुनिया की धरोहर बन जाता है। इन विश्व स्मारकों का संरक्षण यूनेस्को के इंटरनेशनल वर्ल्ड हैरिटेज प्रोग्राम के तहत किया जाता है। यूनेस्को हर साल दुनिया भर के ऐसे ही बेहतरीन सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्मारकों को सूचीबद्ध कर उन्हें उचित देखभाल प्रदान करती है; वह इन विश्व धरोहरों का प्रचार-प्रसार करती है, जिससे ज़्यादा से ज़्यादा पर्यटक इन स्मारकों के इतिहास, स्थापत्य कला, वास्तु कला और प्राकृतिक खूबसूरती से वाकिफ होते हैं। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने का एक फायदा यह भी होता है कि उससे दुनिया भर के पर्यटक उस तरफ आकर्षित होते हैं।
अहमदाबाद शहर की स्थापना तत्कालीन मुगल शासक अहमद शाह अब्दाली ने आज से छह सदी पहले 1411 में की थी। ज़ाहिर है कि उन्हीं के नाम पर बाद में इस शहर का नाम अहमदाबाद पड़ा।
अहमदाबाद न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थापत्य कला के लिहाज़ से भी इसकी एक अलग अहमियत है। चारों ओर दीवारों से घिरे इस ऐतिहासिक शहर में दस दरवाज़े हैं और 29 ऐतिहासिक महत्व के स्मारक हैं, जिनके संरक्षण की ज़िम्मेदारी भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) पर है। देश के दीगर ऐतिहासिक शहरों की बनिस्बत इन स्मारकों के संरक्षण का काम यहाँ बेहतरीन है। इस शहर के स्मारकों की नक्काशी व बनावट लाजवाब है। इनको देखकर अतीत का पूरा परिदृश्य साकार हो जाता है। जामा मस्जिद, रानी रूपमती की मस्जिद, झूलती मीनारें, हट्टी सिंह का जैन मंदिर, शाही बाग पैलेस, कांकरिया झील, भद्र का किला, सीदी सैयद की मस्जिद, साबरमती आश्रम, लोथल, अदलज की बाव, मोढेरा का सूर्य मंदिर, तीन दरवाज़ा, सीदी बशीर मस्जिद, नल सरोवर, विजय विलास पैलेस आदि सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने वाले ये स्थल और स्मारक देशी-विदेशी सैलानियों को अपनी खूबसूरती से अचंभित कर देते हैं।
गुजरात में विदेशी सैलानियों की पहली पसंद अहमदाबाद होती है। यहाँ  की संस्कृति, प्राचीन मंदिर, मस्जिदें, प्राकृतिक झीलें, बाव और आलीशान इमारतें उन्हें खूब भाती हैं। यूनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद निश्चित तौर पर पर्यटकों की संख्या और भी बढ़ेगी। अभी तक भारत के केवल 35 स्मारक विश्व विरासत सूची में शामिल थे। अहमदाबाद के विश्व विरासत की सूची में शामिल हो जाने से अब इनकी संख्या 36 हो गई है। 
अब जबकि अहमदाबाद को विश्व धरोहर का दर्जा मिल गया है, तो केंद्र व राज्य सरकार दोनों की ये सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इस शहर के ऐतिहासिक स्मारकों और पर्यटक स्थलों को और भी ज़्यादा बेहतर तरीके से सहेजने और संवारने के लिए एक व्यापक कार्ययोजना बनाएँ  ताकि ये अनमोल धरोहर हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहें। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने के बाद, निश्चित तौर पर ज़िम्मेदारियों में भी इजाफा होता है। ज़िम्मेदारियाँ न सिर्फ सरकार की बढ़ी हैं, बल्कि हर भारतीय नागरिक की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपनी इन अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजे। (स्रोत फीचर्स)

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष