January 27, 2018

परिवार

   भूत और भविष्य के सेतु हमारे बुजुर्ग
                 - शशि पाधा
घनी शाखाओं वाले विशाल बरगद की ठण्डी छाँव हर थके हारे प्राणी की थकान तथा चिन्ताएँ हर लेती है। जो वृक्ष वसन्त की  उन्मुक्त, शीतल पवन तथा शिशिर के ठँडे थपेड़े सहन कर ऐसी विशालता को प्राप्त हुआ हो कि  उस के गाँव अथवा शहर के लोग उसकी शीतल छाया में बैठ कर अलौकिक शान्ति का अनुभव करते हों, वहाँ के लोगों के लिए अति आदरणीय एवं पूजनीय हो जाता है। ठीक वैसे ही हैं हमारे परिवार के बुज़ुर्ग, जिनकी छत्र छाया में हर परिवार शान्तिमय  और सुखद जीवन बिताता हुआ फलता-फूलता है।
किन्तु आज के भागदौड़ के युग में संयुक्त परिवार का अभाव खलने लगा है। कई परिवार आर्थिक, व्यावसायिक या  एकाकी जीवन जीने की प्रबल इच्छा रखते हुए छोटी-छोटी इकाइयों में बँट गये हैं । साथ ही आर्थिक व्यवस्था  का ध्यान रखते हुए पति-पत्नी दोनों ही घर से बाहर कामकाज के लिये जाते हैं। और शायद आज यही समय की माँग भी है । लेकिन ऐसी स्थिति में  माता -पिता दोनों ही आजीविका कमाने में इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों के साथ बिताने के लिए उनके पास समय का सदा अभाव ही रहता है। इन व्यस्त अभिभावकों के पास अपने छोटे बच्चों के उत्सुकता पूर्ण प्रश्नों के समाधान  के लिए समय और धैर्य दोनों की कमी भी रहती है। इस अभाव की पूर्ति संयुक्त परिवार के वयोवृद्ध सदस्य बड़ी आसानी से कर सकते हैं।  घर में रहते हुए बुज़ुर्ग  बड़े धैर्य और स्नेह से बच्चों की हर आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं। हमारे बड़े बुज़ुर्गों के पास उनके बुज़ुर्गों से सुनीं महाभारत, रामायण तथा पंचतन्त्र की कहानियाँ हैं जिन्हें घर परिवार के नन्हे- मुन्ने बच्चों को सुना कर परोक्ष में वे उन्हें अपने नैतिक मूल्यों  एवं संस्कारों के प्रति सजग करते हुए अपनी सांस्कृतिक, तिहासिक तथा धार्मिक आस्थाओं से समय- समय पर परिचित करवाकर उनके चरित्र निर्माण में अमूल्य योगदान दे सकते हैं। आज संयुक्त परिवार में पलते हुए बच्चे जब अपने माता- पिता को उनके माता-पिता के साथ आदर, भक्ति तथा सेवा का व्यवहार करते देखते हैं तो इन पारिवारिक गुणों को वे सहज ही आत्मसात् कर लेते हैं ,जो बड़े होने तक उनके स्वभाव का एक बहुमूल्य भाग बन जाता है।
विश्व के हर देश में कामकाजी माता-पिता के बच्चों को सँभालने/पालने के लिए कई संस्थाएँ बनी हुई हैं ,जहाँ दिन भर  के लिए बच्चों की देखभाल की जाती है। प्रश्न केवल यह है कि क्या वहाँ के कर्मचारियों का उन नन्हें मुन्नों के साथ भावनात्मक सम्बन्ध बन सकता है? या एक ही कमरे में 20/ 40 बच्चों के साथ वैसे स्नेह और ममता का व्यवहार किया जा सकता है जो उनके अपने घर में बुज़ुर्ग बड़े प्रेम से कर सकते हैं। कहते भी हैं कि असल से सूद अधिक प्यारा होता है। यानी जिस  निश्चल स्नेह से दोनों पक्ष एक दूसरे को आनन्द से सराबोर कर सकते हैं, वैसे नैसर्गिक सुख को कोई भी बाह्य व्यक्ति नहीं दे सकता। सब से मुख्य बात तो यह हो सकती है कि ऐसी स्थिति में कामकाजी माँ बाप निश्चिन्त हो कर अपने व्यवसाय को सफल बनाने में  सक्षम हो सकते हैं।
आज का युवा वर्ग बहुत ही भावुक हो गया है। कई बार रोष में आकर बिना सोचे समझे वह ऐसे निर्णय ले लेता है जो कभी -कभी उसके लिए विनाशकारी भी सिद्ध हो सकते हैं । जिस भी परिवार में बड़ों से सलाह लेकर निर्णय लिया जाता है ,वह परिवार कई आपदाओं से बच जाता है  क्योंकि हमारी पुरानी पीढ़ी अपने अनुभव के अनुसार नई पीढ़ी को उनके निर्णय के हानि -लाभ के बारे में समझा सकती है। आज के प्रतिस्पर्द्धा के युग में नौकरी करते हुए युवाओं को अपने अधिकारियों तथा सहकर्मियों के साथ काम करते हुए कई व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है । ऐसे में हमारे बुज़ुर्गों का अनुभव उन्हें परिस्थिति के साथ सही ढंग से निपटने की सलाह के साथ-साथ  प्रशासन तथा प्रबन्ध की दिशा में उनका मार्ग दर्शन कराता है।
पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में आकर कई भारतीय परिवार भी टूट रहे हैं।  छोटी -मोटी कलह में पड़ कर पति पत्नी विवाह के बन्धन से मुक्त होने को तैयार बैठे रहते हैं।  कभी रोष, अहं तथा भावुकता से अन्धे हो कर लिये गए निर्णय उनके बच्चों के भविष्य को अंधकारमय बना सकते हैं । ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण  स्थिति से बचाने में परिवार के बड़े सदस्यों का बहुमूल्य  योगदान हो सकता है। एक तो जिस घर में बड़े लोग रहते हों उस घर में उनका मान रखते हुए पति-पत्नी आपसी झगड़ा करने से पहले सोचेंगे अवश्य। और अगर स्थिति सीमा से बाहर ओ जाए ,तो अनुभवी वृद्ध  दोनों पक्षों को समझा बुझाकर बच्चों के परिवार को उजड़ऩे से बचा सकते हैं।
आज की पुरानी पारिवारिक आस्थाओं में परिवर्त्तन आ रहा है। कई परिवारों में नई पीढ़ी अपने अभिभावकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूलती जा रही है। कारण कुछ भी हो, कई बुज़ुर्गों को उनकी सहमति के बिना वृद्धाश्रमों में रहने के लिए बाध्य किया जा रह है। वृद्धाश्रमों का विधान इसलिए हुआ था कि कई निसंतान या रोगी माता -पिता, जिनके बच्चे कुछ समय के लिए दूसरे शहर, देश में जीविकार्जन के लिए रह रहे हों, उनकी ऐसे आश्रमों में रहकर सही देखभाल हो सके। साथ ही बुज़ुर्ग भी सम आयु के लोगों के साथ रह कर अपना जीवन सुख से बिता सकें । किन्तु आज ऐसा देखा जा रह है कि कई परिवारों में बड़ी आयु के लोगों को अपने जीवन की दौड़ में बाधा मानते हुए बिना किसी कारण के वृद्धाश्रमों में  अपने प्रिय जनों से दूर एकाकी जीवन जीने के लिए धकेला जाता है। यह किसी भी समाज के लिए अत्यन्त निन्दनीय बात है। ऐसी सन्तान यह भूल जाती है कि जिन माता पिता ने बड़ी मेहनत, बड़े लाड़ प्यार से पाल पोस कर अपने बच्चों को इस योग्य बनाया है कि वे स्वावलम्बी होकर समाज में अपना सही स्थान बना सकें, वही सन्तान इन श्रद्धेय तथा स्नेह के सागर माता पिता की भावनाओं का निरादर करते हुए उन्हें ऐसी संस्थाओं में छोड़ कर मातृ-पितृ धर्म से मुक्त होना चाहते हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि  परोक्ष में अपने बच्चों को  उनके प्रति वैसे ही व्यवहार के लिए मार्ग दिखा रहे हैं।
इस पूरे संदर्भ में एक बात उल्लेखनीय है कि पारिवारिक उन्नति, शान्ति एवं खुशहाल वातावरण बनाने के लिए  युवा वर्ग के साथ साथ  वरिष्ठ सदस्यों का उत्तरदायित्व अधिक है ।
संयुक्त परिवार में रहते हुए हमारे बुज़ुर्गों को भी अपनी दिनचर्या, स्वभाव और आचरण में बदलाव लाना अत्यावश्यक है। आज के बदलते हुए सामाजिक, पारिवारिक परिस्थितियों में  अगर वे अपनी रूढ़िवादी मान्यताओं को नई पीढ़ी पर थोपेंगे ,तो कलह का कारण बन सकते हैं। सब से पहले तो वे अपने स्वास्थ का पूरा ध्यान रखें ताकि अपने कामकाजी बच्चों की चिन्ताओं को और न बढ़ाएँ। घर के काम काज में पूरा योगदान दें। बागवानी, योगाभ्यास, कम्प्यूटर, आदि  कोई न कोई ऐसा शौक अपनायें ताकि प्रसन्नतापूर्वक अपना समय बिता सकें। साथ ही वे इस बात से सदा सतर्क रहें कि चूँकि वे बड़े हैं, अत: उनकी इच्छा, राय और  पसन्द  ही हर मौके पर मान्य हो। ऐसे में एक फलते फूलते परिवार में बेबसी तथा दबाव का वातावरण पैदा हो सकता है। अगर उनके पास अर्थ का अभाव नहीं है ,तो उन्हें परिवार में आर्थिक सहयोग भी देना चाहिए। सब से मुख्य बात तो यह है कि वे अपने सार्थक सहयोग से परिवार के आदरणीय एवं पालक बन सकते हैं; लेकिन उन्हें बदलते समय के साथ बदलना पड़ेगा।
आज की वृद्ध पीढ़ी के पास साहित्य, संस्कृति तथा पौराणिक कथा कहानियों एवं नैतिक दृष्टान्तों का वृहद्कोश है। वे तो अनुभव की खान हैं। ये बुज़ुर्ग अपने इस संचित कोश के अमूल्य रत्नों को भावी पीढ़ी में सहज ही स्थानान्तरित कर सकते है। यह पीढ़ी प्रत्येक परिवार के लिए भूत और भविष्य को जोड़ऩे में एक दृढ़ सेतु के समान है जो कल-आज और कल में बहती हुई समय रूपी नदी के किनारों को जोड़ऩे में सक्षम है।
सम्पर्क: 174/3, त्रिकुटा नगर जम्मू, सम्प्रति- वर्जिनिया, यू एस

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