December 18, 2017

दो कविताएँ:

1. मेरा नगर

हरी भरी वादियों का
सुंदर शहर
इन दिनों
नेताओं की मेहरबानी से
कचराघर हो गया है।

रातों रात
यूँ हुई पट्टों की बरसात
कि हरी भरी पहाडिय़ाँ
अव्यवस्था के जंगल में
बदल गर्इं
और मेरे शहर की किस्मत
उजड़ गई
अब तो सारा मंजर बदल गया है
मेरा शहर.....

चंपा चमेली मोगरे की सुगँध
बीते दिनों की बात रह गई
उनकी जगह
धुँआ, धूल, डीजली हवा आबाद हो गई
सड़कों का यूँ हाल है
उन पर चलना मुहाल है
अकेले में सोचता हूँ
क्या चाहा था क्या हो गया है
मेरा शहर......
  
बँट चुके चौराहों पर
दिवंगतों के बुत
साल में एक दिन
खूब सजते सँवरते हैं
बाकि दिनों उन पर
कौवे विचरते हैं
पूरा का पूरा नगर
अब पीकदान हो गया है
मेरा शहर......
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2. मेरा देश बचाना बाबा

अब के बारिश नहीं हुई है
फसलें सारी सूखीं बाबा।

बहते हैं आँसू हरिया के
उसे दिलासा देना बाबा।

सावन भी सूना बीता है
कैसे झूला झूलें बाबा।

बच्चे भूख से बिलख रहे हैं
लोरी इन्हें सुनाना बाबा।

गोरी भूल गई है गाना
उसका साज सजाना बाबा।

बहना गुमसुम सी बैठी है
उसको जरा हँसाना बाबा।

गुंडे बैठे चौपालों पर
उनको सीख सिखाना बाबा।

गाँव में नेता घुस आया है
इससे जरा बचाना बाबा।

रस्तों पर फिर दंगे भड़के
प्यार का रस बरसाना बाबा।

गली गली में आग लगी है
तुम ही उसे बुझाना बाबा।

देश का यौवन बिखर रहा है
फिर से आस जगाना बाबा।

मैं खुद में भटक गया हूँ
मुझको ठौर दिलाना बाबा।



लेखक परिचय: विजय जोशी- भेल भोपाल के पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक विजय जोशी ने यात्रा की शुरुआत तो कविताओं से की थीलेकिन बाद में लेखन की नैया को प्रबंधन की धारा में जोड़ दी। उनके कविता संग्रह  भला लगता है’  पर श्री गुलज़ार ने  भूमिका लिखी है। प्रबंधन को लेकर उनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। उनकी इन पुस्तकों की भूमिका पद्मश्री मार्क टुलीगांधीवादी चिंतक डा. एस. एन. सुब्बारावपर्यावरणविद श्री राजेन्द्र सिंह द्वारा लिखी गई हैं। जोशी जी के अनुसार इन सब में नया कुछ भी नहींवही सब दुहराया गया हैजो सदियों से उपलब्ध है। संप्रति: कौंसिल मेंबरइंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स (इंडिया)। सम्पर्क: 8/ सेक्टर- 2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास) भोपाल- 462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

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