April 20, 2017

उर्दू हास्य व्यंग्य

 जवानी और बुढ़ापा 
- डॉ. मोहम्मद युनूस बटअनुवाद- अख़्तर अली
पहले बुढ़ापा कलात्मक होता था आज कल भयानात्मक होता है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप बुढ़ापे की दुनिया में जवानी के कौन से रास्ते से दाखिल हुए है। विशेषज्ञों ने दावा किया है कि 2035 तक देश मे बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। अब ये तो दुनिया का नियम है कि यहाँ अगर कोई चीज़ बहुत ज्यादा मात्रा में है तो उसकी कीमत बहुत कम हो जाती है। कालेज के प्रोफेसर ने पाँच लड़कों को कक्षा मे खड़ा किया और कहा - तुम चार लड़कों के दिमाग़ की कीमत पाँच सौ रुपये प्रति ग्राम और मेरे से कहा - तुम्हारे दिमाग की कीमत डबल यानी हज़ार रुपये प्रति ग्राम है। अपने दिमाग की कीमत जान कर मैं पूरी तरह खुश हो भी नही पाया था कि प्रोफ़ेसर साहब ने बताया कि जो वस्तु बहुत कम मात्रा में पाई जाती है उसकी कीमत हमेशा बहुत अधिक होती है। मुझे लगता है बूढ़ों की बढ़ती तादाद से उनकी मार्केट वेल्यू एकदम घट जाएगी। जनसंख्या रोकने के तरीके ढूँढ़ निकाले बुढ़ापा रोकने का कोई उपाय नही है। अब जब चारो तरफ़ बूढ़े ही बूढ़े हो जाएँगे तो उन्हे बूढ़ा समझ उनकी इज्ज़त कौन करेगा?
बूढ़ों को हमारे समाज मे वही स्थान प्राप्त है जिस स्थान पर वह बैठे रहते हैं। हम बूढ़ों के खिलाफ़ नही ,क्योंकि हमें भी एक दिन बूढ़ा होना है लेकिन बूढ़े हमारे खिला$फ रहते है क्योंकि उन्हें अब कौन सा जवान होना है।
हमारे यहाँ बूढ़े नसीहत देने के काम आते है। एक बूढ़े ने बच्चे को नसीहत देते हुए कहा - बेटे अपनी बाईक की रफ्तार उतनी ही रखना जितनी मेरी दुआओं की रफ्तार है यानी चालीस किलो मीटर प्रति घंटा, ये उनकी दुआओं की रफ्तार है नसीहतों की रफ्तार बाईक की रफ्तार जैसी है ।
बूढ़े हमेशा ये सोच कर परेशान रहते हैं कि नई पीढ़ी बड़ी होकर क्या करेगी?
एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पच्चीस प्रतिशत लोग यह मानते है कि बूढ़े एकदम खाली रहते है, जबकि तीन प्रतिशत बूढ़े भी इस रिपोर्ट से सहमत नहीं है, उन सबका कहना है कि हमारे पास पलभर की भी फ़ुरसत नही है। दरअसल जवान जिस काम को पाँच मिनट में करके दिन भर खाली बैठे रहते है, बूढ़े उसी पाँच मिनट के काम को करने मे पूरा दिन लगा देते है लिहाज़ा उनके पास पाँच मिनट का भी टाईम नहीं होता। बुढ़ापे की बस एक ही बीमारी है और वह है बुढ़ापा और बुढ़ापे के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
बुढ़ापे मे अक्सर भूल जाने की आदत होती है। तीन बूढ़े आपस मे बात कर रहे थे, एक ने कहा- जब मैं सीढिय़ों के बीच मे पहुँचता हूँ तब भूल जाता हूँ कि मुझे चढऩा है या उतरना, दूसरे ने कहा- जब मे फ्रिज खोलता हूँ तो भूल जाता हूँमुझेकुछ रखना है या निकालना है, तीसरे ने कहा- मैं कभी- कभी यही भूल जाता हूँ  कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। वैसे मैं ये बात दावे के साथ कह सकता हूँ  कि आप किसी भी बूढ़े को झाड़ेंगे तो उसमे से एक जवान आदमी निकलेगा।
कहते है स्वर्ग मे कोई बूढ़ा नहीं होता और अगर यहाँ बूढ़ो की संख्या बढ़ती गई तो फिर इस देश के स्वर्ग बनने की कोई संभावना नहीं रहेगी।
अब जो लोग कहते है कि 2035 तक बूढ़ों की संख्या दोगुनी हो जाएगी उन्हें मैं ये भी बता दूँ उस वक्त जो बूढ़े होगे वो बुढ़ापे की सभी परिभाषाएँ  बदल देंगे;क्योंकि उल वक्त हम बूढ़े होंगे।
एक बात और बुढ़ापे की सभी बाते बूढ़े पुरुषों के बारे में ही होती है बूढ़ी औरतों के बारे में नहीं, क्योंकि औरत कभी बूढ़ी नहीं होती।

सम्पर्क: आमानाका, रायपुर (. .), मो. . 9826126781

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष