July 18, 2016

अनकही


महिला लेखन की चुनौतियाँ....
- डॉ. रत्ना वर्मा
आज हम हमारी आधी दुनिया यानी महिलाओं के लेखन के क्षेत्र में बढ़ते कदमों के बारे में बात करेंगे। एक वह समय भी था ,जब महिला लेखन के बारे में बहुत कम चर्चा की जाती थी। गिनी चुनी लेखिकाएँ जो छपती थींउन्हें इसलिए भी गंभीरता से नहीं लिया जाता था कि महिलाएँ आखिर क्या लिखेंगी? उनकी तो दुनिया घर तक ही है।  जबकि इतिहास गवाह है कि महिलाओं ने घर के दायरे से निकल कर ऐसे विषयों पर भी अपनी कलम चलाई, जिससे समाज ही नहीं देश के विराट फलक पर अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हुईं हैं। बहुत पीछे न जाकर आजादी के दौर की बात करें ,तो सुभद्राकुमारी चौहानसरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, उषादेवी मित्र और सुमित्रा सिन्हा जैसी अनेक लेखिकाओं का साहित्य राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ा था। इन लेखिकाओं की लेखनी के दम पर ही आजादी के आंदोलन में हजारों महिलाएँ घर से बाहर निकल आईं थीं।
आज तो महिला लेखन की दुनिया ही बदल गई है। विशेषकर तब जब उसने इंटरनेट की वैश्विक दुनिया में कदम रखा है। पिछले कुछ दशकों में नारी की जीवनचर्या, उसके सोचने- समझने की क्षमता और अपने होने के अहसास के बारे में काफी बदलाव आया है। स्त्री जहाँ एक ओर उच्च शिक्षा प्राप्त कर हर क्षेत्र में अपनी काबिलि का लोहा मनवा रही है ; वहीं उसने स्त्री के प्रति समाज का नरिया बदलने में भी कामयाबी हासिल की है। अपने साथ हो रहे अत्याचार, शोषण और एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किए जाने का विरोध करते हुए भारतीय नारी ने अपने दुर्गा रू को यथार्थ में बदलकर दुनिया को यह जतला दिया है कि वह अपना  एक स्वतंत्र अस्तित्व रखती है, और उसका भी अपना स्वाभिमान है।
 इन्हीं सबके चलते महिलाओं के अपने लेखन का दायरा भी बढ़ा है। इस दायरे को बढ़ाने में इंटरनेट की दुनिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेखन उस दौर में भी चलता था और खूब चलता था ,जब लेखकों को पाठकों तक पहुँचने के लिए समाचार पत्र या पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजनी पड़ती थीं, या फिर उनकी खुद की पुस्तक प्रकाशित होती थी; पर इसका दायरा सीमित था और महिलाओं के लिए तो और भी। एक तो वह अपने लिखे को संकोचवश कहीं छपने के लिए भेजने में हिचकिचाती थीं और दूसरे बड़ी- पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएँ या एक सिमटा हुआ दायरा हुआ करता था ; जहाँ नए रचनाकारों का प्रवेश आसान नहीं होता था। लेकिन इसके बावज़ूद यह भी सही है कि बहुत सी महिला रचनाकारों ने पुरु प्रभुत्व के इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। पर तब भी मुकाबले में वे थीं तो दूसरे नम्बर पर ही। 
लेकिन अब समय बदल गया है, मुकाबले में बराबरी करने वे दम-खम के साथ आ खड़ी हुईं हैं, और नि:संकोच अपनी बात सबके सामने रख रही हैं। वे लिख भी खूब रही हैं और छप भी रही हैं, उन्हें हर जगह सराहा भी जा रहा है तथा उनके लिखे पर वृहद् चर्चा भी होती है। यही नहीं, वे अपनी पहचान वैश्विक स्तर पर भी बनाने में कामयाब हो रही हैं; क्योंकि इंटरनेट के जरिए उनका लिखा दुनिया भर में पढ़ा जा रहा है। अपने स्वयं के ब्लॉग बनाकर तो वे लिख ही रही हैं, विभिन्न वेब पत्रिकाओं में उनकी  बढ़ती उपस्थिति इस बात का प्रमाण हैं कि घर परिवार, रसोई और बच्चों को बखूबी सम्भालने के साथ साथ उनकी लेखनी और अधिक धारदार होती जा रही है।
सबसे बड़ी बात है कि उनके लेखन का दायरा किसी एक क्षेत्र में सिमटा हुआ नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में तो उन्होंने अपने आप को साबित कर दिखाया ही है, अन्य विधाओं में भी उनकी लेखनी बखूबी सराही जा रही है। उनका लेखन जिसे कभी स्वान्त: सुखाय कहकर नकार दिया जाता था, आज उनको रेखांकित किया जाता है। पिछले दिनों एक बहस सी छिड़ गई थी कि महिलाएँ जो लिख रही हैं उससे भारतीय समाज को हमारी संस्कृति को कोई लाभ नहीं पहुँ रहा है। ऐसा कहने वाले कहीं न कहीं कुंठा से ग्रसित या भयभीत नजर आते हैं, जबकि सत्य बात यह है कि अपने लेखन के माध्यम से स्त्री जड़ हो चुकी परम्पराओं, रूढ़-मान्यताओं के दायरे से बाहर निकलकर नए जागरूक दौर में शामिल होकर कदम से कदम मिला कर चल रही हैं और सामाजिक बदलाव में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
लेखन को पुरु और महिला के दायरे में बाँटकर देखना सही नहीं है ,पर जब एक महिला कुछ हटकर रचती है ; तो ध्यान आकर्षित करती है, शायद इसलिए कि अरे एक महिला ने ऐसा, इस विषय पर लिखा! लेकिन यह भी सही है कि ऐसा हर दौर में होता रहा है और होता रहेगा। हमें इन्हीं चुनौतियों का सामना करते हुए ही तो आगे बढ़ना है, सशक्त बनना है।

उदंती में समय-समय पर किसी एक विषय को केन्द्र में रख अंक प्रकाशित किया जाता है। इसी क्रम में इस बार यह अंक महिला रचनाकारों पर केन्द्रित है। विश्वास है पाठकों को यह अंक भी पसंद आगा। 

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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