July 18, 2016

जीवन शैली/ ग़ज़ल/ कविता

                ऐसी होती है माँ 
                                 - अनिता ललित
माँ- नारी का सबसे ख़ूबसूरत व वंदनीय रूप! माँ शब्द में ही ऊँचाई और गहराई दोनों का आभास एक साथ होता है। उसका हर बोल मंत्रोच्चारण होता है और उसकी हर बात में जीवन-सार छिपा होता है! उसकी बोली से शहद टपकता है व आँखों से ममता का सागर छलकता रहता है। माँ केवल देना जानती है। वह किसी काम के लिए नानहीं कहतीवह कभी थकती नहीं। सवेरे सबसे पहले उठती है और रात में सबके बाद सोती है। उसके चेहरे पर कभी थकान नहीं दिखती। सबको अपनी चीज़ सही ठिकाने पर मिलती मगर माँ कभी एक जगह पर बैठी नहीं दिखती। कोमलतम भावनाओं से लिपटी माँ के सामने कड़ी से कड़ी, बड़ी से बड़ी, कठिन से कठिन समस्या भी अपना अस्तित्व खो देती है-माँ के पास हर मुश्किल की चाभी होती है। कपड़ों की सीवन में वह चुपचाप अपने ज़ख्मों को भी सी देती है, अपने आँसुओं के लेप से दिलों में पड़ी दरारों को भर देती है।
 बच्चे के कोख़ में आने के साथ ही माँ उसकी सुरक्षा में जुट जाती है। बच्चों की देखभाल करना माँ का काम नहीं वरन् उसका स्वभाव होता है। बच्चों को क्या चाहिए यह बच्चों से पहले उसको पता चल जाता है। बच्चे अगर कष्ट में हों या बीमार हों, तो माँ को चैन नहीं आता, रातों को जाग-जागकर वह उनकी देखभाल करती है। भयंकर तूफ़ान हो या कड़ी धूप, माँ का आँचल बच्चों को अपने साये में सुरक्षित रखता है, उन्हें सुक़ून देता है। सबके ताने सुनती है, मगर बच्चों के लालन-पालन में कोई कोताही नहीं बरतती, कोई समझौता नहीं करती।
सालों-साल गुजऱ जाते हैं, माँ सोती नहीं! बच्चों को पालने-पोसने में वह ख़ुद को भूल जाती है। फिर अचानक एक दिन उसे महसूस होता है कि उसकी चाल धीमी हो गयी है, घुटने दुखने लगे हैं, वह अक्सर चीज़ें रखकर भूलने लगी है, जल्दी थकने भी लगी है, और उसे महसूस होता है कि नींद उसकी आँखों का पता ही भूल चुकी है। बुनाई-कढ़ाई करते समय अब वह सुई में धागे से और गिरे हुए फंदे से काफी देर तक जूझती रहती है। वह आवाा से कम और हाव-भाव से बातें समझने की कोशिश करने लगी है और उसकी प्रतिक्रिया भी धीमी पड़ने लगी है। तब वह देखती है कि उसके चेहरे पर उभरी लकीरों के नीचे दबे हुए पिछले कई वर्ष अपनी कहानी कहने लगे हैं, और पाती है, कि उसके बच्चों का कद अब उसके आँचल से बड़ा होने लगा है। उसके बच्चे अब उसके पास ज़्यादा देर तक नहीं रुकना चाहते, ज़िन्दगी की रेस में दौड़ते हुए उनके क़दमों के पास इतना वक़्त नहीं है कि वे उसके पास कुछ देर को ठहर सकें, उसकी बातों को सुन सकें, समझ सकें, उसकी छोटी-छोटी, सिमटी हुई ख्वाहिशों को पूरा कर सकें। अपने कोमल कन्धों और एक पैर से फिरकी की तरह नाचते हुए, पूरे परिवार की इच्छाओं को पूरा करने वाली माँ अब आत्मग्लानि से भर उठती है ! बच्चों के आँसू पोछने वाली, उनका मनोबल बढ़ाने वाली माँ अब बात-बात पर बच्चों के सामने अपनी बेबसी पर रो पड़ती है। फिर भी वह ढलती उम्र से उपजी अपनी अस्वथता को अपनी कमी समझकर उसी को कोसती है अपने बच्चों की स्वार्थपरता को नहीं! माँ ऐसी ही होती है !

          माँ तो हल्दी चंदन
             
बातें उसकी फूलों जैसीदिल ममता का आँगन है।
हर दर्द की दवा वो मीठीमाँ तो हल्दी-चंदन है।
स्वर्ग ज़मीं पर उतराऐसा माँ का रूप सलोना है
सजदे में झुक जाए ख़ुदा भीमाँ की बोली वंदन है।
माँ की बातें सीधी-सादीचाहत उसकी भोली है
घर-बच्चों की हर ख़्वाहिश परकरती कुर्बां जीवन है।
अपने आँचल को फैलाकरजीवन को महकाती है
शोलों पर वो चलती रहतीआँखों में भर सावन है।
उसके सपनों की लाली सेखिला सुबह का सूरज है
साँझ ढले क्यों भूली हँसनाक्यों खोया-खोया मन है ?
ढलती उम्र सुनाती क़िस्सेमाँ की पेशानी पर है
पपड़ी से झरते रिश्तेबचती यादों की सीलन है।
कि़स्मत वाला वो दर होगा, जिस घर माँ खुश रहती है
नूर ख़ुदा का उस पर बरसेवो पावन वृन्दावन है।


नारी एक नदी सी 
शांतनिर्मल
कभी चंचल-शोख मचलती,
अपनी दुनिया में मगन
किनारों संग वो बहती जाती!
जो भी उसके अंदर झाँके
झलक उसी की अपना लेती!
इसी तरह सेसब को अपने
दिल में वो बसाए रहती!
कोई कंकर फेंके उसमें,
कोई फेंके अपना मैल,
देवीदेवता सबको ही वो
अपने अंतर में समाती!
सूरज की भीषण गर्मी सहती
उसमें खुद को वो जलाती!
डर कर जब ये सूरज छिपता-
बादल का तांडव भी सहती!
दुनिया वाले जब जी चाहे
उसका रस्ता काटा करते।
तब भी वो खामोश रह कर
उनकी मनमर्ज़ी निभाती!
अपने खूँ से सींचे जाती
जीवन को जीवन’ वो देती,
लेकिन बदले में वो इसके
क़तरा-क़तरा तरसा करती!
दिल के अंदर लहरें उठतीं,
बहलाए वो भी ना बहलतीं !
चाँद गगन में जब मुस्काता
वो भीतर ही भीतर रोती!
आख़िर कब तक गुमसुम हो कर,
अपनी चुप्पी में वो खोती
दे-देकर इम्तेहाँ सब्र का
भरती जातीभरती जाती !
इक पल फिरऐसा भी आता,
अपना रौद्र रूप दिखाती!
बूँद- बूँद जो सहा था उसने,
दर्द का लावा छलका जाती!
नहीं देखती तब वो कुछ भी,
अपना या पराया कौन,
जो भी उसके आड़े आता,
तहस-नहस वो करती जाती!
दिल में उठती लहरों में वो,
अपना शक्ति-रूप धारती ,
तोड़के सारे बाँध वो बहती,
अपनी मंज़िल खुद तय करती!
नियति नदी कीसागर से मिलना,
उसको कोई रोक ना पाए
अपनी सारी कड़वाहट ले
उसमें खुद को जा मिटाती!
सागर का तो दंभ अनोखा,
खुद को समझे भाग्य-विधाता,
बिन नदी जीवन अधूरा,
उसका तो अस्तित्व ही झूठा!
रौद्र-रूप में छिपे दर्द से
सागर भी ना बच पाता,
मिटती नदीपर शाप से अपने
सागर को खारा जाती।

सम्पर्क·: 1/16 विवे· खंड, गोमतीनगर, लखनऊ- 226010, anita.atgrace@gmail.com

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