July 18, 2016

बच्चों का कोना

             चम्बल नदी 
                               - डॉ. अर्पिता अग्रवाल
मध्य भारत में चंबल नदी यमुना की प्रमुख सहायिका नदी है। इसकी लम्बाई 960 किलोमीटर है। चंबल मालवा पठार की महत्त्वपूर्ण नदी है। विंध्याचल की श्रेणियों में मध्यप्रदेश के  इंदौर जिले के महू के दक्षिण में 854 मीटर ( लगभग 2800 फ़ीट ) की ऊँचाई से चंबल का उद्गम होता है। अपने उद्गम से उत्तर की ओर आगे बढ़ते  हुए यह मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध जिलों धार, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर से गुजरते हुए राजस्थान में प्रवेश करती है। कोटा शहर से आगे यह उत्तर- पूर्व की ओर मुड़ जाती है। चम्बल करीब 320 किलोमीटर तक मघ्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा बनाती है। उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हुई चंबल मालवा के पठार से निकली काली- सिंध व अन्य सहायिकाओं का जल समेटती हुई मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा बनाती है। उत्तरप्रदेश में प्रवेश कर चंबल नदी पूर्व को मुड़ कर यमुना के समानांतर बहती है। इटावा के पास चंबल यमुना में मिल जाती है। चंबल नदी को अरावली श्रेणी से निकलने वाली बनास नदी अरावली के जल से समृद्ध करती है। चंबल कई प्रसिद्ध जिलों जैसे बूंदी, सवाई माधोपुर, और धौलपुर से भी गुजरती है।
चंबल का असली नाम 'चर्मण्वती है। यह वैदिक काल की नदी है। चर्मण्वती पारियात्र पर्वत से निकली भारतवर्ष की एक नदी है, जो पितरों को प्रिय है। प्रसिद्ध राजा रन्तिदेव इसी के किनारे राज करते थे। वे बड़े धर्मात्मा और दानी थे। महाभारत और पुराण उनके यश के गीतों से भरे पड़े हैं। उन्होंने अनेक यज्ञ किए थे। यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती थी। कहा जाता है कि पशुओं के चमड़े सुखाने के लिए नदी के किनारे डाले जाते थे ; इसलिए इसका नाम चर्मण्वती हुआ।
 चम्बल नदी अपनी विस्तृत बीहड़ भूमि और खड्डों के लिए प्रसिद्ध है, जो निचली चम्बल घाटी में नदी द्वारा निर्मित होते हैं। यह बीहड़ डकैतों से ग्रस्त व आशंकित रहते थे। यह डकैतों के पनाहगार थे। चम्बल के डाकू प्रसिद्ध हैं। अब इस क्षेत्र को कृषि, चारागाह तथा सामाजिक- वानिकी के उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है।
चम्बल नदी पर कई बाँध तथा बराज बनाकर सिंचाई और जल विद्युत योजनाओं का विकास किया गया है, जिनमें गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर, तथा कोटा बराज सुप्रसिद्ध हैं। चम्बल के किनारे धौलपुर में राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य है। यहाँ कई तरह के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। यहाँ डॅाल्फि न भी पायी जाती है, इसे गांगेय डॅाल्फ़िन कहते हैं। गंगा नदी में पायी जाने वाली यह डॅाल्फ़िन पानी की गुणवत्ता की सूचक है। प्रदूषित पानी में यह जीवित नहीं रह पाती। यह अभ्यारण्य घड़ियालों की भी शरणस्थली है और पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों की दृश्यस्थली है।
मध्यप्रदेश में मंदसौर जिले में चम्बल नदी पर बनाया गया गाँधी सागर बाँ महात्मा गाँधी जी की स्मृति में बनाया गया था। चम्बल नदी का अपार जल इस बाँध के निर्माण से पहले बिना किसी उपयोग के ही बह जाता था। इसे चम्बल परियोजना के प्रथम बाँध होने का गौरव प्राप्त है। इस बाँध का लाभ मध्यप्रदेश और राजस्थान को मिला है । राजस्थान में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में चम्बल नदी सिंचाई परियोजना द्वारा पानी पहुँचाया जाता है। गाँधी सागर बाँध मछली पालन, मनोरंजन तथा पर्यटन के लिए भी महत्त्वपूर्ण स्थल है।
चम्बल नदी को प्रदूषण मुक्त माना जाता था;लेकिन कुछ स्थानों पर चम्बल नदी के अंदर व किनारों पर लगे ईंट- भट्टों तथा नदी के किनारों पर मिट्टी के अवैध उत्खनन से चम्बल नदी प्रदूषित हो रही है। चम्बल राजस्थान के कोटा शहर से गुजऱती है जहाँ इसमें औद्योगिक अपशिष्ट, बिजली घरों से निकली राख, और कूड़ा -कचरा आदि विभिन्न नालों के माध्यम से गिरा दिया जाता है। कोटा शहर औद्योगिक और शैक्षणिक संस्थाओं का केन्द्र है; जहाँ चम्बल नदी उस शहर को पीने के लिए, घरेलू इस्तेमाल व उद्योगों के और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराती है, वहीं शहर का निरंतर बढ़ता हुआ कचरा इसमें ही डाल दिया जाता है। इस कारण नदी में जीव-जन्तुओं के मरने की घटनाएं भी होती रहती हैं और नदी में प्रदूषण की मात्रा भी निरंतर बढ़ती जा रही है।
प्रकृति ने हमें शस्य -श्यामला धरती दी,नदियाँ दीं, शुद्ध वायु दी हमने उसके लिए कुछ भी तो खर्च नहीं किया। हमने बदले में प्रकृति को बहुत दु:ख पहुँचाया, उसे नष्ट किया फिर भी प्रकृति हमें दे रही है लेकिन कब तक प्रकृति हमें यूँ ही देती रहेगी? आज हमने जल, थल, वायु सभी को प्रदूषित कर दिया है और अब भी हम नहीं सुधरे तो प्रकृति का दंड भोगने को तैयार रहना होगा।सम्पर्क: 120 बी/2, साकेत , मेरठ 250003

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