July 20, 2015

अनकही

छत्तीसगढ़ का लोक मंच
- डॉ. रत्ना वर्मा
जैसे-जैसे सभ्यता विकसित होती चली जाती है वैसे वैसे हमारे जीने के तरीके में भी बदलाव आने लगते  हैं। हमारी परम्परा हमारी संस्कृति हमारे रीति- रिवाज में हर काल में कुछ न कुछ जुड़ता चला जाता है , तो कुछ न कुछ खत्म भी होते चला जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो लोक जीवन की रीत यही है- जहाँ नित परिर्वतन होते रहते हैं। समय और जरूरत के अनुसार वे अपनी जीवन जीने के तरीके में बदलाव करते चले जाते हैं। लोक संस्कृति किसी भी समाज को समझने में सहायक होती हैं। उदंती के इस अंक में हम छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के एक ऐसे पक्ष के बारे में चर्चा करने की कोशिश कर रहे हैं जो समय के प्रवाह के साथ शनै शनै: विलुप्त होने की कगार पर है। 
भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंक उसकी लोक कलाएँ हैं, जिनका हमारे लोकजीवन में विशेष स्थान है।   शास्त्रों में जिन 64 कलाओं का उल्लेख किया गया है उसमें गायन, वादननर्तन, और नाट्य जैसी अनेक कला- कौशल का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है।  भारतीय परंपरा के अनुसार कला उन सारी क्रियाओं को कहते हैं ,जिनमें कौशल अपेक्षित हो। यूरोपियन शास्त्रियों ने भी कला में कौशल को महत्त्वपूर्ण माना है। कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है ,जिसमे शारीरिक और मानसिक कौशलों का प्रयोग होता है।
भारत के हर प्रदेश में कला की अपनी एक विशेष शैली और पद्धति होती है ,जिसे लोककला के नाम से जाना जाता है। लोककला के अलावा भी परम्परागत कला का एक अन्य रूप है जो अलग-अलग जनजातियों और देहात के लोगों में प्रचलित है। इसे जनजातीय कला के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत की लोक और जनजातीय कलाएँ बहुत ही पारम्परिक और साधारण होने पर भी इतनी सजीव और प्रभावशाली हैं कि उनसे देश की समृद्ध विरासत का अनुमान स्वत: हो जाता है। लेकिन यह भी सत्य है कि विरासत को पा लेना जितना आसान होता है, उतना उसे सहेज कर रख पाना बहुत मुश्किल होता है।
विज्ञान ने हमें तरक्की करना तो सिखाया है पर तरक्की करते करते हम अपनी लोक कलाओं से दूर होते चले जा रहे हैं । हमारी सुविधा के लिए बनी मशीनों ने मनुष्य को ही मशीन बना दिया।  अब हमारे पास अपनी उस भव्य विरासत, समृद्ध लोक-कलाओं को जिंदा रखने के लिए न समय है न सदिच्छा। और जब जीवन से लोक कलाएँ तिरोहित होती जाती हैं , तो इंसान के जीवन से इंसानियत खत्म होती चली जाती है। आज जहाँ देखो उधर मनुष्य अपनी आर्थिक समृद्धि में ही खटते नजर आता है, उसके लिए लोक कलाओं के लिए समय निकालना समय की बर्बादी है, जबकि कला वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि-  कला की साधना से हमारी कल्पनाशीलता का विकास होता है, लोक कलाएँ हमारे लिए मनोरंजन मात्र नहीं वरन, हमें व्यवस्थित ढंग से जीने के उपाय सिखाती है।  हम आज जीवन जीने के इस तरीके को भूलते जा रहे हैं जो चिंता का विषय है।
यदि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की बात करें तो यहाँ की लोककलाएँ  बहुत विकसित रहीं हैं, जिसे समय-समय पर यहाँ के महान कला-धर्मियों ने सहेजा और विकसित किया है। प्राचीन काल में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन विकसित नहीं हुए थे तब छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भी नृत्य, गीत नाचा, गम्मतमेले- मड़ई, रामलीला, कृष्णलीला आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन हुआ करते थे।  इस तरह छत्तीसगढ़ की लोककलाओं के अध्ययन से इस प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति के बारे में भी हम अनुमान लगा सकते हैं।
कला के संदर्भ में किसी ने बहुत सुंदर बात कही है कि - कला से जुडऩे का अर्थ है- स्वयं के व्यक्तित्व का विकास, ऐसा विकास जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन सके और सहज मनोरंजन का साधन भी।
उदंती का यह विशेष लोक- अंक रामहृदय तिवारी जी के रचनात्मक सहयोग से तैयार हो पाया है, जिनका संक्षिप्त परिचय नीचे दिया गया है, मैं उनकी आभारी हूँ। साथ ही छत्तीसगढ़ की लोककला और संस्कृति पर निरंतर लिखने वाले रचनाकारों में संजीव तिवारी जो छत्तीसगढ़ी भाषा की पहली वेब पत्रिका गुरतुर गोठ के संपादक हैं, उनके ब्लाग आरंभ से भी रचनात्मक सहयोग लिया गया है। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय श्यामलाल चतुर्वेदी जी का एक आलेख भी इसमें शामिल है। इस अंक में शामिल सभी रचनाकारों  का भी आभार व्यक्त करती हूँ।

शुभकामनाओं के साथ 

1 Comment:

sushil yadav said...

आपने छत्तीसगढ़ की लोक विरासत की दशा और दिशा सुधारने में सार्थक पहल की है ।आपकी पत्रिका लोक कलाओ के संरक्षण के प्रति गंभीर और अग्रणी है इस दावे को झुठलाया नही जा सकता।
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

लेखकों से अनुरोध...

उदंती. com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी,कविता, गीत,गजल, व्यंग्य,निबंध,लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है।आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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