July 20, 2015

लोक-मंच विशेष

रहस का रहस्य
-श्यामलाल चतुर्वेदी 
भगवान की भक्ति को धूरी बनाकर संसार-चक्र में घूमते हुए भी अर्थ धर्म काम से अन्तत: मोक्ष पाने की अभिलाषा को पूर्ण करने का प्रयास धर्म प्राण भारत के मानव समाज में हम पाते हैं। सांसारिक भौतिकता के भंवर जाल से बचाने के लिए, व्यष्टि को समष्टिगत संस्कार से संस्कारित कराने में संलग्र मनीषियों ने, रमता जोगी बनकर भक्ति भावना को न केवल व्यापकता प्रदान की बल्कि उसे सर्व सुलभ बनाने के लिए नवधा भक्ति के रूप में व्याख्यायित किया ताकि लोग उसके किसी एक मार्ग का अवलम्बन करके भक्ति भाव से जुड़े रह सकें।
श्रवणं कीर्तनं विष्णों, स्वरणं पाद सेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं, सख्य मात्म निवेदनम्।।
इनमें कीर्तन अधिक लोकप्रिय हुआ क्योंकि गायन वादन और नर्तन तीनों का समावेश होने से भागीदारी का क्षेत्र विस्तृत बनता है। गा, बजा और नाचकर जुडऩे के साथ ही श्रवण करके भी हिस्सेदार बनने की गुंजाइश बनती है उनके अन्य आकर्षणों के कारण कीर्तन की व्यापकता सर्वत्र देखने को मिलती है।
भगवान के नाना रूपों  में राम और कृष्ण, नर लीला करने के करण जन-मन में ज्यादा जमे फलस्वरूप इनकी भक्ति के अनेक उपक्रम उपजते गये। मंदिर बने किन्तु आराधना के माध्यम तो कीर्तन ही रहे। कुछ आगे बढक़र उनकी लीलाओं का अभिनय भी आरंभ हो गया। राम लीला रास लीला रहस आदि तत्सम रूप सभी कीर्तन के ही परिवार से प्रकटे हैं।
कीर्तन अत्यन्त प्राचीन है। श्रीमद्भागवत माहात्म्य में इसकी उत्पत्ति का प्रमाण मिलता है। वर्णित अंशों को पढक़र मिलान कीजिए उस स्वरूप को न्यूनाधिक यथावत् रखने में महासंकीर्तन (रहस का कितना प्रामाणिक योगदान है। श्री मद्भागवत महात्म्य के 6 वें अध्याय का संदर्भित अंश-
एवं बृवाणे सति वादरायणां, मध्य समायां हरि राविरासीत्।
प्रहलाद वल्युदव फाल्गुनादिभि:, वृत्ति सुरर्षिस्तम् पूजयञ्च तान्।।
शुकदेव जी कह हि रहे थे कि सभा के बीच प्रहलाद, उद्वव, अर्जुन, बली आदि पार्षदों सहित भगवान प्रकट हो गये तब देवर्षि नारद ने भगवान की तथा उनके भक्तों की यथोचित पूजा की।
दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं ते चक्रिरे कीर्तन मग्र तस्तदा।
भवो भवान्यां कमलासनस्तु तत्रा गमत्कीर्तन दर्शनाय।।
भगवान को प्रसन्न देखकर नारद जी ने उन्हें सिंहासन पर बैठाया और सब लोग भगवान के सामने कीर्तन करने लगे। उस कीर्तन को देखने के लिए पार्वती जी के सहित शिवजी तथा ब्रह्माजी भी आये।
प्रहलाद स्ताल धारी तरल गति तथा योद्धव: कांस्य धारी।
वीणाधारी सुरर्षि: स्वर कुशल तया, राग कर्ताऽर्जुनो भूत।।
इन्द्रो वादिन्मृदंग जय जय सुकरा: कीर्तन ते कुमारा:।
यत्राग्रे भाव वक्ता सरल रचनया, व्यास पुत्रो वभूव।।
उस महासंकीर्तन में प्रहलाद जी दु्रतगति से ताल वाद्य बजा रहे थे और उद्धव जी मंजीरा तथा नारद जी वीणा वादन कर रहे थे। उत्तम स्वर ज्ञाता अर्जुन राग आरंभ करते इन्द्र सनक सनन्दन सनातन तथा सनत्कुमार राग को दुहराते तथा जय हो जय हो कहकर तालियाँ बजाते फिर गाये गये पद की व्याख्या सरस रचना एवं भाव प्रवणता के साथ श्री सुकदेव जी करने लगते।
ननर्तमध्ये त्रिकमेव तत्र, भक्त्यादि कानां नट वत्सु तेजसाम्।
अलौकिकं कीर्तनमेंत दीक्ष्य, हरि प्रसन्नोति वचोब्रवीत।।
उनके आगे भक्ति ज्ञान और वैराग्य नटो की भाँति नृत्य करते जा रहे थे। इस अलौकिक कीर्तन को देखकर भगवान हरि प्रसन्न होकर बोले:-
आप लोग वर माँगिये- तब कीर्तन कारी ने कहा कि जो भी सप्ताह पर्यन्त श्री कृष्ण लीला प्रधान इस तरह महाकीर्तन का अयोजन करें वहाँ आप इसी प्रकार प्रकट हो और उनके मनोरथों को पूर्ण करें। भगवान तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये।
यह आश्चर्य जनक तथ्य है कि उपयुक्त वर्णन से सभी सदस्य बिलासपुर जिले में वर्षो से प्रचलित रहँस में यथावत् विद्यमान है। वर्णित देवताओं की मूर्तियाँ बनाने, उन्हीं वाद्यों को बजाने उसी शैली में गाने और नाचने की परम्परा अभी भी कायम है।
भगवान के वर माँगने के लिए कहने पर कीर्तनकारों ने ऐसे आयोजनकर्ताओं के मनोरथी को पूर्ण किये जाने की याचना करके सर्वे सुखिन: सन्तु... का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। कई गाँवों में रहँस का आयोजन अभी भी किसी कामना के प्रत्यर्थ किया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कितनों की कामनाओं की पूर्ति होते रहने से ही तो ये फलद विश्वास अभी भी कायम है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले को सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक समृद्ध माना जाता है इस मान्यता की छाप तन मन में छोडऩे के पीछे संभव है रहँस जैसे आयोजनों की व्यापकता हो। इस अंचल में रहँस की लोकप्रियता का जीवन्त प्रमाण इससे मिलता है कि सवर्णो के आयोजनों से अत्यधिक प्रभावित होकर जिले के आबादी बहुल हरिजनों ने इसे अपना लिया। पूर्व में स्पृश्य भाव  के होते हुए भी हरिजनों ने देखकर सुनकर और कतिपय सहृदयों से कुछ पूछकर इस विधा को अत्यन्त आत्मीयता से अंगीकृत किया। एकलव्य की साधना का अनुमान हरिजनों द्वारा अपनाये गये रहस की शैली में हम पाते हैं। हरिजन मंडलियों में और उनके आयोजनों में रहस के प्रति श्रद्धा की भावना औरों से अधिक है। इस आयोजन में परिजनों को आमंत्रित करना आनन्द को अधिकाधिक लोगों में वितरित करने की भारतीय भावना का दिव्य दर्शन है। राष्ट्रकवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त ने कहा भी तो है (दुख घट जाता सुख बढ़ जाता जब वह है बँट जाता) अनपढ़ों द्वारा इसका आचरण आमतौर पर किया जाना सांस्कृतिक ऊँचाइयों का मानदंड है। छत्तीसगढ़ के जन जीवन में अतिथि सत्कार के सद्भाव को सहजता से स्वीकारने की सामूहिक संस्कार और कहाँ देखने को मिलता है। लगता है रहँस में भी इस संस्कार के रहस्यात्मक बीज निहित है जो कि अनजाने ही पीढिय़ों को पवित्र परिपाटी की जड़ी चढ़ाते-चढ़ाते पगडंडी को राजमार्ग विकसित करते अग्रण्य हो रहे है।
रहस की परम्परा बहुत प्राचीन होते हुए भी इसका प्रचलन अटूट बना रहा यह एक अलग विशद विषय है किन्तु वर्तमान स्वरूप को स्थापित करने में प्राचीन राजधानी रतनपुर के बहुभाषा विज्ञ कायस्थ कुलोढ़मव बाबू रेवाराम मील के पत्थर साबित हुए है। 
भोसलों के राजत्वकाल में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व राजाश्रय प्राप्त कविवर रेवाराम ने रहस की गुटका का सम्पादन किया। उनके गुटका के आधार पर रहँस की एक पद्धति प्रारंभ की, पदों को स्वर दिया। इस पद्धति का प्रचार भोंसलों के राज्य में व्यापक रूप से हुआ। कई बड़े-बूढ़ों से पता चला की अब से सत्तर अस्सी वर्ष पूर्व रहँस की मंडलियों के कर्ताधर्ता अब दिवंगत हो गये है किन्तु उनके कुछ शिष्ट गण अभी सीमित संख्या में ही सही, उनकी धरोहर की रक्षा कर रहे हैं, बहेरहा के लक्ष्मण पंडित 18 वर्ष की उम्र से 90 वर्ष की उम्र तक करीब साढ़े तीन सौ रहँस वे कर चुके हैं। उनके गुरु पांफा वाले स्व. पं. दुखूराम दुबे थे। लक्ष्मण पंडित रायगढ़ और रीवा तक रहस करने जाया करते थे। कुदुसदा के मिट्ठू पंडित भी रहँस किया करते है। देवरी वाले श्री नत्थुसिंह का नाम भी उल्लेखनीय है, सम्प्रति लकवा पीडि़त होने पर भी जहाँ कहीं रहस होने की जानकारी मिलती वे पहुँच जाया करते थे। चमुकवाँ वाले मालिकराम एवं मस्तराम, भटगाँव परसदा के श्री निर्मलकर का नाम भी चर्चित है। वर्तमान में श्री दादूसिंह गउद (जाँजगीर) की रहस मंडली बहुत प्रशंसित है। हरिजनों के रहस की भी कई मंडलियाँ है जिनमें नवापारा रतनपुर निवासी भूतपूर्व संसदसदस्य श्री गोंदिल प्रसाद अनुरागी, रानी गाँव के श्री ननका के सिवाय डाडग़ाँव की मंडली प्रसिद्ध है। जिले में व्यवस्थित और अस्त- व्यस्त कम से कम बीस मंडलियाँ अभी अस्तित्व में होना चाहिए।
मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद ने प्राचीन राजधानी रतनपुर के समीपस्थ रानीगाँव में रहँस का आयोजन किया इसकी प्रतिक्रिया प्रेरणाप्रद हुई है।
इस आयोजन ने रहस की अवनतौन्मुख लोकप्रियता को झकझौर कर पुर्नप्रतिष्ठित किये जाने के विचार को विस्तार दिया है। जन मानस में जो फिल्मी फैलाव तथा भक्ति भावना पर हो रहे, जाने और अनजाने प्रहार के परिणाम स्वरूप रहँस के प्रति आकर्षण में आ रही न्यूनता की नवोस्थायी दिशा देने में इस उपक्रम उपलब्धि मानी जायगी।
रहस को चिरकालीन लोक प्रियता का कारण उसका सहज स्वरूप है वह सबकी रुचि अनुरूप है। वण्र्य विषय सब रास के है लेकिन अभिव्यक्ति के आधार उनके अपने खास के है।
रहस के पात्र गायक वादक नर्तक सभी होते है स्थानीय या समीपवर्ती गाँव के रहने वाले सुर मीरा आदि पदावलियों के गायक कुछ पढ़े लिखे व्याज जी।
चिकारा वाद्य उसकी खासियत, जिसे सारंगी का लघु संस्करण समझिये। तमशहा या विदूषक है हास्य रस संचारी कौतुकी प्रदर्शन के साथ संवाद में प्रत्युत्पन्न मति का वैशिष्ट्य पचास वर्ष पूर्व तो रहस स्थल की प्रकाश व्यवस्था पंक्ति बद्ध सैकड़ों दीपकों से किया जाता रहा। गाँव के तेली की घानी से पैरे गये तिली के शुद्ध तेल की मीठी रोशनी। दो ढाई रुपये के तेल से रात भर प्रकाश का पर्याप्त प्रबंध।
पारी-पारी से व्यय वहन करने की विभाजित जिमेदारी सब कुछ उनका अपना सौहाद्र्र और सहकार का सुन्दर स्वरूप हुआ करता था।
शाम से ही रहस के बाहर तीनों दिशाओं में दर्शकों द्वारा स्थानों का आरक्षण। जिसका बोरा बिछ गया उसका वह स्थान-घर के बच्चों का स्वयं स्फूर्ति से स्पर्धा में किया जाने वाला जगह जमाने का काम। जो पहले पहुँचा चटाई, बारदाना या दरी बिछा दिया। सूर्यास्त होते ही चिडिय़ों को चहचहाहट के साथ बाल गोपालों का चिल्लमपों। बेड़ा से कुछ दूर पर खटिया मचौली में पान बिड़ी माचिस की एकाध दुकान, जहाँ कंडील या चिमनी की टिमटिमाहट। चना मूर्रा, लाडू, मूँगफली, भजिया का भी पसरा। पीने के पानी का संभव हुआ तो प्रबंध। रहस का ऐसा रहा करता था माहौल। विशाल जन समूह लेकिन कोलाहल की कोई समस्या नहीं। क्यों न हो? हर एक का अपना कार्यक्रम जो है।
परिषद के द्वारा अब तक किये गये प्रयास प्रशंसनीय है। भविष्य में रहस के मूल और सहज स्वरूप को सुधार या परिष्कार के अथवा ग्राम्य जीवन में पालित घोषित प्राकृतिक परिवेश को संक्षिप्तता के नाम पर कतर ब्यौत करने का विचार न लाते हुए जिस रूप में है उसी रूप में रहने देने, रखे जाने की सद्भावना को व्यापक बनाये जाने का प्रयास किया जाना लोक मंगलकारी उपक्रम होगा।
(नवम्बर 2003 में प्रकाशित श्यामलाल चतुर्वेदी की पुस्तक-मेरे निबंध से साभार) 

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