July 20, 2015

लोक-मंच विशेष

सोनहा बिहान के स्वप्नदर्शी 
दाऊ महासिंह चन्द्राकर
- रामहृदय तिवारी
याद आती है- 6 सितम्बर 1997 की, मतवारी में आयोजित सुर श्रद्धांजलि की वह शाम, गोधूलि बेला में गायों के गले की टुनटुनाती घंटियाँ, पक्षियों की चहचहाती बोलियाँ, मंदिर में शंख और झालर की ध्वनियाँ और इन्हीं सबके बीच भीगे लम्हों में गुजरती, बिसुरती अपनी बेबस जिन्दगी का पैगाम भेजा था उनके प्रेमी सुर साधकों ने, संगीत के सुरबइहे दिवंगत दाऊ महासिंह चन्द्राकर के नाम, एक पेड़ आमा, छत्तीस पेड़ जाम, सतरंगी ला मोला तें ओढ़ा दे रे दोस, एक मोरे हीरा, मुँहू पा परे घाम, सतरंगी ला मोला तें ओढ़ा दे रे दोस  तब लगा था- गीत गंगा मरुस्थलों में म्लान होकर रह गई, कोकिला की कंठ भी बेजान होकर रह गई, सिर्फ तुम ही क्या गए इस महफिल से, महफिल एक सूखी नदी सी वीरान होकर रह गई।
हम नहीं जानते लोक स्वर का साधक सूक्षम जगत में आज कहाँ हैं? वे तो निष्ठुरता के साथ अचानक ओझल हुए थे हमारी आँखों से। उन्होंने हमें वक्त ही नहीं दिया उनसे कुछ कह सकें। शायद वे नहीं जान सके कि हम उनसे कितना प्यार करते थे। आज भी  हमारे मन के कोने में बार-बार उनकी यहीं पंक्ति गूँजा करती है- विधि के इही विधान रे संगी, सुख-दुख दोनों मितान रे संगी।
सोनहा बिहान के स्वप्नदर्शी यह दाऊ महसिंह चन्द्राकर ही थे, जिन्होंने भोले छत्तीसगढ़ की पीरा को मंच पर साकार किया था। लोकरंजनी उन्हीं की गायी हुई अमर रागिनी थी। लोरिक चंदा उन्ही की सांस्कृतिक जय यात्रा का तूर्य नाद था, जिससे आज भी निनादित है, अंचल का सांस्कृतिक गगन, जिसके साक्षी हैं- आज भी यहाँ की हवाओं में तैरते छत्तीसगढ़ी गीत, संगीत, नृत्य और उनमें डूबे ऐसे बेशुमार लोग जो इस अंचल की लोककलाओं को जी-जान से प्यार करते हैं। आज जब भी लोक संगीत की महफिल सजती है, तब उस सर्र्जक लोक गायक की, बहुत याद आती है। याद आता है। उनका गाया सदाबाहार गीत-
कोने गुनह में सजा दिन्हें मोहन वो मोला, कोने गुनह में सजा दिन्हा जी। वे जो कभी लोक सांगीतिक महफिल की जान थे, साज और आवाज की शान थे, उनके बिना उनके घर विद्यमान वाद्यों के सदा निनादित रहने वाले स्वर, आज कितने खामोश कितने उदास और वीरान लगते हैं। समर्पण भवन आज भले अस्तित्त्व में न हो, मगर वहाँ के कलागत क्रियाकलापों की सुरमयी स्मृतियाँ हमारे मन मस्तिष्क में सदा के लिए अंकित हैं।
यही वह समर्पण भवन था, जहाँ पहली बार सन् 1975 में उनसे मेरी मुलाकात हुई थी, जहाँ केवल हमारे जैसे ही नहीं बल्कि निजामुद्दीन, दुर्गा भट्ट, जगन्नाथ भट्ट, कबीर साहब, लालू और मदन जैसे न जाने कितने उद्भट कला साधकों को स्नेह और सम्मान मिला करता था। जहाँ बारहों महीने दिन रात नया-नया सीखने और सिखाने वाले प्रेमपूर्वक पनाह पाया करते थे, समर्पण भवन, जिसने ममता, प्रमिला, दीपक लक्ष्मण, शैलजा, मिथिलेश, कुलेश्वर और माया, बसंती, पद्मा जैसे अनगिनत कलारत्नों को तराशा संवारा और उन्हें अनमोल रत्न बनाकर मंच पर पेश किया। तब समर्पण भवन ही नहीं उनके घर आँगन का प्रत्येक कोना, देहरी दरों दीवार और गलियाँ घुँघरु की रुनझुन और तबले की थाप से गुँजायमान थीं।
आज वे सारे स्वर मानों उन्हीं के साथ अनंत में विलीन होकर हमारे लिये केवल स्मृतियाँ बनकर रह गये हैं। लोकस्वर के वे बावले सर्जक शायद हमसे रुठकर बहुत दूर चले गये हैं, हम उन्हें ऐन वक्त पर अलविदा भी न कह सके, पर हमारे अहसासों से, हमारी यादों से वे दूर भला कैसे हो सकते हैं? वे सशरीर हमारे बीच न सही मगर हमारे दिलों में हमेशा समाये रहेंगे। आज हमारे लिये प्रेरक अवशेष हैं- लोक संगीत के लिये उनका दीवानापन, कलाओं के लिये उनका आजीवन समर्पण और अंचल की माटी के लिये कुछ भी कर गुजरने की उनकी अटूट लगन। उनके रोम-रोम से छत्तीसगढ़ बोलता था, उनकी साँस-साँस में छत्तीसगढ़ धडक़ता था। उस सच्चे छत्तीसगढ़ी सपूत और सांस्कृतिक स्वाभिमानी की सीख, समर्पण और लगन, उनसे जुड़े कलाकारों की पूँजी और प्रणम्य धरोहर है।
सच कहा जाये तो महासिंह चन्द्रकर व्यक्ति का नहीं, एक तपस्या का नाम था। लोक मंचीय कलाओं के लिये दिन रात लगे रहने वाले इस महान साधक का देहावसान एक साँस्कृतिक कालखंड का अवसान था। उनके जीवन के व्याकुल क्षणों में जन्मी उनकी तमाम कलागत सर्जनाओं ने उनसे बड़ी-बड़ी कीमतें वसूल कीं। सम्पन्न घर में जन्म लेने के बावजूद उनका सांस्कृतिक सफर सुगम कभी नहीं रहा। पग-पग पर अनगिनत बाधायेंपिताश्री और परिजन का प्रबल प्रतिरोध, फिर भी वे न कभी विचलित हुए न अपना साधन पथ बदला। जीवन भर, यहाँ तक कि गंभीर अस्वस्थता और वार्धक्य की विवशता के बावजूद सांस्कृतिक मशाल को जलाये अपने हाथों में थामे रहे। यह विलक्षण जीवटपन दाऊजी के व्यक्तित्व की खास पहचान थी, जिसकी मिसाल अंचल के सांस्कृतिक इतिहास में दाऊ, रामचन्द्र देशमुख और मदराजी दाऊ के अलावा दुर्लभ है। भट भेरा साज के गर्भ से जन्में सोनहा बिहान की सांस्कृतिक सुरसरिता के विभिन्न पड़ावों के रुप में गीतांजलि, लोक-रंजनी, फिर लोरिक चंदा का अविरल प्रवाह महासिंह दाऊ की उद्दाम कलानिष्ठा, साधना और समर्पण का अनूठा प्रमाण का प्राण मानने वाले महासिंह जी यह मानते थे कि कला की कोई सीमा नहीं होती, न ही उसे सीखने में उम्र या हैसियत आड़े आनी चाहिये। वे जिज्ञासु भाव से नित्य नई चीजें गुणी लोगों से स्वयं सीखते रहे, साथ ही युवा पीढ़ी को पूरी तल्लीनता के साथ सिखाते भी रहे। लोरिक चंदा का निर्देशन भार सौंपने के साथ कई सीख उन्होंने मुझे भी दी थी। इस प्रोजेक्ट के लिए गड़हा ददरिया उन्होंने स्वयं गाकर जब सुनाया था, मेरी आँखें भीग गयी थीं। कलाकारों के प्रति उनकी  सदाशयता और उदारता अंत तक बनी रही। मैं स्वयं उनसे मिले स्नेह और सम्मान को भूल नहीं पाता हूँ।
यूँ तो इस दुनिया से सबको एक न एक दिन रुखसत होना ही है, मगर ऐसी अंतिम बिदाई और दशगात्र पर दी गई स्वर श्रद्धांजलि जो मैने देखी और सुनी, बिरले को ही नसीब होती है, शायद ऐसे ही किन्हीं क्षणों में नीरज के दिल से ये पंक्तियाँ निकली होंगी:
अब न वो दर्द, न वो दिलन वो दीवाने रहे,
अब न वो सोज, न साज न वो गाने रहे,
साकी, तू अब भी यहाँकिसके लिये बैठा है?

अब न वो जाम, न वो मयन वो पैमाने रहे।

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