May 16, 2014

प्रसिद्ध बाल कविताएँ

कोकिल

महावीर प्रसाद द्विवेदी

कोकिल अति सुदर चिडिय़ा है,
सच कहते हैं अति बढिय़ा है।
जिस रगत के कुवर कन्हाई,
उसने भी वह रंगत पाई।
बौरों की सुगध की भाती,
कुहू-कुहू यह सब दिन गाती।
मन प्रसन्न होता है सुनकर,
इसके मीठे बोल मनोहर।
मीठी तान कान में ऐसे,
आती है वशीधुनि जैसे।
सिर ऊँचा कर मुख खोलै है,
कैसी मृदु बानी बोलै है!
इसमें एक और गुण भाई,
जिससे यह सबके मन भाई।
यह खेतों के कीड़े सारे,
खा जाती है बिना बिचारे।

चाँद एक दिन
रामधारी सिंह 'दिनकर
हठ कर बैठा चाँद  एक दिनमाता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का
बच्चे की सुन बातकहा माता ने-'अरे सलोने’
कुशल करे भगवानलगे मत तुझको जादू टोने
जाड़े की तो बात ठीक हैपर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौड़ाकभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता हैऔर किसी दिन छोटा
घटता-बढ़ता रोजकिसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है
अब तू ही ये बतानाप तेरी किस रोज लिवायें                  
सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये!


खिलौनेवाला...

सुभद्राकुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुडिय़ा भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा टी-सेट है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
 मुन्नू ने गुडिय़ा ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोताबिल्लीमोटररेल
पर माँयह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जाकिसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगेअसुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँबिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसेरूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चींज़े देगा।


कोशिश करने वालों की...

सोहनलाल द्विवेदी
लहरों से डर कर
नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब            
दाना लेकर चलती है,    
चढ़ती दीवारों पर,          
सौ बार फिसलती है।  
     
मन का विश्वास
रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना,
गिरकर चढऩा
न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत
बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
डुबकियाँ सिंधु में
गोताखोर लगाता है,
जा-जा कर खाली हाथ
लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही
मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह
इसी हैरानी में.....।
मुट्ठी उसकी खाली
हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है,
इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई,
देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो,
नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर
मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही
जय -जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की
कभी हार नहीं होती।

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