January 18, 2013

विज्ञान



गॉड पार्टिकल का साल
 -चक्रेश जैन

मानव जीनोम और हिग्ज़ बोसान रिसर्च को वर्ष 2012 की विज्ञान जगत की अति महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों मे शुमार किया जा सकता है। दुनिया की 32 प्रयोगशालाओं के 400 जीव विज्ञानियों ने यानी एनसाइक्लोपीडिया ऑफ डीएनए एलिमेंटस ('एनकोड’) महाशोध परियोजना के माध्यम से यह साबित कर दिया कि 'जंक डीएनएनिष्क्रिय नहीं है। सरल भाषा में कहें तो 'जंक डीएनएउस स्विच का काम करते हैं, जिससे प्रत्येक जीन की क्रिया चालू- बंद होती है। भावी शोध में इस स्विच की कार्यप्रणाली पर रोशनी डाली जाएगी। यह परियोजना वर्ष 2003 में मानव जीनोम के प्रत्येक अवयव की भूमिका खोजने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
वर्ष के उत्तरार्द्ध में विज्ञान की शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वनस्पतिविदों ने पहली बार केले के डीएनए का अनुक्रमण पूरा कर लिया। केला पहला गैर-घासीय एकबीजपत्री पौधा है, जिसके 36,000 जीन्स वाले जीनोम का अनुक्रमण किया गया है।
डीएनए अणु पूरे साल सुर्खियों में रहा। यह वही अणु है, जिसने एन.डी. तिवारी का पितृत्व विवाद सुलझाने में अहम भूमिका निभाई और डीएनए छाप से सिद्ध हो गया कि रोहित शेखर के जैविक पिता एन.डी. तिवारी ही हैं।
इस वर्ष 4 जुलाई को जिनेवा स्थित सर्न प्रयोगशाला में एक प्रेस कांफ़्रेंस में हिग्ज़ बोसान कण खोजे जाने की विधिवत् घोषणा की गई। इस कण को लोकप्रिय भाषा में 'गॉड पार्टिकलभी कहा जाता है। वास्तव में हिग्ज़ बोसान के साथ गॉड पार्टिकल नाम जुडऩे से हमारी जिज्ञासा बढ़ गई है। भौतिक शास्त्री तथा नोबेल विजेता लियोन लेडरमैन इस कण को 'गॉडडैम पार्टिकल’ (अभिशप्त कण) नाम देना चाहते थे, क्योंकि यह आज भी रहस्यपूर्ण है। उन्होंने बाद में इस विषय पर एक किताब लिखी और प्रकाशाक की इच्छा के अनुसार इसे 'गॉड पार्टिकलशीर्षक दे दिया।
इस कण का ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है। बीते वर्षों में इस महाप्रयोग ने ब्राहृांड सम्बंधी हमारी समझ को समृद्ध किया है और पार्टिकल फिजि़क्स को ठोस आधार दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिग्ज़ बोसोन रिसर्च से भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटिंग और चिकित्सा के क्षेत्र में नई सँभावनाओं का मार्ग प्रशास्त होगा।
इसी वर्ष 6 जून को शुक्र ग्रह ने सूर्य का हाल-चाल जाना और आगे बढ़ गया। इसे विज्ञान की भाषा में शुक्र पारगमन कहा जाता है। प्रकृति के इस विलक्षण नज़ारे को लाखों लोगों ने जी भरकर देखा। अब यह खगोलीय घटना 105 वर्ष बाद देखी जा सकेगी। वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से शुक्र पारगमन का अपना महत्त्व है। इस दौरान शुक्र और पृथ्वी के बीच की निश्चित दूरी ज्ञात करने और अन्य तारों की चमक के अध्ययन का मौका मिला।
बीते वर्ष मंगल ग्रह पर जीवन की संभावनाओं की पड़ताल जारी रही। 6 अगस्त को नासा का क्यूरिऑसिटी यान मंगल की सतह पर उतरा। मंगल की मिट्टी से प्राप्त कार्बनिक यौगिकों की पहचान से शोधार्थी उत्साहित हैं। इस वर्ष भारत ने मंगल ग्रह की जानकारियाँ जुटाने के लिए अपने मंगल ऑर्बाइटर अभियान को मंजूरी प्रदान कर दी। इसके लिए 450 करोड़ रुपए का प्रावधान है।
विदा ले चुके साल में चीन के अंतरिक्ष विज्ञान कार्यक्रम में नए अध्याय जुड़े। चीन की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री लिउ यांग तेरह दिनों की यात्रा के बाद 29 जून को पृथ्वी पर लौटीं। वर्ष के उत्तरार्द्ध में चीन को अंतरिक्ष में सब्ज़ियाँ उगाने में बड़ी सफलता मिली। भविष्य में मानव सहित अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए इस प्रयोग का महत्त्व है। गुज़रे साल भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में चार महीनों तक अभिनव और रोमांचक प्रयोग पूरे करने के बाद सकुशाल पृथ्वी पर लौट आर्इं। वे किसी अंतरिक्ष टीम का नेतृत्व करने वाली पहली महिला हैं।
इस वर्ष 26 अप्रैल को पीएसएलवी-19 की पीठ पर सवार होकर स्वदेशाी तकनीक से निर्मित दूरसंवेदी उपग्रह रीसैट-1 अंतरिक्ष में पहुँचा। यह उपग्रह बादलों की ताज़ा स्थिति से अवगत करा रहा है। यह वही वर्ष था जब भारतीय वैज्ञानिकों ने 9 सितंबर को फ्रांस तथा जापान के उपग्रहों को अंतरिक्ष में विदा करते हुए अपने 100वें अंतरिक्ष मिशन की सफलता का जशन मनाया। 18 अप्रैल 1975 को अपने ही देश में बनाए गए आर्यभट् उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ इसरो ने अंतरिक्ष यात्रा आरम्भ की थी। 29 सितंबर को देश का सबसे भारी और अत्याधुनिक संचार उपग्रह जीसैट-10 सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। 750 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित जीसैट का वज़न 3.4 टन है।
गुज़रे साल हबल दूरबीन ने ब्राहृांड के कुछ दुर्लभ चित्र भेजे, जिसमें अनेक आकाशगंगाएँ  विद्यमान हैं। इसी दूरबीन से प्लूटो के एक और चंद्रमा होने का संकेत मिला, जिसे पी-5 नाम दिया गया है। इसी दूरबीन से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर वैज्ञानिकों ने एक वलयाकार आकाशागंगा खोजने का दावा किया था।
हबल दूरबीन के ज़रिए खगोल शास्त्रियों ने बौने लाल तारे ग्लीन 163 के समीप मानव के रहने लायक एक ग्रह की खोज की। 2009 में इस दूरबीन का पुनर्जन्म हुआ था। इस छोटी-सी अवधि में हबल ने ब्राहृांड के रहस्यों पर रोशानी डालते महत्त्वपूर्ण चित्र भेजे हैं। वर्ष के उत्तरार्द्ध में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने सबसे बड़ा ब्लैक होल खोजने का दावा किया। ब्लैक होल से जुड़े अध्ययन पर इस खोज का गहरा प्रभाव पड़ेगा। एक अनुमान के अनुसार ब्रह्माण्ड में 400 से अधिक ब्लैक होल हो सकते हैं।
भारत में गणित जगत की विलक्षण प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन की 125वीं जयंती राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाई गई। इसका उद्देश्य स्कूल से लेकर उच्चतर शाोध तक गणित को प्रोत्साहित करना और आम लोगों में गणित के प्रति जागरूकता पैदा करना था। सभी विज्ञानों में गणित को 'क्वीनका स्थान प्राप्त है।
बीते वर्ष भी स्टेम कोशिकाओं पर शोध जारी रहा और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अध्येताओं ने रक्त से ही स्टेम कोशिकाएँ बनाने में सफलता प्राप्त की।
जून में रियो डी जेनेरो में पृथ्वी सम्मेलन हुआ, जिसे रियो प्लस 20 नाम दिया गया। इसमें टिकाऊ विकास, हरित अर्थ व्यवस्था और पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार मंथन किया गया। इसी वर्ष अक्टूबर में हैदराबाद में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र का 11वाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 19 दिनों तक चला, जिसमें 192 देशों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में जैव विविधता से जुड़े 30 प्रस्तावों पर विचार-विनिमय हुआ, लेकिन दो पर सहमति नहीं बनी। ये दोनों ही प्रस्ताव जैव विविधता के आर्थिक पक्ष से सम्बंधित हैं।
वर्ष 2012 में भौतिक शास्त्र का सबसे बड़ा और पहला पुरस्कार भारत के प्रोफेसर अशोक सेन को दिया गया। उन्होंने ङ्क्षस्ट्रग थ्योरी पर महत्त्वपूर्ण शोध किया है। प्रोफेसर सेन इलाहाबाद के हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़े हैं। 56 वर्षीय सेन को पुरस्कार के रूप में तीस लाख डॉलर मिले हैं  ; जो नोबेल पुरस्कार से तीन गुना अधिक है।
 विदा हो चुके वर्ष में विज्ञान का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार तीन अमरीकी वैज्ञानिकों सहित छह अनुसंधानकर्ताओं को प्रदान किया गया। समीक्षकों का मानना है कि विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों में अमेरिका का वर्चस्व कायम है। इस बार चिकित्सा विज्ञान का नोबेल सम्मान जापानी शोधार्थी शिनाया यामानाका और ब्रिटेन के जॉन गर्डन को स्टेम कोशिकाओं पर महत्त्वपूर्ण शोधकार्य के लिए संयुक्त रूप से दिया गया। यामानाका पहले ही विज्ञान के दो प्रतिष्ठित सम्मान अल्बर्ट लास्कर अवार्ड 2009 एवं वुल्फ पुरस्कार 2011 ग्रहण कर चुके हैं। जापान को दो दशकों बाद यह सम्मान मिला है।
रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दो अमरीकी अध्येताओं रॉबर्ट लेफकोविज तथा ब्रायन कोबिल्का को जी-प्रोटीन युग्मित ग्राहियों पर अनुसंधान के लिए दिया गया है।
भौतिकी का नोबेल पुरस्कार फ्रांस के सर्ज हरोशा तथा अमरीकी डेविड जे. वाइनलैंड को क्वांटम भौतिकी में योगदान के लिए प्रदान किया गया।
विदा हो चुके साल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ध्वज को फहराने का प्रयास भी जारी रहा। इसी थीम पर दिल्ली में पहली बार हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसका आयोजन सीएसआईआर के 'निस्केयरसंस्थान ने किया था।
गुज़रे वर्ष में एक्स-रे क्रिस्टेलोग्रॉफी की खोज के सौ साल पूरे हुए और शाताब्दी वर्ष मनाया गया। इस वर्ष यूनेस्को के कलिंग पुरस्कार की हीरक जयंती भी मनाई गई। विज्ञान लोकप्रियकरण के इस अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार की शुरुआत 1952 में की गई थी। वर्ष 2012 में इंडियन बॉटेनिकल गार्डन ने अपनी स्थापना के 225 वर्ष पूरे किए।
वर्ष 2012 में हमने विज्ञान जगत की कई महान हस्तियों को खो दिया। 5 जून को प्रख्यात अमरीकी विज्ञान लेखक रे डगलस बेरी का निधन हो गया। उन्होंने विज्ञान कथाओं को साहित्य की मुख्यधारा में लाने में विशिष्ट भूमिका निभाई थी।
इसी वर्ष 6 फरवरी को हिंदी में विज्ञान के प्रतिष्ठित लेखक रमेश दत्त शर्मा नहीं रहे। उन्होंने विज्ञान लेखन में नए मुहावरों का प्रयोग किया और अपनी विशिाष्ट पहचान बनाई। वे कई वर्षों तक खेती पत्रिका के संम्पादक रहे।
23 जुलाई को अमेरिका की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री सैली राइड का निधन हो गया। वे अंतरिक्ष यात्रा पर जाने वाली सबसे युवा महिला थीं। चंद्रमा पर कदम रखने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति नील आर्मस्ट्रांग ने 25 अगस्त को विदा ले ली। उन्होंने 38 वर्ष की उम्र में 20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर कदम रखा था। पहली बार किडनी का सफल प्रत्यारोपण करने वाले डॉ. जोसेफ ई. मुरे 26 नवम्बर को चल बसे।
जीनोमिक्स, पार्टिकल फिजि़क्स, नैनो टेक्नॉलॉजी, सिंथेटिक बॉयोलॉजी, पुनर्मिश्रित डीएनए टेक्नॉलॉजी जैसे अग्रणी विषयों में अनुसंधान से प्रौद्योगिकी समृद्ध होती जा रही है, जिसकी झलक विदा हो चुके साल में भी दिखाई दी। (स्रोत फीचर्स)

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माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
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