December 18, 2012

लघुकथाएं



-आशीष दशोत्तर
खलल
संतो के प्रवचन सुनने का उन्हें शौक था। नियमित प्रवचन सुनते। कोई संत नगर में आता तो रोज सुनने जाते। अब तो ऊपर वाले ने उनकी सुन ली थी। टेलीविजन पर रोज प्रवचन आने लगे। वे सुबह से ले कर शाम तक अपने समय के खाली हिस्सों को इन्हीं प्रवचनों से भरते। उनकी इस भक्ति भावना को देखते हुए उन्हें धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति समझा जाने लगा था।
एक दिन वे टेलीविजन पर प्रवचन सुन रहे थे। संत कह रहे थे- बुजुर्गों की सेवा में ही जीवन का सार है। जिसने अपने बुजुर्गों की उपेक्षा की, उसका जीवन नर्क के समान है।
वे प्रवचन में खो चुके थे। संत वाणी को सुन उनकी ऑंखों से अश्रुधारा बह रही थी। तभी खट्-खट् की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ। पीछे के द्वार पर बूढ़े पिता दस्तक दे रहे थे। वे उठे और उनके पास पहुँचे। लगभग चिल्लाते हुए बोले, क्या है? सभी कुछ तो धर दिया है आपके कमरे में। अब तो चैन से रहने दो। यह कहते हुए वे पिता को घसीटते हुए उनके कमरे में छोड़ आए। आते वक्त उन्होंने पिता के कक्ष के द्वार की साँकल बाहर से जड़ दी। अब प्रवचन सुनने में कोई खलल नहीं होगा। यह सोचते हुए वे पुन: टेलीविजन के सामने बैठ गए।
             परम्परा
बहू घर में पहली बार आई तो सास ने बहू को वही साड़ी दी जो उन्हें अपनी सास से मिली थी। यह घर की परम्परा थी। सास अपनी बहू को साड़ी देती, जिसे वह गोदभराई के वक्त पहनती। बहू का जब गोदभराई का समय आया तो सास ने याद दिलाया कि बहू वही साड़ी पहनना।
बहू ने मुँह बिचकाकर कहा- वो साड़ी और मैं पहनूँ? उसे तो मैंने कभी का बर्तन वाली बाई को दे दिया। कितनी ओल्ड फैशन और घिसी-पिटी साड़ी थी। उसे मैं पहन लेती तो मेरा दम ही घुट जाता।
सास, इस वक्त चुपचाप खड़े अपने बेटे और बोलती बहू के बीच खड़ी नई परम्परा से खुद को जोडऩे की असफल कोशिश कर रही थी। 

लेखक के बारे में- जन्म -05 अक्टूबर 1972, शिक्षा एम.एस.सी.(भौतिक शास्त्र) एम.ए.(हिन्दी)ए एम.एल.बी.ए बी.एड ए बी.जे.एम.सी.ए स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन। प्रकाशन- मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती, ग़ज़ल संग्रह- लकीरें, भगतसिंह की पत्रकारिता पर पुस्तक- समर में शब्द। नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित, आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पाश्र्व स्वर। पुरस्कार- साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन, साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन, म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृष्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत। साहित्य गौरव पुरस्कार। किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित। सम्प्रति- आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।
संपर्क- 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001, मो. 098270-84966, Email- ashish.dashottar@yahoo.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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