October 27, 2012

2 अक्टूबर: जयंती



चौराहे पर गाँधी
- प्रेम जनमेजय
मसूरी में, लायब्रेरी चौक पर
राजधानी की हर गर्मी से दूर
आती-जाती भड़भड़ाती
सैलानियों की भीड़ में अकेला खड़ा
सफेदपोश, संगमरमरी, मूर्तिवत, गांधी
क्या सोच रहा होगा-
अपने से निस्पृह
भीड़ के उफनते समुद्र में
स्थिर, निस्पंद, जड़
नहीं होता इतना तो कोई हिमखंड भी
खड़ा।
क्या सोच रहा है, गाँधी ?
सोचता हू मैं।

कोटि-कोटि पग
इक इशारे पर जिसके, बस
नाप लेते थे साथ-साथ हज़ारों कदम
अनथक
वो ही थका-सा
प्रदर्शन की वस्तु बन साक्षात
अकेला
संगमरमरी कंकाल में, किताबी
मूर्तिवत खड़ा-सा
क्या सोच रहा है, गाँधी ?

स्वयं में सिमटी सैलानियों की भीड़
नियंत्रित करतीं वर्दियाँ
कारों की चिल्ल-पौं को
पुलसिया स्वर से दबातीं सीटियाँ
एक शोर के बीच
दूसरे शोर की भीड़ को
जन्म देती
मछली बाजार-सी कर्कश दुनिया
किसी के पास समय नहीं
एक पल भी देख ले गाँधी को
अकेले अनजान खड़े, गाँधी को ।

क्या सोचता होगा गाँधी ?
भीड़ में भी विरान खड़ा
क्या, सोचता होगा गाँधी !

सोचता हूँ,
सोचता होगा
भीड़ के बीच क्या है प्रासंगिकता... मेरी ?
मैं तो बन न सका
भीड़ का भी हिस्सा
बस, खड़ा हूँ शव-सा औपचारिक
इक माला के सम्मान का बोझ उठाए
किसी एक तारीख की प्रतीक्षा में
अपनेपन की सच्चाई को तरसता
अनुपयोगी, अनप्रेरित अनजान बिसूरता ।

हमारे पराएपन को झेलता
हमारा अपना ही
बंजर बेजान खड़ा है गाँधी ।
मेरा गाँधी, तेरा गांधी
अनेक हिस्सों में बंटा गाँधी
सड़कों और चौराहों को
नाम देता गाँधी
हमारी बनाई भीड़ में
वीरान-सा चुपचाप,
खड़ा है,  अकेला गाँधी ।
क्या सोचता है गाँधी ?
क्या, सोचता है गाँधी!
संपर्क: संपादक- व्यंग्य यात्रा, 73 साक्षर अपार्टमेंट, ए-3 पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110 063,
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