August 25, 2012

चिंतन : सिर्फ एक दिन ही क्यों?

- राम अवतार सचान
देखा जाए तो इन सबको बचाने के लिए कोई विशेष दिन का इंतजार क्यों? ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होना चाहिए। घर, परिवार, मुहल्ले, शहर, देश, प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को इसके महत्व का पाठ बचपन से पढ़ाया जाना चाहिए। नहीं तो आने वाले समय में पीढिय़ों को बहुत कठिन दिन देखने होंगे और बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

31 मार्च को दुनिया भर में अर्थ आवर डे मनाया गया। दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने एक 1 घंटे तक अपने- अपने घरों की बिजली को बंद रखा और ऊर्जा बचाने का संदेश दिया। प्रश्न यह उठता है कि किसी बचत के लिए क्या मात्र एक घंटा, एक दिन वर्ष में काफी है? पूरे वर्ष क्यों न किया जाए। ऊर्जा बचाने या उसका अपव्यय रोकने को हम अपने आदत में ही क्यों न शामिल कर लें ताकि बिजली का अधिक से अधिक संचय किया जा सके। ...और उसकी पहल हमें अपने घरों से ही शुरु करनी होगी। घर पर अनावश्यक जलने वाली बिजली को तुरंत बंद करना होगा और साथ- साथ सभी परिवार के सदस्यों को भी इसके महत्व को समझाना होगा। इसके अलावा कम किलोवाट वाले बल्व या सीएफएल का प्रयोग करना होगा।
इसके साथ सरकारी प्रयास भी अत्यंत आवश्य है परमाणु ऊर्जा जैसी महंगी एवं खतरनाक ऊर्जा के विकल्प के तौर पर, प्रकृति ने सस्ते ऊर्जा के विकल्प भी हमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराए हैं। जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा पर भी ध्यान देना होगा। इनके उपयोग से न केवल हम ऊर्जा की पूर्ति करेंगे बल्कि पेट्रोलियम पदार्थों की बड़ी मात्रा में बचत कर सकते हैं जो रोजगार के नए अवसर प्रदान करने में सहायक होंगे। इसका उदाहरण गुजरात सरकार स्वयं है।
ठीक इसके कुछ दिन पूर्व हमने वाटर डे, इन्वॉयरमेंट डे, प्लेनेट डे मनाया था, क्या समाचार पत्रों और पत्रिकाओं मैग्जीनों में लेख लिखने मात्र से इसके असर को कम किया जा सकेगा? इसके लिए हमें दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ कठोर कदम भी उठाने होंगे। हमारी सरकारों को भी दैनिक जीवन में ऐसा आचरण करना पड़ेगा जो वे नहीं कर रही हैं। बल्कि ग्लोबल वार्मिंग का बढऩा और ग्राउंड वाटर का लेबल दिनों दिन लगातार नीचे खिसकते जाना चिंता का विषय है।
बीमारियों के बचाव की बातें ऐसे ही खास दिनों पर करते हैं मगर उनमें कमी की बजाए प्रतिवर्ष बीमार लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है। दरअसल में ये चिंताएं भी वैसी ही नजर आती है जैसे पेट्रोल की कीमत के बढऩे के बाद लोग थोड़ा परेशान होते हैं पर इसके कम इस्तेमाल करने या इसके बेजा इस्तेमाल करने की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है। यह फिक्र भी रस्मी है उसी तरह ग्लोबल वार्मिंग, पानी की चिंता, पावर बचाने और बीमारी की चिंताएं भी रस्मी हो चली हैं। सब थोड़े से शोर शराबे, अखबारों, विज्ञापनों, टीवी व रेडियों के प्रसारण तक ही सीमित रह जाते हैं।
अभी देश और विदेश के वैज्ञानिकों ने यह गणना की है कि अधिक तापमान बढऩे से ग्लेशियर पिघलेंगे, पानी का स्तर बढ़ेगा, तटीय प्रदेश व देश जल में समाहित हो जाएंगे। अधिक गर्मी की वजह से अन्न का उत्पादन घटेगा, भूखमरी होगी, जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन होगा और जैव विविधता में बड़ा परिवर्तन होगा। वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि सन् 2050 तक 30 प्रतिशत पादप प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। अभी तक पृथ्वी पर ज्ञात 5487 स्तनधारी प्रजातियों में 1141 पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
इन सबको बचाने के लिए कोई विशेष दिन का इंतजार क्यों? ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होना चाहिए। घर, परिवार, मुहल्ले, शहर, देश, प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को इसके महत्व का पाठ बचपन से पढ़ाया जाना चाहिए। नहीं तो आने वाले समय में पीढिय़ों को बहुत कठिन दिन देखने होंगे और बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। फालतू ऊर्जा, पानी तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का बेजा इस्तेमाल बंद करना होगा अन्यथा कहीं ऐसा न हो जब तक हमारी आंख खुले, बहुत देर हो चुकी होगी।
संपर्क- 13/1, बलरामपुर हाउस, ममफोर्डगंज,  इलाहाबाद 211002 मो. 09628216646

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष