April 21, 2012

दूर हैं किताबें? क्या पाठकों से

दूर हैं किताबें? क्या पाठकों से

 -  पंकज चतुर्वेदी
नई टेक्नॉलॉजी ने भले ही ज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, लेकिन पुस्तकें आज भी विचारों के आदान- प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम है। साथ ही आम आदमी के विकास हेतु जरूरी शिक्षा और साक्षरता का एकमात्र साधन किताबें ही हैं। यह सच है कि सूचनाओं के प्रसार में इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया मुद्रण माध्यमों पर भारी पड़ रहा है। पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में कंप्यूटर या टीवी स्क्रीन पर सूचनाओं को पहुँचाया जा सकता है, लेकिन इस बात को भी स्वीकारना होगा कि किताबें सर्वाधिक आज्ञाकारी संयमित माध्यम है। पुस्तके पाठक को उनकी क्षमता के अनुरूप ज्ञान का आकलन करने और जानकारियों का गहराई तक विश्लेषण और समालोचना का मौका प्रदान करती है।
ऐसे ही कई सत्यों- तथ्यों को समाज स्वीकारता है। इसके बावजूद आज भी किताबें घर या बच्चों के लिए 'आवश्यक' की सूची में नहीं आ पाई हैं। विशेष रूप से हिन्दी पुस्तकों का बाजार 'स्वान्त: सुखाय' वाला हो गया है। कई वरिष्ठ और नवोदित लेखक अपना पैसा लगा कर 1000 किताबें छपवाते हैं। फिर यार- दोस्तों की चिरौरी कर अखबार- पत्रिकाओं में उनकी समीक्षा प्रकाशित करवाते हैं। जुगतबाजी कर कुछ सरकारी सप्लाई या फिर सरकार- पोषित पुरस्कार, केवल यहीं तक सिमट कर रह गई है पुस्तकों की दुनिया।
इसके विपरीत देश के बड़े हिस्से में बच्चों के लिए किताब का अर्थ पाठ्यक्रम की पुस्तकों से अधिक नहीं है। यदा- कदा जब वहाँ तक कुछ पठनीय पहुँचता है तो खरीदा भी जाता है और पढ़ा भी। जिस पर हिंदी के पुरोधा चिंता जताते हैं कि 'वर्दी वाला गुंडा' या 'मनोहर कलियाँ' लाखों में बिक रही हैं।
इससे यह भी तुरत- फुरत आकलन कर लिया जाता है कि समाज की पठन-  अभिरुचि सस्ते साहित्य में हो गई है। परंतु जब टीवी पर निर्मला, तमस, या फंतासी 'चंद्रकांता' सीरियल के रूप में आते हैं तो लोग तन्मयता से देखते हैं। जाहिर है कि किताबों तक पाठकों की पहुँच में कहीं बाधा जरूर है।
लेकिन यह भी तस्वीर का एक अर्ध- सत्य है। बानगी के तौर पर राजधानी दिल्ली के एक डिग्री कॉलेज में पढ़ाने वाली महिला के साथ अपने अनुभवों को साझा करना चाहूँगा। वे अपनी बेटी के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट की चित्र पुस्तकों का सेट चाहती थीं, जिसकी कीमत बमुश्किल 75 रुपए होगी। उन्होंने छह महीने पहले मुझसे ये किताबें लाने को कहा था। फिर यदा- कदा जब मिलतीं तो उसके लिए याद दिलातीं। उक्त प्राध्यापिका अपनी इकलौती बेटी को आइसक्रीम खिलाने के लिए 16 किमी दूर कनॉट प्लेस तक कई बार ले गईं। छह महीने में तीन बार अप्पू घर और फन एंड फूड विलेज भी ले गईं, लेकिन किताबें खरीदने के लिए किसी दुकान पर जाने के लिए उन्हें समय नहीं मिला। जाहिर है कि उनके लिए किताबें प्राथमिक जरूरतों में से नहीं है।
यह घटना देश के आम मध्यम वर्ग की मानसिकता का साझा चित्र पेश करती है। बच्चों के मानसिक विकास की समस्याओं को आज भी गंभीरता से नहीं आँका जा रहा है। मध्य वर्ग अपने बच्चों की शिक्षा और मानसिक विकास के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाई और अच्छा खाने- पिलाने से आगे नहीं सोच रहा है। यही कारण है कि 'अपने प्रिय को उपहार में पुस्तकें दें' का नारा व्यावहारिक नहीं बन पाया है।
इन दिनों दुनिया का व्यापारिक जगत, भारत में अपना बाजार तलाशने में लगा हुआ है। दैनिक उपभोग की एक चीज बिकते देख दर्जनों कंपनियाँ वही उत्पाद बनाने, बेचने लग जाती हैं। होड़ इतनी कि ग्राहकों को रिझाने के लिए छूट, ईनाम, फ्री सर्विस की झड़ी-  सी लगी हुई है। आप मुँह तो खोलें, वांछित चीज आपके दरवाजे पर होगी। आम आदमी की खरीद - क्षमता बढ़ रही है। पैसे के बहाव के इस दौर में भी किताबें दीन- हीन सी हैं। इतनी निरीह कि हिंदी प्रकाशक को तो अपनी पहचान का संकट सता रहा है। अभी एक साहित्यिक पत्रिका में हिंदी के नामी- गिरामी प्रकाशक का विज्ञापन छपा था। उक्त प्रकाशक ने प्रेमचंद से लेकर राजेन्द्र माथुर तक सब को छापा है। इसके बावजूद उसे अपने पते में लिखना पड़ता है कि 'सबलोक क्लिनिक के पास'। यानी साहित्य जगत के इतने बड़े नामों की तुलना में सबलोक क्लिनिक अधिक चर्चित और सुविख्यात है।
लुब्बेलुबाब यह है कि किताबों की लोकप्रियता में कई बातें आड़े आ रही हैं- प्रकाशकों में आम लोगों तक पुस्तके पहुँचाने की इच्छा शक्ति का अभाव, पढ़े- लिखे समाज का किताबों की अनिवार्यता को न समझना और बाजार की अनुपस्थिति। यह त्रासदी है कि निजी प्रकाशक की तरह ही नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग और अन्य सरकारी प्रकाशक भी सरकारी खरीद पर निर्भर होते जा रहे हैं। कुछ साल पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के तत्कालीन अध्यक्ष डा. सुमतीन्द्र नाडिग ने कहीं सार्वजनिक समारोह में कह दिया था कि सरकारी सप्लाई पठन अभिरुचि के विकास में बाधक है, सो इस पर रोक लगनी चाहिए। इस पर भारी हंगामा हुआ और सभी प्रकाशक खफा हो गए। वे किताबों के लिए डीलर, विक्रेता तलाशने के बनिस्बत एक जगह कमीशन देकर 'सरस्वती' का सौदा करना अधिक सहूलियतमंद समझते हैं। आखिर यह क्यों नहीं सोचा जाता कि 'वर्दी वाला...' या  'मधुर कलियाँ' की लाखों में बिक्री का एकमात्र कारण यह है कि वे हर गांव- कस्बे के छोटे- बड़े सभी मैगजीन स्टैंड पर बिकती है। तथाकथित दोयम दर्जे का साहित्य प्रकाशित करने वाला प्रकाशक जब इतनी दूर तक अपना नेटवर्क फैला लेता है तो सात्विक साहित्य क्यों नहीं ?
हमारे देश की तीन- चौथाई आबादी गाँवों में रहती है और दैनिक उपभोग का सामान बनाने वाली कंपनियाँ अपने उत्पादों का नया मार्केट वहाँ खंगाल रही है। दुर्भाग्य है कि किताबों को वहाँ तक पहुँचाने की किसी ठोस कार्य- योजना का अभी भी दूर- दूर तक अता- पता नहीं है। गाँव की जनता भले ही निरक्षर है, मगर वह सुसंस्कृत है। वह सदियों से दु:ख- सुख को झेलती आ रही है। इसके बावजूद वह तीस- चालीस रुपए की रामायण या सुखसागर वीपीपी से मँगवा कर सुख महसूस करता है। आजादी के 65 साल बाद भी गाँव वालों की रुचि परिष्कृत कर सकने वाली किताबें प्रकाशित नहीं हो सकीं हैं।
सन् 1996 में यूनेस्को की आम बैठक में यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को 'विश्व पुस्तक दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इसके तहत दिल्ली व कुछ नगरों में कुछ सरकारी कार्यक्रम होते भी हैं। लेकिन अधिकतर में आम पाठक की भागीदारी नहीं होती है- कुछ मठाधीश किस्म के लेखक भाषण देते हैं, चिंता जताते हैं और आयोजन की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।
दावा किया गया कि दुनिया में सबसे ज्यादा किताबें हम छापते हैं। यानी बिकती भी हैं। फिर पाठक की निष्क्रियता क्यों थी?  'वेलेंटाइन डे' या 'न्यू ईयर' के प्रति जिस तरह का उत्साह समाज, सरकार और बाजार दिखाता रहा है, ठीक वैसा विश्व पुस्तक दिवस के प्रति भी उभरता तो कुछ उम्मीद की जा सकती थी। वरन हालत वही 'ढाक के तीन पात' रहेगी। किताबें छपेंगी, सरकारी खरीद की बदौलत आलमारियों में कैद होकर किताबें बिसुरेंगी, हर साल पुस्तक दिवस पर भाषणबाजी होगी, चिंता जताई जाएगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया पर अपना चेहरा दिखाया जा सके उसके बाद बस।
संपर्क- नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 5 नेहरू भवन वसंत कुंज
       इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110070
         मो. 09891928376,
      pankaj_chaturvedi@hotmail.com

1 Comment:

http://bal-kishor.blogspot.com/ said...

pustak prakashan aur pathakon par pankaj ji ka achcha lekh hai. sarakari kharid aur any jagaho par bhi kamishan dene ki vajah se hi shayad prakashak mulya bahut rakh lete hai par vah kamishan aam pathak ko nahi dete is tarah pathkon se duri ka yah bhi ek karan hai .
pavitra agrawal

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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