November 10, 2011

टूटे पांव की पहाड़ी परीक्षा और माता कौशल्या

- डॉ. परदेशीराम वर्मा
युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने लिखा है ...
'दृष्टि के अनुरूप सृष्टि बनती है।' यह सूत्र कथन है। समय- समय पर ऐसे सूत्रों को समझने की प्रेरणा मिलती है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने वाले संत पवन दीवान इन दिनों माता कौशल्या के नाम पर नवनिर्मित मंत्रालय भवन का नाम हो इस उद्देश्य के लिए अपने संचित पुण्य और अनुभव को समर्पित कर रहे हैं।
विगत छ: माह में मुझे उनके साथ भिन्न- भिन्न व्यक्तियों के पास जाने का अवसर मिला है। छत्तीसगढ़ भी अन्य प्रांतों की तरह किसी एक विराट व्यक्तित्व, विशिष्ट चरित्र नायक, देव- देवी, युगावतार, आलोक पुंज से जुड़कर अपनी पहचान बनाए यह उनकी सदिच्छा है।
छत्तीसगढ़ की बेटी, भगवान श्रीराम की माता कौशल्या ही ऐसी विराट सर्वपूजित व्यक्तित्व हो सकती हैं जिनकी स्मृति से जुड़कर यह छत्तीसगढ़ अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर उभरेगा यह वे मानते हैं। इस उद्देश्य को सामने रखकर वे राजनेता, साहित्यकार, कलाकार, साधु- सन्यासी, महामण्डलेश्वर और शंकराचार्य जी से मिलते चल रहे हैं। सबने उनसे सहमति जताते हुए इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना समर्थन सहर्ष दिया है। वे चाहते थे कि इसी उद्देश्य के लिए गायत्री तीर्थ, हरिद्वार की यात्रा कर डॉ. प्रणव पण्ड्या जी से मिलकर आग्रह किया जाए। उत्तरांचल में संत पवन दीवान के अनेक गुरुभाईयों के अपने आश्रम भी हैं।
उनके आदेश पर मैं जाना तो चाहता था मगर यात्रा को केवल तीर्थ यात्री के रूप न लेकर पर्यटक के रूप में सपरिवार देवभूमि की ओर प्रस्थान करना चाहता था। यात्रा लंबी, पांव टूटा हुआ और देव हैं पहाड़ों पर, ऐसे में परिवार के लोग साथ हों तो सम्बल बना रहेगा, यह मैंने सोचा।
मैं ऐसे समय में शांतिकुंज जाने के लिए निकला जब नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति और सामाजिक क्रांति के लिए प्रसिद्ध होकर समग्र जीवन होम कर देने वाले पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जन्म शताब्दी वर्ष की गहमागहमी चरम पर है। लगभग 40 वर्षों से मैं उनके अभियान से जुड़े संकल्पित लोगों को करीब से देख और समझ रहा हूं। छत्तीसगढ़ में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य कई बार आए। वे मेरे गांव लिमतरा के पास स्थित छोटे से गांव कंडरका में भी अपनी सुपुत्री श्रीमती शैलबाला जी के साथ पधारे थे। सामुदायिक विकास विभाग में मेरे प्रमुख रहे स्व. रामानुज शर्मा गायत्री परिवार से जुड़े थे। गायत्री परिवार में जीवन अर्पित करने वाले इंजीनियर श्री कालीचरण जी मेरे ही गांव के पास स्थित नरधा के निवासी हैं। श्री कालीचरण आज इस आंदोलन के प्रमुख व्यक्तियों में से एक हैं।
गायत्री परिवार के समर्पित परिजनों से चारों ओर घिरे रहकर भी मैं कभी मथुरा या हरिद्वार जाकर शांतिकुंज घूम आऊं यह उत्सुकता नहीं हुई। लेकिन जाने किस प्रेरणा से 13 अक्टूबर 2011 को सपरिवार मैं हरिद्वार के लिए निकल पड़ा।
मैं 13 को निकला 14 को संध्या छत्तीसगढ़ के युवक राजू केसरवानी शांतिकुंज का वाहन लेकर स्टेशन आए। छत्तीसगढ़ रायपुर के हड्डी रोग विशेषज्ञ गायत्री अस्पताल के प्रमुख डॉ. अरुण मढ़रिया ने यह वाहन शांतिकुंज को अपनी ओर से भेंट की है। हमारे ठहरने का प्रबंध भी डॉ. मढ़रिया के सौजन्य से शांतिकुंज के सुविधाजनक कमरों में हो गया।
मैं दर्शनार्थी या पर्यटक की उत्सुकता लेकर वहां गया लेकिन जब लौटा तो एक बैचेनी लेकर लौटा। इस अभियान से सूत्रधार को बहुत करीब से जानने वाले लोगों से घिरा रहकर भी मैं कभी इस ओर आकृष्ट नहीं हुआ लेकिन शांतिकुंज पहुंच कर एक गहरी जिज्ञासा से भर उठा। मुझे लगा कि इस अभियान को और युग निर्माण की परिकल्पना से जुड़े समस्त सूत्रधारों की जीवनचर्या को महत्व न देकर मैंने बहुत कुछ खो दिया है।
दूसरे ही दिन मुझे श्रीराम सहाय शुक्ल जी की कृपा से पं. श्रीराम शर्मा के जामाता विद्वान दार्शनिक डॉ. प्रणव पण्ड्या एवं उनकी सुपुत्री श्रीमती शैलबाला से मिलकर आशीर्वाद लेने का अवसर मिला। छत्तीसगढ़ की बेटी भगवान श्रीराम की माता कौशल्या से संबंधित नामकरण अभियान से जुड़े प्रयत्न संबंधी कुछ प्रपत्र एवं साहित्य उन्हें भेंट करते हुए मैंने छत्तीसगढ़ के संत पवन दीवान जी का संदेश सुनाया। पण्ड्या जी ने उदारतापूर्वक समर्थन में पत्र लिखते हुए आशीष दिया। संत पवन दीवान माता भगवती देवी की रसोई में उनके हाथों से भोजन प्राप्त कर चुके हैं। शांतिकुंज में उनका प्रेरणास्पद प्रवचन भी होता रहा है।
मेरे गांव के नामी सपूत डॉ. लाखेश मढ़रिया भी गायत्री परिवार के निष्ठावान साधक हैं। यश के शिखर की ओर बढ़ रहे डॉ. लाखेश आज भी मिशन के कामों में हाथ बंटाते हैं।
शांतिकुंज में छत्तीसगढ़ पूरी तरह प्रभावी नजर आया। मुझे गर्व हुआ कि शांतिकुंज के साधकों, सेवकों, समयदानियों, जीवनदानियों में छत्तीसगढ़ अग्रगण्य है। संत पवन दीवान के गुरुभाई पूर्व केंद्रीय गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद जी का परमार्थ आश्रम भी हरिद्वार में है। हम वहां भी गए। ऋषिकेश में दीवान जी के गुरुभाई मुनीजी महाराज श्री चिदानंद जी का आश्रम ठीक गंगा जी के किनारे हैं। वहां गंगा जी में बोटिंग करते हुए हम पहुंचे।
मुनि जी के नेतृत्व में भव्य गंगा आरती हुई। विदेशी पर्यटक टूट पड़ते हैं इस अवसर पर। वे आरती गाकर नाचते भी हैं। वह अद्भूत दृश्य था। मुनिजी से भी भेंट हुई। उनका आशीष मिला। फिर हम देहरादून में डी.एस.पी. के रूप में पदस्थ छत्तीसगढ़ की बिटिया श्रीमती श्वेता मिश्रा के सुझाव पर मसूरी भी घूमने गए। मसूरी पहुंचते ही मैं प्रख्यात अंग्रेज मूल के भारतीय लेखन रश्किन बांड से मिलने निकल पड़ा। पर अफसोस वे यात्रा पर थे। हम 19 को वापस लौटे।
देवभूमि, उत्तराखंड और झारखंड तो अपनी पहचान रखते हैं। वे खंड- खंड नहीं बल्कि पहचान की दृष्टि से अखंड हैं मगर गढ़विहीन छत्तीसगढ़ कई खंड़ों में बंटा है। यहां छत्तीसगढ़ की अस्मिता की बात करने वाला संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। क्षेत्रीयतावादी और संकीर्ण माना जाता है। जबकि इसी के साथ जन्में उत्तराखंड एवं झारखंड अपनी विशिष्ट पहचान के लिए काम करने वालों पर न्यौछावर होते हैं।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक जी कथाकार हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री खंडूरी जी सेना के पूर्व अधिकारी हैं। इस तरह दोनों से ही मैं जुड़ाव महसूस करता हूं। उनसे मिलना भी तय था मगर व्यवस्तता के कारण मुलाकात न हो सकी। संत पवन दीवान से प्राप्त दिशा- निर्देश लेकर मैं माता कौशल्या के नामकरण के संदर्भ में भिन्न- भिन्न महत्वपूर्ण लोगों से मिलने निकला था।
यह पूरी यात्रा कई कई उद्देश्यों को स्पर्श करती रही। शांतिकुंज की विराट व्यवस्था देखकर युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा जी के देवोपम तपस्वी व्यक्तित्व के प्रति अगाध जिज्ञासा जग उठती है। वहां जाकर ही मैं समझ पाया कि क्यों लोग पारिव्राजक बनकर पीला झोला लटकाये, पीला कुर्ता एवं उसी रंग की धोती पहने घूमते रहते हैं।
वेदपाठी, कर्मकांडी, विद्वान, संस्कृत के आचार्य के घर जन्मे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने लिखा है कि वे प्रतिदिन 4 घंटे लिखते हैं। पूरी पत्रिका ही वे अकेले निकालते रहे। उनका साहित्य विपुल है। उन्होंने हिमालय में लगातार तपस्या की। मथुरा के जिस किराए के घर में 15 रुपया महीने पर वे रहे वहां प्रेतों का डेरा था। पैतृक संपत्ति बेचकर उन्होंने हरिद्वार में शांतिकुंज के लिए जमीन ली। एक पूरा प्रज्ञापूर्ण संसार का सृजन उन्होंने अपने दम पर किया। आज वे भगवान की तरह पूजे जा रहे हैं लेकिन उनका संघर्षपूर्ण जीवन यह संदेश देता है कि...
'यूं ही शोहरत की बुलंदी नहीं मिलती साजिद,
पहले कुछ खोइये इस दौर में पाने के लिए'
चप्पे- चप्पे पर उनके चरण चिन्ह वहां अंकित हैं। उन्होंने वहां शांतिवन और विश्वविद्यालय भी स्थापित किया। चिकित्सालय और समृद्ध पुस्तकालय तो देश भर में चर्चित हैं। पत्रिकाएं भी लाखों की संख्या में निकलती हैं। कमाल यह है कि पत्रिकाओं में एक भी विज्ञापन नहीं होता। विज्ञापन के युग में खुद को विज्ञापित न करते हुए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के आख्यानों में आए ऋषियों की कथा को और चमत्कारों को सच मानने पर मजबूर कर दिया है। लगता है कि अगस्त्य ने जरूर समुद्र को अंजूरी में भर कर पी लिया होगा। इस पंक्ति की सार्थकता को भी महसूस किया...
'राम से बढ़कर राम कर दासा।'
घूमते हुए पहाड़ के संबंध में कवि की पंक्तियां याद आती रहीं... 'सब मैदानों में ही इतराते हैं, पहाड़ पर आदमी तो आदमी, पेड़ भी सीधे हो जाते हैं।'
18 अक्टूबर को प्रात: 6 बजे राजू ने पुन: हरिद्वार रेलवे स्टेशन तक हम सबको पहुंचाया। राजू एवं अन्य आत्मीयजनों से मिलकर यह नहीं लगा कि मैं छत्तीसगढ़ से दूर हूं। हंसते- हसंाते ही 19 अक्टूबर को हमारी वापसी हुई।

संपर्क- एल आई जी-18, आमदीनगर, हुडको, भिलाई मो. 9827993494

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