November 10, 2011

पहला पड़ाव और छत्तीसगढ़

यह वर्ष 1994 की बात है जब लखनऊ में 'रागदरबारी' जैसे कालयजी उपन्यास के लेखक श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी भेंट हुई। मुझे उन्हीं के हाथों लखनऊ में व्यंग्य के लिए दिया जाने वाला अट्टहास सम्मान भी प्राप्त हुआ था। आयोजन के बाद मैंने उनसे कहा था 'मैं आपसे मिलने आना चाहता हूं।' 'जरुर॥' फिर उन्होंने अपने घर आने का नक्शा बताया। तब उनसे साढ़े तीन घण्टों तक बातचीत का लम्बा सिलसिला चला था। इसी बातचीत में उन्होंने अपने उपन्यास 'पहला पड़ाव' के बारे में भी विस्तार से बात की थी। इस चर्चा में उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ कैसे उनके उपन्यास के केन्द्र में आया और यह भी कि इसका दूसरा भाग लिखने के लिए वे छत्तीसगढ़ का अध्ययन करना चाहते हैं। वे तो चले गए पर धरोहर के रूप में आज भी मेरे पास उनकी और उनकी पत्नी श्रीमती गिरिजा शुक्ल की तस्वीरें संजो कर रखी हैं। उस महान हस्ती को याद करते हुए मैं बातचीत के उन कुछ हिस्सों को आप सबके साथ बांटना चाहता हूं.

- विनोद साव
श्रीलाल शुक्ल का एक उपन्यास है 'पहला पड़ाव'। इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश कमाने खाने आए मजदूरों की कथा केन्द्र में है। श्रीलाल शुक्ल कहते हैं कि 'मैं इस उपन्यास का दूसरा भाग लिखना चाहता था... पर इसके लिए कुछ तैयारी करनी थी। छत्तीसगढ़ क्षेत्र का अध्ययन करना था। सैकड़ों वर्षों पहले वहां एक महात्मा घासीदास हुए थे जिन्होंने उस क्षेत्र के सम्पूर्ण वर्ग को संगठित करके उनके द्वारा जो अनेक पारम्परिक कार्य कराये जाते थे उनसे उन्हें विलग कराया था। परिणाम स्वरुप वहां के भूमिघरों ने उन्हें अपने खेतों से निकाल दिया और वे काम की तलाश में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब तक फैल गए।
लेकिन तब भी गांव में उनकी जड़े बनीं रहीं। उसी पुराने आंदोलन के कारण उनमें आज भी शराबखोरी आदि की आदतें बहुत कम हैं। सचमुच विस्थापितों का यह अत्यंत आश्चर्यजनक समुदाय है। इस पर यदि कथा रचनी है तो जाहिर है कुछ बुनियादी तैयारियां करनी होंगी। अध्ययन, शोध की जरुरत होगी, जो मैं नहीं कर सका।'
छत्तीसगढ़ के सौंदर्य का चित्रण:
'पहला पड़ाव' की नायिका जसोदा है जो छत्तीसगढ़ से गई है, उसके आकर्षक व्यक्तित्व के कारण उपन्यास के अन्य पात्र उसे 'मेमसाहब' कहते हैं।
इस नायिका की सुन्दरता का चित्रण श्रीलाल शुक्ल ने बड़े सौन्दर्य बोध के साथ किया है इस तरह 'मेमसाहब का दिल ही मुलायम नहीं था उनमें और भी बहुत कुछ था। उनकी आंखें बड़ी- बड़ी और बेझिझक थीं, भौंहें बिलकुल वैसी, जैसी फैशनेबुल लड़कियां बड़ी मेहनत से बाल प्लक करके और पेंसिल की मदद लेकर तैयार करती थीं। रंग गोरा, गाल देखने में चिकने- छूने में न जाने और कितने चिकने होंगे, कद औसत से ऊंचा, पीठ तनी हुई, और दांत जो मुझे ख़ासतौर से अच्छे लगते, उजले और सुडौल। उनके बाल कुछ भूरे थे। मेमसाहब की उपाधि उन्हें अच्छी बातचीत के हाकिमाना अंदाज से नहीं, गोरे चेहरे और इन लंबे-घने-भूरे बालों के कारण मिली थी।'

संपर्क- मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001, मो. 9407984014


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