October 23, 2010

विज्ञान

चमेली की सुंगध का नशा
चैन की नींद के लिए गोली से लेकर योग तक न जाने कितने जतन किए जाते हैं, लेकिन अब चमेली की सुगंध लीजिए और चैन की नींद सो जाइए।
वैज्ञानिकों की मानें तो अब अनिद्रा के शिकार लोगों को नींद की गोलियां खाने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि चमेली के फूल की सुगंध इसका आसान, सुरक्षित और कुदरती उपाय हो सकता है। जर्मन वैज्ञानिकों की ताजा शोध रिपोर्ट के मुताबिक पूरी सांस भरकर ली गई चमेली की सुगंध नींद आने में मददगार होती है। इससे नींद की गोलियों, खासकर वेलियम के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।
ऑनलाइन पत्रिका बायोलॉजिकल केमिस्ट्री में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चमेली को सूंघने से दिमाग में होने वाली आण्विक हलचल तनाव को दूर कर सोने के लिए प्रेरित करती है। यही काम वेलियम भी करती है। डूसलडॉर्फ स्थित हाइनरिष हाइने विश्वविद्यालय और रूअर विश्वविद्यालय बोखुम के वैज्ञानिकों की इस साझा खोज को पेटेंट भी मिल गया है।
प्रो. हेंस हाट की अगुवाई में सम्पन्न इस अहम शोध के मुताबिक नियमित तौर पर नींद की गोली खाने से न सिर्फ इन पर निर्भरता बढ़ जाती है बल्कि अवसाद, चक्कर आना, तनाव, मांसपेशियां कमजोर होना और सामंजस्य न बिठा पाने जैसी दिक्कतें भी स्वभाव में शुमार हो जाती हैं। यह बात दीगर है कि गोली खाने और चमेली की सुगंध से दिमाग में होने वाली रासायनिक क्रिया एक समान है लेकिन इसके बावजूद कुदरती तरीके से नींद लेने का कोई साइड इफेक्ट नहीं है।
गौरतलब है कि नींद, अवसाद और तनाव के लिए दुनिया भर में आमतौर पर वेलियम और बेंजोडायजापाम की गोलियां ली जाती हैं इसका 20 प्रतिशत इस्तेमाल पश्चिमी देशों में होता है। शोध के नतीजों तक पहुंचने से पहले चूहों और फिर मनुष्यों पर लंबे समय तक तमाम तरह की खुशबूओं के परीक्षण किए गए। प्रो. हाट बताते हैं कि चमेली की खुशबू सांस के जरिए फेफड़ों तक जाती है और फिर खून में मिलकर दिमाग में नींद के लिए जिम्मेदार तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती है। उनके मुताबिक शोध के नतीजों को तनाव दूर करने के लिए आजकल प्रचलित अरोमा थेरेपी के वैज्ञानिक प्रभावों की कसौटी पर भी कसा जा सकता है।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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